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श्रीमद्भगवद्गीता ३.२७ — प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः — Word-by-Word Meaning

श्रीमद्भगवद्गीता ३.२७ — प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

प्रकृतेः
prakṛiteḥ
प्रकृति के
क्रियमाणानि
kriyamāṇāni
किये जाते हुए, सम्पादित
गुणैः
guṇaiḥ
प्रकृति के तीन गुणों द्वारा
कर्माणि
karmāṇi
कर्म, क्रियाएँ
सर्वशः
sarvaśhaḥ
सब प्रकार से, सब ओर से
अहङ्कार
ahankāra
अहंकार, 'मैं' का भाव
विमूढात्मा
vimūḍhātmā
जिसका अंतःकरण मोहित है
कर्ता
kartā
कर्ता
अहम्
aham
मैं
इति
iti
ऐसा
मन्यते
manyate
मानता है, समझता है

Complete Translation

सम्पूर्ण कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं; अहंकार से मोहित हुआ पुरुष "मैं कर्ता हूँ" — ऐसा मान लेता है।

Origin & History

Source: Bhagavad Gita Chapter 3, Verse 27

Author: Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva)

Period: Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

तीसरे अध्याय कर्मयोग में श्रीकृष्ण अर्जुन को सिखाते हैं कि बंधन के बिना कैसे कर्म किया जाए। यह दिखाने के बाद कि कोई भी कर्म-रहित नहीं रह सकता, अब वे बंधन के सबसे गहरे कारण — अहंकार के कर्तापन के दावे — को उजागर करते हैं। यह श्लोक घोषित करता है कि प्रकृति के गुण समस्त कर्म करते हैं, और दुःख केवल तब उत्पन्न होता है जब मोहित आत्मा 'मैं कर्ता हूँ' कल्पना करती है।

Frequently Asked Questions

भगवद्गीता 3.27 की मुख्य शिक्षा क्या है?
यह सिखाता है कि समस्त कर्म वास्तव में प्रकृति के तीन गुणों (मोदों) द्वारा किये जाते हैं, और केवल अहंकार — शरीर और मन से तादात्म्य से मोहित — ही 'मैं कर्ता हूँ' सोचता है। इसे पहचानने से मिथ्या अभिमान और बंधन विलीन हो जाते हैं।
इस श्लोक में वर्णित गुण क्या हैं?
गुण प्रकृति के तीन धर्म हैं: सत्त्व (पवित्रता और सामंजस्य), रजस् (राग और सक्रियता) तथा तमस् (जड़ता और अज्ञान)। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि यही शक्तियाँ, न कि शुद्ध आत्मा, शरीर और मन में समस्त क्रिया को चलाती हैं।
क्या इस श्लोक का अर्थ है कि हम अपने कर्मों के लिए उत्तरदायी नहीं हैं?
नहीं। यह कर्तापन के आध्यात्मिक सत्य को संबोधित करता है, नैतिक उत्तरदायित्व को नहीं। उद्देश्य है 'मैं कर्ता हूँ' के अहंकारी अभिमान को छोड़ना, फिर भी अपने कर्तव्य को निष्ठापूर्वक करना। अगला श्लोक ही ज्ञानी को सावधान करता है कि जो अभी भी कर्म से तादात्म्य रखते हैं उन्हें विचलित न करें।
यह श्लोक दैनिक जीवन में कैसे सहायक है?
यह स्मरण रखकर कि प्रकृति हमारे माध्यम से कार्य करती है, हम सफलता पर घमंड और असफलता पर चिंता छोड़ देते हैं। इससे आंतरिक शांति, नम्रता और स्वतंत्रता आती है — पूर्ण रूप से कर्म करते हुए भी साक्षी आत्मा की शांति में विश्राम करना।

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