गोविन्द दामोदर स्तोत्रम् — Complete Lyrics
गोविन्द दामोदर स्तोत्रम्
Sanskrit text with English transliteration and translation
Verse 1
अग्रे कुरूणामथ पाण्डवानां
दुःशासनेनाहृतवस्त्रकेशा।
कृष्णा तदाक्रोशदनन्यनाथा
गोविन्द दामोदर माधवेति॥
agre kurūṇām atha pāṇḍavānāṃ
duḥśāsanenāhṛta-vastra-keśā |
kṛṣṇā tadākrośad ananya-nāthā
govinda dāmodara mādhaveti ||
कौरवों और पाण्डवों की सभा में जब दुःशासन ने द्रौपदी के वस्त्र और केश खींचे, तब अनन्यनाथा द्रौपदी पुकार उठी — 'गोविन्द! दामोदर! माधव!'
Verse 2
श्रीकृष्ण विष्णो मधुकैटभारे
भक्तानुकम्पिन् भगवन् मुरारे।
त्रायस्व मां केशव लोकनाथ
गोविन्द दामोदर माधवेति॥
śrī-kṛṣṇa viṣṇo madhu-kaiṭabhāre
bhaktānukampin bhagavan murāre |
trāyasva māṃ keśava loka-nātha
govinda dāmodara mādhaveti ||
'हे श्रीकृष्ण! हे विष्णु! हे मधु-कैटभ के शत्रु! हे भक्तवत्सल! हे भगवन्! हे मुरारे! हे केशव, हे लोकनाथ, मेरी रक्षा करो — गोविन्द, दामोदर, माधव!'
Verse 3
विक्रेतुकामा किल गोपकन्या
मुरारिपादार्पितचित्तवृत्तिः।
दध्यादिकं मोहवशादवोचद्
गोविन्द दामोदर माधवेति॥
vikretu-kāmā kila gopa-kanyā
murāri-pādārpita-citta-vṛttiḥ |
dadhy-ādikaṃ moha-vaśād avocad
govinda dāmodara mādhaveti ||
एक गोपकन्या, जो दही आदि बेचना चाहती थी, उसका चित्त मुरारि के चरणों में लीन था; प्रेम-मोह में वह अपने सामान के स्थान पर पुकार उठी — 'गोविन्द! दामोदर! माधव!'
Verse 4
उलूखले सम्भृततण्डुलांश्च
सङ्घट्टयन्त्यो मुसलैः प्रमुग्धाः।
गायन्ति गोप्यो जनितानुरागा
गोविन्द दामोदर माधवेति॥
ulūkhale sambhṛta-taṇḍulāṃś ca
saṅghaṭṭayantyo musalaiḥ pramugdhāḥ |
gāyanti gopyo janitānurāgā
govinda dāmodara mādhaveti ||
ऊखल में एकत्र चावल को मूसल से कूटती हुई मुग्ध गोपियाँ अनुराग से भरकर गाती हैं — 'गोविन्द! दामोदर! माधव!'
Verse 5
काचित्करांभोजपुटे निषण्णं
क्रीडाशुकं किंशुकरक्ततुण्डम्।
अध्यापयामास सरोरुहाक्षी
गोविन्द दामोदर माधवेति॥
kācit karāmbhoja-puṭe niṣaṇṇaṃ
krīḍā-śukaṃ kiṃśuka-rakta-tuṇḍam |
adhyāpayām āsa saroruhākṣī
govinda dāmodara mādhaveti ||
एक कमलनयनी ने अपने कर-कमलों में बैठे, किंशुक-पुष्प के समान लाल चोंच वाले क्रीड़ा-शुक को यही पढ़ाया — 'गोविन्द! दामोदर! माधव!'
Verse 6
गृहे गृहे गोपवधूसमूहः
प्रतिक्षणं पिञ्जरसारिकाणाम्।
स्खलद्गिरं वाचयितुं प्रवृत्तो
गोविन्द दामोदर माधवेति॥
gṛhe gṛhe gopa-vadhū-samūhaḥ
prati-kṣaṇaṃ piñjara-sārikāṇām |
skhalad-giraṃ vācayituṃ pravṛtto
govinda dāmodara mādhaveti ||
घर-घर में गोप-वधुओं का समूह प्रतिक्षण अपनी पिंजरे की सारिकाओं को रुक-रुककर यही बोलना सिखाने में लगा रहता है — 'गोविन्द! दामोदर! माधव!'
Verse 7
जिह्वे रसज्ञे मधुरप्रिया त्वं
सत्यं हितं त्वां परमं वदामि।
आवर्णयेथा मधुराक्षराणि
गोविन्द दामोदर माधवेति॥
jihve rasa-jñe madhura-priyā tvaṃ
satyaṃ hitaṃ tvāṃ paramaṃ vadāmi |
āvarṇayethā madhurākṣarāṇi
govinda dāmodara mādhaveti ||
हे रस को जानने वाली जिह्वा! तू मधुर की प्रेमी है; मैं तुझे सच्चा और परम हितकारी वचन कहता हूँ — इन मधुर अक्षरों का बारम्बार उच्चारण कर — 'गोविन्द! दामोदर! माधव!'
Verse 8
सुखावसाने त्विदमेव सारं
दुःखावसाने त्विदमेव गेयम्।
देहावसाने त्विदमेव जाप्यं
गोविन्द दामोदर माधवेति॥
sukhāvasāne tv idam eva sāraṃ
duḥkhāvasāne tv idam eva geyam |
dehāvasāne tv idam eva jāpyaṃ
govinda dāmodara mādhaveti ||
सुख के अन्त में यही सार है, दुःख के अन्त में यही गाने योग्य है, और देह के अन्त (मृत्यु) में यही जपने योग्य है — 'गोविन्द! दामोदर! माधव!'
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