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का ते कान्ता कस्ते पुत्रः — Word-by-Word Meaning

का ते कान्ता कस्ते पुत्रः

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

का
Ka
कौन (है)
ते
Te
तेरा
कान्ता
Kanta
पत्नी, प्रिया
कस्ते पुत्रः
Kaste putrah
तेरा पुत्र कौन है?
संसारः अयम्
Samsarah ayam
यह सांसारिक अस्तित्व
अतीव विचित्रः
Ativa vichitrah
अत्यन्त विचित्र और आश्चर्यजनक
कस्य त्वं
Kasya tvam
तू किसका है?
कः
Kah
तू कौन (है)?
कुत आयातः
Kuta ayatah
कहाँ से आया है?
तत्त्वं
Tattvam
तत्त्व, मूल सत्य
चिन्तय
Chintaya
चिन्तन कर, मनन कर
तदिह
Tad-iha
वह, यहीं (इसी जीवन में)
भ्रातः
Bhratah
हे भाई!

Complete Translation

तेरी पत्नी कौन? तेरा पुत्र कौन? यह संसार अत्यन्त विचित्र है। तू किसका है? तू कौन है? कहाँ से आया है? हे भाई! इस तत्त्व का यहीं विचार कर।

Origin & History

Source: Bhaja Govindam (Moha Mudgara), verse on self-inquiry

Author: Adi Shankaracharya

Period: 8th century CE (circa 788-820)

यह श्लोक आदि शंकराचार्य के भज गोविन्दम् का अंश है, जो काशी में सांसारिक मोह से आत्मा को जगाने के लिए गाया गया था। धन, शरीर और सम्बन्धों की क्षणभंगुरता दिखाने के पश्चात् शंकराचार्य यहाँ साधक का ध्यान वेदान्त के शाश्वत प्रश्नों — तू कौन है? किसका है? कहाँ से आया? — की ओर मोड़ते हैं, और संसार के विचित्र दृश्य के मूल में स्थित आत्मा के चिन्तन का निमन्त्रण देते हैं।

Frequently Asked Questions

'का ते कान्ता कस्ते पुत्रः' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'तेरी पत्नी कौन? तेरा पुत्र कौन?' आदि शंकराचार्य इन प्रश्नों से यह दर्शाते हैं कि हमारे सम्बन्ध हमारी सच्ची पहचान नहीं हैं, और हमें यह विचार करने को प्रेरित करते हैं कि हम वास्तव में कौन हैं और कहाँ से आए हैं।
इस श्लोक की शिक्षा क्या है?
यह आत्म-विचार (आत्म-विचार) का आह्वान है। अपनी आसक्तियों पर प्रश्न उठाकर और 'मैं कौन हूँ? कहाँ से आया?' पूछकर यह श्लोक शरीर और परिवार से परे शाश्वत आत्मा की ओर संकेत करता है, और हमें इसी जीवन में इस तत्त्व का चिन्तन करने को प्रेरित करता है।
श्लोक श्रोता को 'भ्रातः' (भाई) क्यों कहता है?
शंकराचार्य साधक को प्रेमपूर्वक 'भाई' कहकर सम्बोधित करते हैं ताकि यह स्पष्ट हो कि यह शिक्षा करुणा से दी गई है, न कि किसी निन्दा से। यह एक गुरु का स्नेहपूर्ण उपदेश है जो किसी साथी प्राणी को सत्य के प्रति जगाना चाहता है।
यह श्लोक कहाँ से है?
यह भज गोविन्दम् (मोह मुद्गर) से है, जिसकी रचना आदि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में की थी। यह इस स्तोत्र के आत्म-विचार और वैराग्य पर सर्वाधिक उद्धृत श्लोकों में से एक है।

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