का ते कान्ता कस्ते पुत्रः
अन्य नाम / खोज: ka te kanta kaste putrah · kasya tvam kah kuta ayatah · samsaro ayam ativa vichitrah · tattvam chintaya tadiha bhratah · bhaja govindam ka te kanta
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✦ अर्थ
आदि शंकराचार्य के 'भज गोविन्दम्' का यह प्रसिद्ध श्लोक साधक के समक्ष आत्म-विचार के महान प्रश्न रखता है। 'तेरी पत्नी कौन? तेरा पुत्र कौन? तू कौन है? कहाँ से आया?' — ऐसे प्रश्नों से यह परिवार और शरीर के साथ मिथ्या तादात्म्य को शिथिल करता है। यह संसार की विचित्रता पर प्रश्न उठाकर श्रोता को — जिसे प्रेमपूर्वक 'भाई' कहा गया है — आत्मतत्त्व का यहीं और अभी चिन्तन करने को प्रेरित करता है।
उत्पत्ति और कथा
Bhaja Govindam (Moha Mudgara), verse on self-inquiry · Adi Shankaracharya · 8th century CE (circa 788-820)
यह श्लोक आदि शंकराचार्य के भज गोविन्दम् का अंश है, जो काशी में सांसारिक मोह से आत्मा को जगाने के लिए गाया गया था। धन, शरीर और सम्बन्धों की क्षणभंगुरता दिखाने के पश्चात् शंकराचार्य यहाँ साधक का ध्यान वेदान्त के शाश्वत प्रश्नों — तू कौन है? किसका है? कहाँ से आया? — की ओर मोड़ते हैं, और संसार के विचित्र दृश्य के मूल में स्थित आत्मा के चिन्तन का निमन्त्रण देते हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
ये ही प्रश्न — 'मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ?' — आत्म-विचार के बीज बने, जिनका उपयोग असंख्य साधकों ने, आधुनिक ऋषियों सहित, आत्म-साक्षात्कार के लिए किया है। कहा जाता है कि इस श्लोक के साथ सच्चे मन से बैठना उस अन्तर्यात्रा का आरम्भ है जो समस्त दुःखों का अन्त करती है।
मंत्र
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का ते कान्ता कस्ते पुत्रः संसारोऽयमतीव विचित्रः । कस्य त्वं कः कुत आयातः तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः ॥
Ka te kanta kaste putrah samsaroyamativa vichitrah Kasya tvam kah kuta ayatah tattvam chintaya tadiha bhratah
अर्थ:तेरी पत्नी कौन? तेरा पुत्र कौन? यह संसार अत्यन्त विचित्र है। तू किसका है? तू कौन है? कहाँ से आया है? हे भाई! इस तत्त्व का यहीं विचार कर।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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का ते कान्ता कस्ते पुत्रः पाठ के लाभ
गहन आत्म-विचार जगाता है — 'मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ?'
स्थायी मानी गई पारिवारिक सम्बन्धों की आसक्ति को शिथिल करता है
सांसारिक अस्तित्व (संसार) की विचित्र, स्वप्न-सदृश प्रकृति को प्रकट करता है
मन को शाश्वत आत्मा (आत्मन्) के चिन्तन की ओर मोड़ता है
साधक को 'भाई' कहकर दी गई एक कोमल किन्तु मर्मभेदी शिक्षा
आदि शंकराचार्य के अद्वैत की दार्शनिक गहराई समेटे हुए है
का ते कान्ता कस्ते पुत्रः जप विधि
इस श्लोक का ध्यानपूर्वक पाठ करें, प्रत्येक प्रश्न पर रुककर — 'तेरी पत्नी कौन? तेरा पुत्र कौन? तू कौन है?' — और पहचान की दृढ़ धारणाओं को विलीन होने दें। शीघ्र उत्तर की खोज न करें; प्रश्नों को ही मन को अन्तर्मुख करने दें। समापन के शब्द 'तत्त्वं चिन्तय' (सत्य का चिन्तन कर) मौन आत्म-विचार में बैठने का निमन्त्रण हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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