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श्रीमद्भगवद्गीता ८.७ — तस्मात्सर्वेषु कालेषु — Word-by-Word Meaning

श्रीमद्भगवद्गीता ८.७ — तस्मात्सर्वेषु कालेषु

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

तस्मात्
tasmāt
इसलिए
सर्वेषु
sarveṣhu
सब में, समस्त में
कालेषु
kāleṣhu
समयों में
माम्
mām
मुझे (भगवान को)
अनुस्मर
anusmara
निरन्तर स्मरण करो
युध्य
yudhya
युद्ध करो, अपना कर्तव्य करो
cha
और
मयि
mayi
मुझमें
अर्पित
arpita
अर्पित, समर्पित
मनोबुद्धिः
mano-buddhiḥ
मन और बुद्धि
माम्
mām
मुझे
एव
eva
ही, निश्चय ही
एष्यसि
eṣhyasi
तुम प्राप्त करोगे, तुम मुझे पहुँचोगे
असंशयम्
asanśhayam
निःसन्देह

Complete Translation

इसलिए तुम सब समय मेरा निरंतर स्मरण करो और युद्ध भी करो। मुझमें अर्पित मन और बुद्धि वाले होकर तुम निःसंदेह मुझे ही प्राप्त होओगे।

Origin & History

Source: Bhagavad Gita Chapter 8, Verse 7

Author: Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva)

Period: Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

आठवें अध्याय अक्षर-ब्रह्म योग में श्रीकृष्ण ब्रह्म, आत्मा और मृत्यु के समय क्या होता है — अर्जुन के इन प्रश्नों का उत्तर देते हैं। यह सिखाकर कि अन्तिम क्षण में जिसका स्मरण होता है वही गति को निर्धारित करता है, वे यह व्यावहारिक निर्देश देते हैं: अपना कर्तव्य करते हुए सदा मेरा स्मरण करो, और तुम निश्चय ही मुझे प्राप्त करोगे।

Frequently Asked Questions

श्रीमद्भगवद्गीता ८.७ का मुख्य उपदेश क्या है?
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि अपना कर्तव्य निभाते हुए सब समय भगवान का स्मरण करो। मन और बुद्धि को भगवान को अर्पित करके और उनका निरन्तर स्मरण करके मनुष्य निःसन्देह उन्हें प्राप्त कर लेता है।
कार्य में व्यस्त रहते हुए 'सब समय भगवान का स्मरण' कैसे करूँ?
इसका अर्थ है भगवान को चेतना की पृष्ठभूमि में रखना — उनके नाम, मन्त्र या प्रेमभाव के द्वारा — भले ही हाथ और मन कर्तव्य में लगे हों। अभ्यास से स्मरण निरन्तर हो जाता है, जैसे सभी कर्मों के नीचे बहती एक शान्त अन्तर्धारा।
क्या यह श्लोक हमें सांसारिक उत्तरदायित्वों को त्यागने को कहता है?
नहीं। श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं 'मेरा स्मरण करो और युद्ध करो' — अर्थात अपना कर्तव्य करो। यह श्लोक भक्ति को कर्म से समन्वित करता है: तुम संसार में पूर्णतः सक्रिय रहते हुए भीतर से सब कुछ भगवान को अर्पित करते रहो।
इस अध्याय में मृत्यु के समय स्मरण पर इतना बल क्यों है?
श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि मृत्यु के क्षण में रखा गया विचार गति को निर्धारित करता है। जीवन भर सब समय भगवान का स्मरण करने से वही स्मरण अन्त में स्वाभाविक रूप से उठता है, और भक्त को भगवान तक ले जाता है — इसीलिए यहाँ निरन्तर अभ्यास पर बल दिया गया है।

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