श्रीमद्भगवद्गीता 2.71 — विहाय कामान्यः सर्वान् — Word-by-Word Meaning
श्रीमद्भगवद्गीता 2.71 — विहाय कामान्यः सर्वान्
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
विहाय
vihāya
त्यागकर, छोड़कर
कामान्
kāmān
सांसारिक कामनाएँ
यः
yaḥ
जो
सर्वान्
sarvān
सब
पुमान्
pumān
एक पुरुष
चरति
charati
विचरण करता है, रहता है
निःस्पृहः
niḥspṛihaḥ
स्पृहा से रहित
निर्ममः
nirmamaḥ
ममत्व की भावना से रहित
निरहंकारः
nirahankāraḥ
अहंकार से रहित
सः
saḥ
वह पुरुष
शान्तिम्
śhāntim
परम शान्ति
अधिगच्छति
adhigachchhati
प्राप्त करता है
Complete Translation
जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर स्पृहारहित? ममभाव रहित और निरहंकार हुआ विचरण करता है? वह शान्ति प्राप्त करता है।।
Origin & History
Source: Bhagavad Gita Chapter 2, Verse 71
Author: Bhagavan Sri Krishna (as recorded by Maharishi Veda Vyasa)
Period: Ancient (part of the Mahabharata, c. 5th–2nd century BCE in present form)
जैसे ही दूसरा अध्याय समाप्ति की ओर बढ़ता है, श्रीकृष्ण इस कामना-रहितता के श्लोक से ज्ञानी पुरुष का अपना चित्र पूर्ण करते हैं। यह अर्जुन के इस प्रश्न का उत्तर देता है कि ज्ञानीजन कैसे जीते और कर्म करते हैं, और घोषणा करता है कि शान्ति उन्हें मिलती है जिन्होंने तृष्णा और अहंकार का परित्याग कर दिया है। यह श्लोक कामना से मुक्ति तक के संक्षिप्त मानचित्र के रूप में पूजनीय है।
Frequently Asked Questions
भगवद्गीता 2.71 क्या वचन देती है?▼
यह वचन देती है कि जो भी समस्त कामनाओं को त्यागकर स्पृहा-रहित, ममता-रहित (निर्मम) और अहंकार-रहित (निरहंकार) होकर रहता है, वह परम शान्ति प्राप्त करता है। शान्ति त्याग का स्वाभाविक फल है।
निर्मम और निरहंकार का क्या अर्थ है?▼
निर्मम का अर्थ है 'मेरा' की भावना से रहित — व्यक्तियों और वस्तुओं के प्रति ममता-रहितता। निरहंकार का अर्थ है अहंकार से रहित — शरीर, पद और उपलब्धियों के साथ आत्मा का मिथ्या तादात्म्य न होना। ये दोनों मिलकर अहंकार-रहित ज्ञानी का वर्णन करते हैं।
यह कामनाओं के दमन से किस प्रकार भिन्न है?▼
श्रीकृष्ण ज्ञान और वैराग्य द्वारा कामना से परे जाने की बात करते हैं, बलपूर्वक दमन की नहीं। जब हृदय आत्मा में संतुष्ट हो जाता है, तब कामनाएँ स्वाभाविक रूप से छूट जाती हैं और सच्ची, सहज शान्ति शेष रहती है।
यह श्लोक इतना महत्वपूर्ण क्यों है?▼
यह स्थितप्रज्ञ-प्रकरण का चरम सूत्र है और शान्ति प्राप्त करने का सम्पूर्ण उपदेश है। यह तुरंत उस प्रसिद्ध श्लोक से पहले आता है जो ब्राह्मी स्थिति — ब्रह्म में स्थित होने की अवस्था — का वर्णन करता है।
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