श्री वेङ्कटेश्वर स्तोत्रम् (कमलाकुचचूचुक) — Complete Lyrics
श्री वेङ्कटेश्वर स्तोत्रम् (कमलाकुचचूचुक)
Sanskrit text with English transliteration and translation
Verse 1
कमलाकुचचूचुक कुङ्कुमतो
नियतारुणितातुल नीलतनो ।
कमलायतलोचन लोकपते
विजयीभव वेङ्कटशैलपते ॥ १ ॥
Kamalakucha choochuka kunkumato
Niyatarunitatula nilatano |
Kamalayatalochana lokapate
Vijayibhava venkatashailapate || 1 ||
हे प्रभु, जिनका अतुलनीय नील वर्ण शरीर कमला (लक्ष्मी) के वक्षस्थल के कुंकुम से सदा अरुणिमायुक्त है, जिनके नेत्र कमलदल के समान विशाल हैं, हे लोकपते — हे वेंकटाचलपति, आपकी जय हो!
Verse 2
सचतुर्मुख षण्मुख पञ्चमुख
प्रमुखाखिल दैवत मौलिमणे ।
शरणागतवत्सल सारनिधे
परिपालय मां वृषशैलपते ॥ २ ॥
Sachaturmukha shanmukha panchamukha
Pramukhakhila daivata maulimane |
Sharanagatavatsala saranidhe
Paripalaya mam vrishashailapate || 2 ||
ब्रह्मा, षण्मुख (कार्तिकेय) और पंचमुख (शिव) आदि समस्त देवताओं के मुकुटों के शिरोमणि, शरणागतों पर वत्सल, समस्त सार के निधान — हे वृषाचलपति, मेरी रक्षा कीजिए!
Verse 3
अतिवेलतया तव दुर्विषहै-
रनुवेलकृतैरपराधशतैः ।
भरितं त्वरितं वृषशैलपते
परया कृपया परिपाहि हरे ॥ ३ ॥
Ativelataya tava durvishahai-
ranuvelakritairaparadhashataih |
Bharitam tvaritam vrishashailapate
Paraya kripaya paripahi hare || 3 ||
हे वृषाचलपति, मैं प्रतिक्षण किए गए असह्य सैकड़ों अपराधों से भरा हुआ हूँ; हे हरि, शीघ्र ही अपनी परम कृपा से मेरी रक्षा कीजिए!
Verse 4
अधिवेङ्कटशैलमुदारमते-
र्जनताभिमताधिकदानरतात् ।
परदेवतया गदितान्निगमैः
कमलादयितान्न परं कलये ॥ ४ ॥
Adhivenkatashailamudaramate-
rjanatabhimatadhikadanaratat |
Paradevataya gaditannigamaih
Kamaladayitanna param kalaye || 4 ||
वेंकटाचल पर विराजमान, उदार हृदय, भक्तों की इच्छा से भी अधिक देने में रत, वेदों द्वारा परम देवता कहे गए — इस कमलापति से बढ़कर मैं किसी को नहीं मानता।
Verse 5
कलवेणुरवावशगोपवधू-
शतकोटिवृतात्स्मरकोटिसमात् ।
प्रतिवल्लविकाभिमतात्सुखदात्
वसुदेवसुतान्न परं कलये ॥ ५ ॥
Kalavenuravavashagopavadhu-
shatakotivritatsmarakotisamat |
Prativallavikabhimatatsukhadat
Vasudevasutanna param kalaye || 5 ||
वंशी की मधुर ध्वनि से वशीभूत करोड़ों गोपियों से घिरे, करोड़ों कामदेवों के समान, प्रत्येक गोपी के प्रिय एवं सुखदाता — उस वसुदेवनन्दन (कृष्ण) से बढ़कर मैं किसी को नहीं मानता।
Verse 6
अभिरामगुणाकर दाशरथे
जगदेकधनुर्धर धीरमते ।
रघुनायक राम रमेश विभो
वरदो भव देव दयाजलधे ॥ ६ ॥
Abhiramagunakara dasharathe
Jagadekadhanurdhara dhiramate |
Raghunayaka rama ramesha vibho
Varado bhava deva dayajaladhe || 6 ||
हे मनोहर गुणों के आकर, दशरथनन्दन, जगत् के एकमात्र श्रेष्ठ धनुर्धर, धीरबुद्धि; हे रघुनायक राम, हे रमेश, हे विभो — हे देव, हे दयासागर, वरदायी हूजिए!
Verse 7
अवनीतनयाकमनीयकरं
रजनीकरचारुमुखाम्बुरुहम् ।
रजनीचरराजतमोमिहिरं
महनीयमहं रघुरामममुम् ॥ ७ ॥
Avanitanayakamaniyakaram
Rajanikaracharumukhamburuham |
Rajanichararajatamomihiram
Mahaniyamaham raghuramamamum || 7 ||
सीता (पृथ्वीसुता) के लिए मनोहर हाथों वाले, चन्द्रमा के समान सुन्दर मुखकमल वाले, रात्रिचर राक्षसों के अन्धकार के लिए सूर्य के समान — उस महान् रघुराम का मैं ध्यान करता हूँ।
Verse 8
सुमुखं सुहृदं सुलभं सुखदं
स्वनुजं च सुकायममोघशरम् ।
अपहाय रघूद्वहमन्यमहं
न कथञ्चन कञ्चन जातु भजे ॥ ८ ॥
Sumukham suhridam sulabham sukhadam
Svanujam cha sukayamamoghasharam |
Apahaya raghudvahamanyamaham
Na kathanchana kanchana jatu bhaje || 8 ||
सुमुख, सुहृद्, सुलभ, सुखद, उत्तम अनुज (लक्ष्मण) वाले, सुन्दर शरीर एवं अमोघ बाण वाले — उन रघुश्रेष्ठ को छोड़कर मैं किसी अन्य का कभी भजन नहीं करूँगा।
Verse 9
विना वेङ्कटेशं न नाथो न नाथः
सदा वेङ्कटेशं स्मरामि स्मरामि ।
हरे वेङ्कटेश प्रसीद प्रसीद
प्रियं वेङ्कटेश प्रयच्छ प्रयच्छ ॥ ९ ॥
Vina venkatesham na natho na nathah
Sada venkatesham smarami smarami |
Hare venkatesha prasida prasida
Priyam venkatesha prayachchha prayachchha || 9 ||
वेंकटेश के बिना मेरा कोई नाथ नहीं, कोई आश्रय नहीं; मैं सदा वेंकटेश का स्मरण करता हूँ, स्मरण करता हूँ। हे हरि वेंकटेश, प्रसन्न होइए, प्रसन्न होइए; हे प्रिय वेंकटेश, (अपनी कृपा) प्रदान कीजिए, प्रदान कीजिए।
Verse 10
अहं दूरतस्ते पदाम्भोजयुग्म-
प्रणामेच्छयागत्य सेवां करोमि ।
सकृत्सेवया नित्यसेवाफलं त्वं
प्रयच्छ प्रयच्छ प्रभो वेङ्कटेश ॥ १० ॥
Aham durataste padambhojayugma-
pranamechchhayagatya sevam karomi |
Sakritsevaya nityasevaphalam tvam
Prayachchha prayachchha prabho venkatesha || 10 ||
मैं दूर से ही आपके दोनों चरणकमलों को प्रणाम करने की इच्छा से आकर सेवा करता हूँ; इस एक बार की सेवा से ही नित्य सेवा का फल मुझे प्रदान कीजिए, हे प्रभु वेंकटेश।
Verse 11
अज्ञानिना मया दोषानशेषान्विहितान्हरे ।
क्षमस्व त्वं क्षमस्व त्वं शेषशैलशिखामणे ॥ ११ ॥
Ajnanina maya doshanasheshanvihitanhare |
Kshamasva tvam kshamasva tvam sheshashailashikhamane || 11 ||
हे हरि, अज्ञानवश मुझसे किए गए असंख्य दोषों को क्षमा कीजिए, क्षमा कीजिए, हे शेषाचल के शिखामणि।
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