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दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् Meaning — Line by Line

दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्

Every verse and every word explained in English & Hindi

Meaning — Line by Line

Every verse of दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् with its Hindi meaning. Tap any word to hear it, or ▶ to recite the verse.

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  1. Verse 1. maunavyākhyāprakaṭitaparabrahmatattvaṃ yuvānaṃ
  2. Verse 2. viśvaṃ darpaṇadṛśyamānanagarītulyaṃ nijāntargataṃ
  3. Verse 3. bījasyāntarivāṅkuro jagadidaṃ prāṅnirvikalpaṃ punaḥ
  4. Verse 4. yasyaiva sphuraṇaṃ sadātmakamasatkalpārthakaṃ bhāsate
  5. Verse 5. nānācchidraghaṭodarasthitamahādīpaprabhābhāsvaraṃ
  6. Verse 6. dehaṃ prāṇamapīndriyāṇyapi calāṃ buddhiṃ ca śūnyaṃ viduḥ
  7. Verse 7. rāhugrastadivākarendusadṛśo māyāsamācchādanāt
  8. Verse 8. bālyādiṣvapi jāgradādiṣu tathā sarvāsvavasthāsvapi
  9. Verse 9. viśvaṃ paśyati kāryakāraṇatayā svasvāmisaṃbandhataḥ
  10. Verse 10. bhūrambhāṃsyanalo’nilo’mbaramaharnātho himāṃśuḥ pumān
  11. Verse 11. sarvātmatvamiti sphuṭīkṛtamidaṃ yasmādamuṣmin stave
  12. Verse 12. vaṭaviṭapisamīpe bhūmibhāge niṣaṇṇaṃ
Verse 1#

maunavyākhyāprakaṭitaparabrahmatattvaṃ yuvānaṃ

मौनव्याख्याप्रकटितपरब्रह्मतत्त्वं युवानं वर्षिष्ठान्ते वसदृषिगणैरावृतं ब्रह्मनिष्ठैः आचार्येन्द्रं करकलितचिन्मुद्रमानन्दरूपं स्वात्मारामं मुदितवदनं दक्षिणामूर्तिमीडे

maunavyākhyāprakaṭitaparabrahmatattvaṃ yuvānaṃ varṣiṣṭhānte vasadṛṣigaṇairāvṛtaṃ brahmaniṣṭhaiḥ | ācāryendraṃ karakalitacinmudramānandarūpaṃ svātmārāmaṃ muditavadanaṃ dakṣiṇāmūrtimīḍe ||

Meaningमैं उन दक्षिणामूर्ति की वन्दना करता हूँ — जो रूप में नित्य-युवा हैं, फिर भी ब्रह्म में स्थित वृद्ध ऋषियों से घिरे बैठे हैं; जो मौन के द्वारा परब्रह्म तत्त्व का उपदेश देते हैं; जो आचार्यों में श्रेष्ठ हैं, जिनका हाथ चिन्मुद्रा में है, जिनका स्वरूप आनन्द है, जो अपने ही आत्मा में रमण करते हैं, और जिनका मुख प्रसन्नता से युक्त है।

Verse 2#

viśvaṃ darpaṇadṛśyamānanagarītulyaṃ nijāntargataṃ

विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतं पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथा निद्रया यः साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयं तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये १॥

viśvaṃ darpaṇadṛśyamānanagarītulyaṃ nijāntargataṃ paśyannātmani māyayā bahirivodbhūtaṃ yathā nidrayā | yaḥ sākṣātkurute prabodhasamaye svātmānamevādvayaṃ tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 1||

Meaningयह विश्व दर्पण में दिखाई देने वाली नगरी के समान है — जो अपने ही आत्मा के भीतर है, फिर भी माया के कारण बाहर उत्पन्न-सा प्रतीत होता है, जैसे स्वप्न में। जो ज्ञान के जागरण के समय इसे अपने ही अद्वय आत्मा के रूप में साक्षात् अनुभव करते हैं — उन गुरुस्वरूप श्रीदक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार है।

Verse 3#

bījasyāntarivāṅkuro jagadidaṃ prāṅnirvikalpaṃ punaḥ

बीजस्यान्तरिवाङ्कुरो जगदिदं प्राङ्निर्विकल्पं पुनः मायाकल्पितदेशकालकलनावैचित्र्यचित्रीकृतम् मायावीव विजृम्भयत्यपि महायोगीव यः स्वेच्छया तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये २॥

bījasyāntarivāṅkuro jagadidaṃ prāṅnirvikalpaṃ punaḥ māyākalpitadeśakālakalanāvaicitryacitrīkṛtam | māyāvīva vijṛmbhayatyapi mahāyogīva yaḥ svecchayā tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 2||

Meaningयह विश्व प्रकट होने से पूर्व बीज के भीतर छिपे अंकुर के समान निर्विकल्प (अभेद) था; फिर माया द्वारा कल्पित देश और काल के भेद से विचित्र विविधता में रचा जाकर, जिसे वे अपनी इच्छा से प्रकट करते हैं — किसी मायावी अथवा महायोगी के समान। उन गुरुस्वरूप श्रीदक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार है।

Verse 4#

yasyaiva sphuraṇaṃ sadātmakamasatkalpārthakaṃ bhāsate

यस्यैव स्फुरणं सदात्मकमसत्कल्पार्थकं भासते साक्षात्तत्त्वमसीति वेदवचसा यो बोधयत्याश्रितान् यत्साक्षात्करणाद्भवेन्न पुनरावृत्तिर्भवाम्भोनिधौ तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ३॥

yasyaiva sphuraṇaṃ sadātmakamasatkalpārthakaṃ bhāsate sākṣāttattvamasīti vedavacasā yo bodhayatyāśritān | yatsākṣātkaraṇādbhavenna punarāvṛttirbhavāmbhonidhau tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 3||

Meaningजिनका स्वयं-प्रकाश चैतन्य, स्वयं सत्स्वरूप होकर, असत् (मिथ्या) पदार्थों को भी सत्-सा भासित करता है; जो 'तत्त्वमसि' इस महान् वेद-वचन के द्वारा अपने आश्रितों को बोध कराते हैं; और जिनका साक्षात्कार होने पर संसार-सागर में पुनः आवृत्ति (पुनर्जन्म) नहीं होती। उन गुरुस्वरूप श्रीदक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार है।

Verse 5#

nānācchidraghaṭodarasthitamahādīpaprabhābhāsvaraṃ

नानाच्छिद्रघटोदरस्थितमहादीपप्रभाभास्वरं ज्ञानं यस्य तु चक्षुरादिकरणद्वारा बहिः स्पन्दते जानामीति तमेव भान्तमनुभात्येतत्समस्तं जगत् तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ४॥

nānācchidraghaṭodarasthitamahādīpaprabhābhāsvaraṃ jñānaṃ yasya tu cakṣurādikaraṇadvārā bahiḥ spandate | jānāmīti tameva bhāntamanubhātyetatsamastaṃ jagat tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 4||

Meaningजिनका ज्ञान (चैतन्य), अनेक छिद्रों वाले घड़े के भीतर रखे महादीप के प्रकाश के समान, नेत्र आदि इन्द्रियों के द्वारों से बाहर स्पन्दित होता है; जब वे ही 'मैं जानता हूँ' इस रूप में प्रकाशित होते हैं, तब यह समस्त जगत् उन्हीं के पीछे (उन्हीं के प्रकाश से) प्रकाशित होता है। उन गुरुस्वरूप श्रीदक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार है।

Verse 6#

dehaṃ prāṇamapīndriyāṇyapi calāṃ buddhiṃ ca śūnyaṃ viduḥ

देहं प्राणमपीन्द्रियाण्यपि चलां बुद्धिं शून्यं विदुः स्त्रीबालान्धजडोपमास्त्वहमिति भ्रान्ता भृशं वादिनः मायाशक्तिविलासकल्पितमहा व्यामोहसंहारिणे तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ५॥

dehaṃ prāṇamapīndriyāṇyapi calāṃ buddhiṃ ca śūnyaṃ viduḥ strībālāndhajaḍopamāstvahamiti bhrāntā bhṛśaṃ vādinaḥ | māyāśaktivilāsakalpitamahā vyāmohasaṃhāriṇe tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 5||

Meaning'शरीर, प्राण, इन्द्रियाँ, चंचल बुद्धि अथवा शून्य — यही आत्मा है' — ऐसा स्त्री, बालक, अंधे और जड़ के समान भ्रमित वादी लोग अत्यन्त आग्रह से कहते हैं। माया-शक्ति के विलास से रचे गए इस महान् व्यामोह का संहार करने वाले — उन गुरुस्वरूप श्रीदक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार है।

Verse 7#

rāhugrastadivākarendusadṛśo māyāsamācchādanāt

राहुग्रस्तदिवाकरेन्दुसदृशो मायासमाच्छादनात् सन्मात्रः करणोपसंहरणतो योऽभूत्सुषुप्तः पुमान् प्रागस्वाप्समिति प्रबोधसमये यः प्रत्यभिज्ञायते तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ६॥

rāhugrastadivākarendusadṛśo māyāsamācchādanāt sanmātraḥ karaṇopasaṃharaṇato yo’bhūtsuṣuptaḥ pumān | prāgasvāpsamiti prabodhasamaye yaḥ pratyabhijñāyate tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 6||

Meaningराहु से ग्रस्त सूर्य अथवा चन्द्रमा के समान, मनुष्य गहरी निद्रा में इन्द्रियों के उपसंहार से माया से आच्छादित होकर केवल शुद्ध सत्ता-मात्र रह जाता है; और जागने के समय वह 'मैं पहले (सोता हुआ) था' इस प्रकार उस नित्य आत्मा को पहचानता है। उन गुरुस्वरूप श्रीदक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार है।

Verse 8#

bālyādiṣvapi jāgradādiṣu tathā sarvāsvavasthāsvapi

बाल्यादिष्वपि जाग्रदादिषु तथा सर्वास्ववस्थास्वपि व्यावृत्तास्वनुवर्तमानमहमित्यन्तः स्फुरन्तं सदा स्वात्मानं प्रकटीकरोति भजतां यो मुद्रया भद्रया तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ७॥

bālyādiṣvapi jāgradādiṣu tathā sarvāsvavasthāsvapi vyāvṛttāsvanuvartamānamahamityantaḥ sphurantaṃ sadā | svātmānaṃ prakaṭīkaroti bhajatāṃ yo mudrayā bhadrayā tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 7||

Meaningबाल्य, यौवन, वृद्धावस्था आदि तथा जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति — इन सब बदलती हुई अवस्थाओं में भी जो 'मैं' रूप में निरन्तर भीतर स्फुरित रहता है, उस अपने आत्मा को जो अपने भक्तों के लिए कल्याणकारी (भद्र) मुद्रा के द्वारा प्रकट करते हैं। उन गुरुस्वरूप श्रीदक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार है।

Verse 9#

viśvaṃ paśyati kāryakāraṇatayā svasvāmisaṃbandhataḥ

विश्वं पश्यति कार्यकारणतया स्वस्वामिसंबन्धतः शिष्याचार्यतया तथैव पितृपुत्राद्यात्मना भेदतः स्वप्ने जाग्रति वा एष पुरुषो मायापरिभ्रामितः तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ८॥

viśvaṃ paśyati kāryakāraṇatayā svasvāmisaṃbandhataḥ śiṣyācāryatayā tathaiva pitṛputrādyātmanā bhedataḥ | svapne jāgrati vā ya eṣa puruṣo māyāparibhrāmitaḥ tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 8||

Meaningमाया से भ्रमित यह पुरुष, स्वप्न में अथवा जाग्रत् में, इस एक ही (आत्मा-रूप) विश्व को कार्य-कारण, स्वामी-सेवक, शिष्य-आचार्य, पिता-पुत्र आदि सम्बन्धों के भेद से अनेक रूपों में विभक्त देखता है। उन गुरुस्वरूप श्रीदक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार है।

Verse 10#

bhūrambhāṃsyanalo’nilo’mbaramaharnātho himāṃśuḥ pumān

भूरम्भांस्यनलोऽनिलोऽम्बरमहर्नाथो हिमांशुः पुमान् इत्याभाति चराचरात्मकमिदं यस्यैव मूर्त्यष्टकम् नान्यत्किञ्चन विद्यते विमृशतां यस्मात्परस्माद्विभोः तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ९॥

bhūrambhāṃsyanalo’nilo’mbaramaharnātho himāṃśuḥ pumān ityābhāti carācarātmakamidaṃ yasyaiva mūrtyaṣṭakam | nānyatkiñcana vidyate vimṛśatāṃ yasmātparasmādvibhoḥ tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 9||

Meaningपृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र और जीव (पुरुष) — इन आठ रूपों (अष्टमूर्ति) के रूप में ही यह चराचर जगत् प्रतीत होता है; विचार करने वालों के लिए उन सर्वव्यापक परम तत्त्व से भिन्न और कुछ भी नहीं है। उन गुरुस्वरूप श्रीदक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार है।

Verse 11#

sarvātmatvamiti sphuṭīkṛtamidaṃ yasmādamuṣmin stave

सर्वात्मत्वमिति स्फुटीकृतमिदं यस्मादमुष्मिन् स्तवे तेनास्य श्रवणात्तदर्थमननाद्ध्यानाच्च सङ्कीर्तनात् सर्वात्मत्वमहाविभूतिसहितं स्यादीश्वरत्वं स्वतः ततः सिद्ध्येत्तत्पुनरष्टधा परिणतं चैश्वर्यमव्याहतम् १०॥

sarvātmatvamiti sphuṭīkṛtamidaṃ yasmādamuṣmin stave tenāsya śravaṇāttadarthamananāddhyānācca saṅkīrtanāt | sarvātmatvamahāvibhūtisahitaṃ syādīśvaratvaṃ svataḥ tataḥ siddhyettatpunaraṣṭadhā pariṇataṃ caiśvaryamavyāhatam || 10||

Meaningइस स्तोत्र में 'सब कुछ आत्मा ही है' (सर्वात्मत्व) यह तत्त्व स्पष्ट किया गया है; अतः इसके श्रवण, अर्थ-मनन, ध्यान और संकीर्तन से सर्वात्मत्व की महान् विभूति सहित ईश्वरत्व स्वयं ही प्राप्त होता है, और उसके पश्चात् अष्टधा प्रकट होने वाला अबाधित ऐश्वर्य भी सिद्ध हो जाता है।

Verse 12#

vaṭaviṭapisamīpe bhūmibhāge niṣaṇṇaṃ

वटविटपिसमीपे भूमिभागे निषण्णं सकलमुनिजनानां ज्ञानदातारमारात् त्रिभुवनगुरुमीशं दक्षिणामूर्तिदेवं जननमरणदुःखच्छेददक्षं नमामि

vaṭaviṭapisamīpe bhūmibhāge niṣaṇṇaṃ sakalamunijanānāṃ jñānadātāramārāt | tribhuvanagurumīśaṃ dakṣiṇāmūrtidevaṃ jananamaraṇaduḥkhacchedadakṣaṃ namāmi ||

Meaningमैं उन दक्षिणामूर्ति देव को नमस्कार करता हूँ — जो वटवृक्ष के समीप भूमि पर विराजमान हैं, जो समस्त एकत्रित मुनिजनों को ज्ञान प्रदान करते हैं, जो तीनों लोकों के ईश और गुरु हैं, तथा जन्म-मरण के दुःख का छेदन करने में दक्ष (निपुण) हैं।

Word-by-Word Breakdown

दक्षिणामूर्ति
Dakṣiṇāmūrti
ज्ञान के परम मौन गुरु, दक्षिणाभिमुख आचार्य रूप शिव
मौनव्याख्या
Mauna-vyākhyā
मौन के द्वारा (परम सत्य का) उपदेश/व्याख्यान
चिन्मुद्र
Chin-mudra
ज्ञान की मुद्रा (अंगूठा व तर्जनी मिलाकर), जो उनके हाथ में धारित है
दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं
Darpaṇa-dṛśyamāna-nagarī-tulyaṃ
दर्पण के भीतर दिखाई देने वाली नगरी के समान
माया
Māyā
वह विश्व-शक्ति जो एक ही आत्मा को अनेक रूपों में भासित कराती है
अद्वयं
Advayaṃ
अद्वय — एक, जिसके समान दूसरा नहीं
तत्त्वमसि
Tattvamasi
'तत्त्वमसि' — 'वह तू है', महान् वेद-महावाक्य
प्रबोधसमये
Prabodha-samaye
जागरण/आत्म-साक्षात्कार के क्षण में
मूर्त्यष्टकम्
Mūrty-aṣṭakam
अष्टमूर्ति — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र और जीव
सर्वात्मत्वम्
Sarvātmatvaṃ
सर्वात्मत्व — यह सत्य कि एक ही आत्मा सबकी आत्मा है
स्वात्मानम्
Svātmānam
अपना ही सच्चा आत्मा (स्वात्मा)
गुरुमूर्तये
Guru-mūrtaye
जो गुरु रूप में मूर्त हैं उन्हें — प्रत्येक श्लोक की टेक (नमस्कार)

Origin & History

Source: Composed by Adi Shankaracharya

Author: Adi Shankaracharya

Period: c. 8th century CE

दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् अद्वैत वेदान्त के महान आचार्य आदि शंकराचार्य के सर्वाधिक प्रसिद्ध दार्शनिक स्तोत्रों में से एक है। यह भगवान शिव का दक्षिणामूर्ति रूप में चिन्तन करता है — वटवृक्ष के नीचे विराजमान मौन आदिगुरु, जो केवल मौन के द्वारा वृद्धतम ऋषियों को आत्मज्ञान का उपदेश देते हैं। दस तेजोमय श्लोकों में शंकर इस दर्शन को प्रकट करते हैं कि सम्पूर्ण विश्व अपनी ही अद्वय चेतना के भीतर का प्रतिबिम्ब मात्र है, जो माया के कारण स्वप्न या दर्पण की नगरी के समान बाहर प्रतीत होता है, और इस एक आत्मा का साक्षात्कार ही मोक्ष है। यह स्तोत्र एक ध्यान-श्लोक और एक समापन-नमस्कार से आबद्ध है।

Frequently Asked Questions

दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् क्या है?
यह आदि शंकराचार्य द्वारा रचित अद्वैत वेदान्त का एक गहन स्तोत्र है, जो शिव को दक्षिणामूर्ति के रूप में — मौन के द्वारा परम सत्य का उपदेश देने वाले परम गुरु के रूप में — स्तुति करता है। इसके दस श्लोकों में से प्रत्येक 'तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये' — 'गुरुस्वरूप उन्हें यह नमस्कार है' — इस ध्रुवपद से समाप्त होता है।
दक्षिणामूर्ति कौन हैं?
दक्षिणामूर्ति भगवान शिव का आदिगुरु — प्रथम गुरु — के रूप में स्वरूप है, जो वटवृक्ष के नीचे विराजमान नित्य-युवा ऋषि के रूप में चित्रित हैं, जिनके चारों ओर वृद्ध शिष्य बैठे हैं और जिनका दाहिना हाथ चिन्मुद्रा (ज्ञान की मुद्रा) में उठा हुआ है। वे मौन में आत्मज्ञान प्रदान करते हैं। इस नाम का अर्थ है 'दक्षिण की ओर मुख करने वाले'।
दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् का उपदेश क्या है?
इसका केन्द्रीय उपदेश यह है कि सम्पूर्ण विश्व अपने ही अद्वय आत्मा (आत्मन्) के भीतर एक प्रक्षेपण है, जो माया के कारण बाहर प्रतीत होता है — जैसे दर्पण में दिखाई देती नगरी या स्वप्न में दिखाई देता संसार। इस एक आत्मा का — 'तत्त्वमसि', 'वह तू ही है' इस वेदवचन में अभिव्यक्त — साक्षात्कार करके साधक जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् का पाठ कब करना चाहिए?
ज्ञान के साधक इसका पाठ प्रातःकालीन ध्यान में, गुरुवार को, और सबसे बढ़कर गुरुपूर्णिमा पर करते हैं, जब दक्षिणामूर्ति को आदिगुरु के रूप में पूजा जाता है। एक चिन्तनशील स्तोत्र होने के कारण इसे प्रत्येक श्लोक के अर्थ पर मनन करते हुए धीरे-धीरे पढ़ा जाता है।

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