गोविन्दं भज मूढमते
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✦ अर्थ
यह आदि शंकराचार्य के 'भज गोविन्दम्' का प्रसिद्ध प्रारम्भिक एवं पुनरावर्ती ध्रुवपद है — संस्कृत भक्तिकाव्य की सम्भवतः सर्वाधिक प्रसिद्ध पंक्ति। यह मूढ़ मन को शुष्क बौद्धिकता त्यागकर गोविन्द (भगवान) को भजने का आह्वान करती है, क्योंकि मृत्यु के समय केवल पुस्तकीय ज्ञान किसी को नहीं बचा सकता। यह सम्पूर्ण स्तोत्र में गुरु की प्रेमपूर्ण चेतावनी के रूप में बार-बार गाई जाती है।
उत्पत्ति और कथा
Bhaja Govindam (Moha Mudgara), verse 1 and refrain · Adi Shankaracharya · 8th century CE (circa 788-820)
परम्परा के अनुसार, आदि शंकराचार्य अपने शिष्यों के साथ वाराणसी (काशी) की गलियों से जा रहे थे, तभी उन्होंने एक वृद्ध विद्वान को पाणिनि के व्याकरण-नियम बड़े परिश्रम से रटते देखा। करुणा से द्रवित होकर उन्होंने स्वतः यह श्लोक गाया, उस वृद्ध को समझाते हुए कि मृत्यु के समय व्याकरण उसकी रक्षा नहीं करेगा और उसे इसके बदले गोविन्द को भजना चाहिए। यह प्रारम्भिक श्लोक सम्पूर्ण स्तोत्र का ध्रुवपद बन गया, जो प्रत्येक श्लोक के पश्चात् दोहराया जाता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
कहा जाता है कि काशी के वृद्ध वैयाकरण ने यह श्लोक सुनकर अपनी आजीवन की शुष्क विद्वत्ता से जागृति पाई और अपना हृदय भगवान की ओर मोड़ा। यह पंक्ति तब से समस्त भारत में एक घरेलू पुकार बन गई है, जो मन्दिरों एवं घरों में समान रूप से आत्मा को सांसारिकता की निद्रा से जगाने हेतु गाई जाती है।
मंत्र
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भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढमते । सम्प्राप्ते सन्निहिते काले नहि नहि रक्षति डुकृञ्करणे ॥
Bhaja govindam bhaja govindam govindam bhaja mudhamate Samprapte sannihite kale nahi nahi rakshati dukrinkarane
अर्थ:गोविन्द को भजो, गोविन्द को भजो, गोविन्द को भजो, हे मूढ़ बुद्धि! जब मृत्यु का नियत समय निकट आ जाएगा, तब व्याकरण के नियम ('डुकृञ्करणे') तुम्हारी तनिक भी रक्षा नहीं करेंगे।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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गोविन्दं भज मूढमते पाठ के लाभ
ईश्वर को मात्र बौद्धिक प्रयास से ऊपर रखने का निरन्तर स्मरण
वैराग्य एवं इस स्मृति को विकसित करती है कि मृत्यु निश्चित है
भज गोविन्दम् की सर्वाधिक उद्धृत पंक्ति — स्मरण एवं जप के लिए सरल
अशान्त मन को गोविन्द के पवित्र नाम की ओर मोड़ती है
भक्तिभाव तत्काल जगाने हेतु सत्संग एवं भजन में गाई जाती है
आदि शंकराचार्य, महान आचार्य की कृपा वहन करती है
गोविन्दं भज मूढमते जप विधि
यह ध्रुवपद भजन के रूप में बार-बार गाया जा सकता है, 'भज गोविन्दम्' को राग एवं भाव के साथ विस्तारित करते हुए। 'गोविन्दम्' की प्रत्येक पुनरावृत्ति को मन में बैठने दें, और 'मूढमते' (हे मूढ़ मन) को अपने ही भटकते विचारों के प्रति कोमल सुधार के रूप में सुनें। इसे परम्परागत रूप से समूहों में प्रश्न-उत्तर शैली में गाया जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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