एक तपती गर्मी में एक छोटा तालाब सूखने लगा, और उसमें रहने वाली मछलियाँ चिंता में पड़ गईं। किनारे खड़ा एक बगुला उन्हें भूखी आँखों से देख रहा था, और उसके मन में एक चाल आई। वह मीठी बोली में बोला, "प्यारी मछलियो, मुझे तुम पर दया आती है। तुम्हारा तालाब सूख रहा है, पर मैं पास ही एक बड़ी झील जानता हूँ — गहरी, ठंडी, कमल के फूलों से ढकी। मैं तुम्हें एक-एक करके अपनी चोंच में बिठाकर वहाँ पहुँचा दूँगा।"
मछलियों को भरोसा नहीं हुआ। एक बोली, "दुनिया बनी तब से आज तक किसी बगुले ने मछली का भला नहीं किया।" तो बगुले ने परीक्षा का प्रस्ताव रखा: "अपने में से किसी एक को झील देखने भेजो, मैं उसे सही-सलामत वापस ले आऊँगा।" उन्होंने एक साहसी बूढ़ी मछली को भेजा। बगुले ने सचमुच उसे वह सुंदर झील दिखाई और वापस लाकर छोड़ दिया। अब मछलियों को बगुले पर पूरा भरोसा हो गया, और वे एक-एक करके पहले ले चलने की विनती करने लगीं।
पर उस दुष्ट बगुले ने एक भी मछली झील तक नहीं पहुँचाई। हर बार वह किनारे के वरुण वृक्ष पर जा बैठता और अपने सवार को अपना भोजन बना लेता, काँटे पेड़ की जड़ में गिरा देता। फेरे पर फेरे लगते गए, काँटों का ढेर बढ़ता गया — और आख़िर तालाब में एक भी मछली न बची। बचा तो सिर्फ़ एक केकड़ा। भूखे बगुले ने कहा, "नन्हे केकड़े, चलो तुम्हें भी उस सुंदर झील में पहुँचा दूँ?" केकड़े ने सोचा, "यह मछली को चोंच में पकड़ता है, पर पकड़ना तो मुझे भी आता है।" प्रकट में बोला, "मित्र, चोंच में तुम मुझे उठा नहीं पाओगे। मैं अपने पंजों से तुम्हारी गर्दन पकड़ लेता हूँ, ऐसे ले चलो।"
बगुला मान गया। पर उड़ते-उड़ते केकड़े ने देखा कि चमकती झील तो नीचे पीछे छूट गई — और सामने आया वही वरुण वृक्ष, जिसके नीचे मछलियों के काँटों का ढेर लगा था। "तो यह है तुम्हारी झील!" केकड़े ने लोहार के संड़सी-जैसे पंजे कसते हुए कहा। "मुझे पानी तक ले चलो, वरना हम दोनों साथ गिरेंगे।" काँपता हुआ बगुला नीचे उतरा और उसने केकड़े को धीरे से झील में उतार दिया। पर केकड़ा जानता था कि यह बगुला आगे भी औरों को ऐसे ही ठगेगा — और उसने अपने कैंची-जैसे पंजों का एक ज़ोरदार वार किया, और उसी कीचड़ पर उस दुष्ट बगुले की कहानी हमेशा के लिए समाप्त हो गई। वरुण वृक्ष में रहने वाले देवता ने यह सब देखा और कहा, "छल की जीत लंबी नहीं होती: ठग को एक दिन अपने से तेज़ ठग मिल ही जाता है।"
कथा समाप्त कर भगवान बुद्ध ने कहा, "उस जन्म में उस वृक्ष का देवता, जिसने यह सब देखा, स्वयं मैं था।"