आगरा के पास एक गाँव में एक मेहनती किसान रहता था, जिसके खेत सूखे-प्यासे पड़े थे। उसके चालाक पड़ोसी ने उसे अपना पुराना बढ़िया कुआँ बेचने की पेशकश की। किसान ने अपनी सारी जमा-पूँजी देकर पूरा दाम चुकाया और खुशी-खुशी घर लौटा — अब उसकी फ़सलें जी भरकर पानी पिएँगी।
अगली सुबह जैसे ही किसान ने कुएँ में बाल्टी डाली, पड़ोसी दौड़ता हुआ आया। “रुको, रुको! यह क्या कर रहे हो?” वह चिल्लाया। “अपने कुएँ से पानी निकाल रहा हूँ,” किसान ने हैरान होकर कहा। चालाक आदमी कुटिलता से मुस्कराया, “मैंने तुम्हें कुआँ बेचा था भाई, उसके अंदर का पानी नहीं। पानी चाहिए तो उसका दाम अलग से दो — हर बाल्टी का एक सिक्का!”
बेचारा किसान सन्न रह गया। उसने बहुत मिन्नतें कीं, पर पड़ोसी टस से मस न हुआ। तब किसान पैदल आगरा पहुँचा और बादशाह अकबर के दरबार का न्याय-घंटा बजा दिया। अकबर ने यह अजीब शिकायत सुनी और हमेशा की तरह बीरबल की ओर देखा, “यह पहेली तुम्हारी हुई।”
बीरबल ने पड़ोसी को बुलवाया। “क्या तुमने यह कुआँ किसान को बेचा है?” उन्होंने पूछा। “जी हुज़ूर,” आदमी ने पूरे भरोसे से कहा, “पर सिर्फ़ कुआँ। पानी तो अब भी मेरा है। कहीं नहीं लिखा कि मैंने पानी बेचा।”
“बहुत अच्छा,” बीरबल ने दाढ़ी सहलाते हुए कहा। “कुआँ किसान का, और पानी तुम्हारा। तो यह बताओ — तुम अपना पानी उसके कुएँ में किस हक़ से रखे हुए हो? या तो जितने दिन तुम्हारा पानी उसके कुएँ में रहे, उसका रोज़ का किराया किसान को दो, या फिर अभी, इसी वक़्त अपना सारा पानी निकालकर अपने घर ले जाओ।”
चालाक आदमी का चेहरा फक़ पड़ गया। सारा पानी निकालना? असंभव! रोज़ किराया देना? सर्वनाश! वह बादशाह के क़दमों में गिर पड़ा, अपनी धूर्तता क़बूल की और कहा कि कुआँ और उसकी बूँद-बूँद किसान की है।
अकबर गर्व से मुस्कराए। लालच ने जो गड्ढा खोदा था, बीरबल की बुद्धि ने लालची को उसी में गिरा दिया। किसान घर लौटा, खेत सींचे, और हर बाल्टी खींचते हुए बीरबल को दुआएँ देता रहा।