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श्रीमद्भगवद्गीता 16.21 — त्रिविधं नरकस्येदं द्वारम् — Word-by-Word Meaning

श्रीमद्भगवद्गीता 16.21 — त्रिविधं नरकस्येदं द्वारम्

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

त्रिविधम्
tri-vidham
तीन प्रकार का
नरकस्य
narakasya
नरक का
इदम्
idam
यह
द्वारम्
dvāram
द्वार, प्रवेशद्वार
नाशनम्
nāśhanam
नाशकारी, विनाशकारी
आत्मनः
ātmanaḥ
आत्मा का
कामः
kāmaḥ
काम, वासना
क्रोधः
krodhaḥ
क्रोध
तथा
tathā
तथा, साथ ही
लोभः
lobhaḥ
लोभ
तस्मात्
tasmāt
इसलिए
एतत्
etat
इन
त्रयम्
trayam
तीनों को
त्यजेत्
tyajet
त्याग देना चाहिए

Complete Translation

काम, क्रोध और लोभ ये आत्मनाश के त्रिविध द्वार हैं, इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।।

Origin & History

Source: Bhagavad Gita Chapter 16, Verse 21

Author: Bhagavan Sri Krishna (as recorded by Maharishi Veda Vyasa)

Period: Ancient (part of the Mahabharata, c. 5th–2nd century BCE in present form)

सोलहवें अध्याय में दिव्य और आसुरी प्रकृति का विरोधाभास प्रस्तुत करने के पश्चात्, श्रीकृष्ण आसुरी मार्ग को उसकी तीन सबसे घातक जड़ों — काम, क्रोध और लोभ — में निचोड़ देते हैं, और चेतावनी देते हैं कि ये विनाश के द्वार हैं। यह श्लोक गीता के सर्वाधिक उद्धृत नैतिक उपदेशों में से एक है, जो पहले के प्रसंग (२.६२–६३) की प्रतिध्वनि करता है कि कैसे वासना क्रोध और पतन को जन्म देती है। यह प्रत्येक साधक के लिए एक कालातीत सावधानी के रूप में स्थित है।

Frequently Asked Questions

भगवद्गीता १६.२१ में नरक के तीन द्वार कौन से हैं?
श्रीकृष्ण काम (वासना), क्रोध और लोभ को नरक के तीन द्वार बताते हैं, जो आत्मा का नाश करने वाले हैं। वे आदेश देते हैं कि इन तीनों का पूर्ण त्याग किया जाए, क्योंकि ये सांसारिक कल्याण और आध्यात्मिक प्रगति दोनों को नष्ट करते हैं।
इन तीनों को ही विशेष रूप से क्यों चुना गया?
काम, क्रोध और लोभ वे मूल आवेग हैं जिनसे अन्य सभी दोष उत्पन्न होते हैं। ये विवेक को धुँधला कर देते हैं, मन को क्षुब्ध करते हैं, और आत्मा को दुःख में बाँधते हैं, इसीलिए श्रीकृष्ण इन्हें विनाशकारी कहते हैं और इनके पूर्ण त्याग का आग्रह करते हैं।
इन शत्रुओं को कैसे जीता जा सकता है?
गीता आत्म-संयम, विवेक, वैराग्य और भक्ति का उपाय बताती है। इन आवेगों को 'नरक के द्वार' मानकर और उन पर कर्म न करते हुए, मन को उच्चतर आत्मा और भगवान की ओर मोड़कर, मनुष्य धीरे-धीरे इनकी पकड़ से मुक्त हो जाता है।
अध्याय इनके त्याग के पश्चात् क्या होता है यह बताता है?
अगले श्लोक (१६.२२) में श्रीकृष्ण समझाते हैं कि इन तीन अन्धकार-द्वारों से मुक्त व्यक्ति आत्मा के कल्याण के लिए आचरण करता है और इस प्रकार परम लक्ष्य प्राप्त करता है। काम, क्रोध और लोभ का त्याग मोक्ष का मार्ग खोलता है।

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