दत्तात्रेय अष्टोत्तर शतनामावली — Word-by-Word Meaning
दत्तात्रेय अष्टोत्तर शतनामावली
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
श्रीदत्ताय नमः
śrīdattāya namaḥ
श्री दत्त को नमस्कार, जो अत्रि व अनसूया को 'दिए गए' (प्रदत्त) प्रभु हैं
देवदत्ताय नमः
devadattāya namaḥ
देवदत्त को, जो देवों द्वारा / देवों को दिए गए
ब्रह्मदत्ताय नमः
brahmadattāya namaḥ
ब्रह्मदत्त को, जो ब्रह्मा द्वारा दिए गए
विष्णुदत्ताय नमः
viṣṇudattāya namaḥ
विष्णुदत्त को, जो विष्णु द्वारा दिए गए
शिवदत्ताय नमः
śivadattāya namaḥ
शिवदत्त को, जो शिव द्वारा दिए गए
अत्रिदत्ताय नमः
atridattāya namaḥ
अत्रिदत्त को, जो (ऋषि) अत्रि को दिए गए
आत्रेयाय नमः
ātreyāya namaḥ
आत्रेय को, अत्रि के वंशज को
अत्रिवरदाय नमः
atrivaradāya namaḥ
जिन्होंने अत्रि को वरदान दिया (अत्रिवरद) उन्हें
अनुसूयाय नमः
anusūyāya namaḥ
अनसूया से सम्बद्ध (उनकी कृपा से उत्पन्न) को
अनसूयासूनवे नमः
anasūyāsūnave namaḥ
अनसूयासूनु को, अनसूया के पुत्र को
अवधूताय नमः
avadhūtāya namaḥ
अवधूत को, समस्त बन्धनों से मुक्त मुक्त तपस्वी को
धर्माय नमः
dharmāya namaḥ
धर्म को, धर्म के साक्षात् स्वरूप को
धर्मपरायणाय नमः
dharmaparāyaṇāya namaḥ
धर्म में पूर्णतया तत्पर (धर्मपरायण) को
धर्मपतये नमः
dharmapataye namaḥ
धर्म के स्वामी (धर्मपति) को
सिद्धाय नमः
siddhāya namaḥ
सिद्ध को, पूर्णता प्राप्त को
सिद्धिदाय नमः
siddhidāya namaḥ
सिद्धिद को, सिद्धि व उपलब्धि के दाता को
Complete Translation
दत्तात्रेय अष्टोत्तर शतनामावली भगवान दत्तात्रेय — अत्रि ऋषि एवं सती अनसूया के पुत्र, जिनमें ब्रह्मा-विष्णु-महेश त्रिमूर्ति एक स्वरूप में संयुक्त हैं — के १०८ नामों की माला है। वे परम अवधूत एवं गुरुओं के गुरु, योग व धर्म के स्वामी हैं। ये नाम उनके दिव्य जन्म, अनेक पावन रूपों (एकमुख व बहुमुख, द्विभुज व षड्भुज — शङ्ख, चक्र, त्रिशूल, अक्षमाला, कमण्डलु व डमरु धारी) तथा ज्ञान, सिद्धि व मोक्ष के दाता स्वरूप का वर्णन करते हैं। 'ॐ' व 'नमः' सहित इस नामावली का पाठ ज्ञान, गुरुकृपा, विघ्ननाश एवं अन्तःशान्ति प्रदान करता है।
Origin & History
Source: Traditional (Datta Sampradaya; sanskritdocuments.org)
Author: Traditional
Period: Classical
भगवान दत्तात्रेय ऋषि अत्रि और उनकी परम सती पत्नी अनसूया के पुत्र रूप में तब प्रकट हुए, जब अनसूया के सतीत्व से प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु व शिव ने स्वयं को उनके बालक रूप में प्रदान किया — अतः 'दत्त' ('दिया गया') 'आत्रेय' ('अत्रि का पुत्र')। वे दत्त सम्प्रदाय के सर्वप्रमुख अवधूत व आदि गुरु हैं, सदा विचरणशील, सदा मुक्त, योग व धर्म के स्वामी। उनके १०८ नामों की यह माला उसी परम्परा में गुरु की कृपा व मुक्तपुरुष के ज्ञान का आवाहन करने हेतु पढ़ी जाती है।
Frequently Asked Questions
दत्तात्रेय अष्टोत्तर शतनामावली क्या है?▼
यह भगवान दत्तात्रेय के १०८ नामों की माला है, जो अत्रि व अनसूया के पुत्र हैं और जिनमें ब्रह्मा, विष्णु व शिव संयुक्त हैं। प्रत्येक नाम के आगे 'ॐ' व पीछे 'नमः' लगाकर जप किया जाता है, और यह ज्ञान, गुरुकृपा व अन्तःशान्ति हेतु अर्चना रूप में अर्पित होता है।
दत्तात्रेय को गुरुओं का गुरु क्यों कहते हैं?▼
दत्तात्रेय आदि गुरु एवं परम अवधूत — समस्त नियमों व बन्धनों से परे पूर्ण मुक्त सत्ता — के रूप में पूजित हैं। प्रसिद्ध है कि उन्होंने प्रकृति में चौबीस गुरुओं से सीखा, जो दर्शाता है कि जागृत के लिए समस्त जगत् गुरु बन जाता है; इसीलिए वे गुरुओं के गुरु व योग के स्वामी कहलाते हैं।
'दत्त' नाम का क्या अर्थ है?▼
'दत्त' का अर्थ है 'दिया गया'। ऋषि अत्रि व उनकी सती पत्नी अनसूया ने महान् तप किया, और ब्रह्मा, विष्णु व शिव प्रसन्न होकर स्वयं को उनके पुत्र रूप में दे दिया — अतः 'दत्त-आत्रेय', 'दिया गया, अत्रि का पुत्र'। आरम्भिक नाम (देवदत्त, ब्रह्मदत्त, विष्णुदत्त, शिवदत्त) इसी का स्मरण कराते हैं।
जप का सर्वोत्तम समय कौन सा है?▼
गुरुवार, गुरु का दिन, और दत्त जयन्ती — मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा — सर्वाधिक शुभ हैं। इसे नित्य भी, विशेषतः प्रातःकाल, शान्त व भक्तियुक्त मन से पढ़ा जा सकता है।
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