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गणपति सहस्रनाम स्तोत्रम् — Complete Lyrics

गणपति सहस्रनाम स्तोत्रम्

Sanskrit text with English transliteration and translation

Verse 1
मुनिरुवाच कथं नाम्नां सहस्रं तं गणेश उपदिष्टवान् शिवदं तन्ममाचक्ष्व लोकानुग्रहतत्पर 1 ब्रह्मोवाच देवः पूर्वं पुरारातिः पुरत्रयजयोद्यमे अनर्चनाद्गणेशस्य जातो विघ्नाकुलः किल 2 मनसा विनिर्धार्य ददृशे विघ्नकारणम् महागणपतिं भक्त्या समभ्यर्च्य यथाविधि 3 विघ्नप्रशमनोपायमपृच्छदपरिश्रमम् सन्तुष्टः पूजया शम्भोर्महागणपतिः स्वयम् 4 सर्वविघ्नप्रशमनं सर्वकामफलप्रदम् ततस्तस्मै स्वयं नाम्नां सहस्रमिदमब्रवीत् 5 अस्य श्रीमहागणपतिसहस्रनामस्तोत्रमालामन्त्रस्य गणेश ऋषिः, महागणपतिर्देवता, नानाविधानिच्छन्दांसि हुमिति बीजम्, तुङ्गमिति शक्तिः, स्वाहाशक्तिरिति कीलकम् सकलविघ्नविनाशनद्वारा श्रीमहागणपतिप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः
Muniruvacha Katham namnam sahasram tam ganesha upadishtavan | Shivadam tanmamachakshva lokanugrahatatpara || 1 || Brahmovacha Devah purvam puraratih puratrayajayodyame | Anarchanadganeshasya jato vighnakulah kila || 2 || Manasa sa vinirdharya dadrishe vighnakaranam | Mahaganapatim bhaktya samabhyarchya yathavidhi || 3 || Vighnaprashamanopayamaprichchhadaparishramam | Santushtah pujaya shambhormahaganapatih svayam || 4 || Sarvavighnaprashamanam sarvakamaphalapradam | Tatastasmai svayam namnam sahasramidamabravit || 5 || Asya shrimahaganapatisahasranamastotramalamantrasya | Ganesha rishih, mahaganapatirdevata, nanavidhanichchhandamsi | Humiti bijam, tungamiti shaktih, svahashaktiriti kilakam | Sakalavighnavinashanadvara shrimahaganapatiprasadasiddhyarthe jape viniyogah |
स्तोत्र का आरम्भ गणेश पुराण की कथा से होता है। मुनि ब्रह्मा जी से पूछते हैं कि यह सहस्रनाम किसे और कैसे उपदिष्ट हुआ। ब्रह्मा जी बताते हैं कि त्रिपुर-विजय के उद्यम में स्वयं शिव भी गणेश की अर्चना न करने से विघ्नों से व्याकुल हो गए; तब उन्होंने भक्तिपूर्वक महागणपति की विधिवत् पूजा की, और प्रसन्न होकर महागणपति ने स्वयं यह सर्वविघ्ननाशक, सर्वकामफलप्रद सहस्रनाम कहा। विनियोग में गणेश ऋषि, महागणपति देवता, 'हुम्' बीज, 'तुङ्गम्' शक्ति बताकर सकल विघ्नों के विनाश द्वारा श्रीमहागणपति की प्रसाद-सिद्धि के लिए जप का संकल्प किया गया है।
Verse 2
अथ करन्यासः गणेश्वरो गणक्रीड इत्यङ्गुष्ठाभ्यां नमः कुमारगुरुरीशान इति तर्जनीभ्यां नमः ब्रह्माण्डकुम्भश्चिद्व्योमेति मध्यमाभ्यां नमः रक्तो रक्ताम्बरधर इत्यनामिकाभ्यां नमः सर्वसद्गुरुसंसेव्य इति कनिष्ठिकाभ्यां नमः लुप्तविघ्नः स्वभक्तानामिति करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः अथ अङ्गन्यासः छन्दश्छन्दोद्भव इति हृदयाय नमः निष्कलो निर्मल इति शिरसे स्वाहा सृष्टिस्थितिलयक्रीड इति शिखायै वषट् ज्ञानं विज्ञानमानन्द इति कवचाय हुम् अष्टाङ्गयोगफलभृदिति नेत्रत्रयाय वौषट् अनन्तशक्तिसहित इत्यस्त्राय फट् भूर्भुवः स्वरों इति दिग्बन्धः अथ ध्यानम् गजवदनमचिन्त्यं तीक्ष्णदंष्ट्रं त्रिनेत्रं बृहदुदरमशेषं भूतिराजं पुराणम् अमरवरसुपूज्यं रक्तवर्णं सुरेशं पशुपतिसुतमीशं विघ्नराजं नमामि
Atha karanyasah Ganeshvaro ganakrida ityangushthabhyam namah | Kumaragururishana iti tarjanibhyam namah || Brahmandakumbhashchidvyometi madhyamabhyam namah | Rakto raktambaradhara ityanamikabhyam namah Sarvasadgurusamsevya iti kanishthikabhyam namah | Luptavighnah svabhaktanamiti karatalakaraprishthabhyam namah || Atha anganyasah Chhandashchhandodbhava iti hridayaya namah | Nishkalo nirmala iti shirase svaha | Srishtisthitilayakrida iti shikhayai vashat | Jnanam vijnanamananda iti kavachaya hum | Ashtangayogaphalabhriditi netratrayaya vaushat | Anantashaktisahita ityastraya phat | Bhurbhuvah svarom iti digbandhah | Atha dhyanam Gajavadanamachintyam tikshnadamshtram trinetram Brihadudaramashesham bhutirajam puranam | Amaravarasupujyam raktavarnam suresham Pashupatisutamisham vighnarajam namami ||
पाठ से पूर्व अनुष्ठान की तैयारी है: करन्यास में भगवान के नाम-युगल अँगूठों, अङ्गुलियों और करतल-करपृष्ठ पर स्थापित होते हैं, और अङ्गन्यास में हृदय, शिर, शिखा, कवच, नेत्रत्रय और अस्त्र पर; 'भूर्भुवः स्वरों' से दिग्बन्ध किया जाता है। फिर ध्यान-श्लोक उपास्य का चित्र खींचता है: गजवदन, अचिन्त्य, तीक्ष्णदंष्ट्र, त्रिनेत्र, विशाल उदर वाले, समस्त ऐश्वर्य के पुरातन राजा, रक्तवर्ण, देवश्रेष्ठों से सुपूज्य — पशुपति-पुत्र, विघ्नराज को मैं प्रणाम करता हूँ।
Verse 3
श्रीगणपतिरुवाच गणेश्वरो गणक्रीडो गणनाथो गणाधिपः एकदन्तो वक्रतुण्डो गजवक्त्रो महोदरः 1 लम्बोदरो धूम्रवर्णो विकटो विघ्ननाशनः सुमुखो दुर्मुखो बुद्धो विघ्नराजो गजाननः 2 भीमः प्रमोद आमोदः सुरानन्दो मदोत्कटः हेरम्बः शम्बरः शम्भुर्लम्बकर्णो महाबलः 3 नन्दनो लम्पटो भीमो मेघनादो गणञ्जयः विनायको विरूपाक्षो वीरः शूरवरप्रदः 4 महागणपतिर्बुद्धिप्रियः क्षिप्रप्रसादनः रुद्रप्रियो गणाध्यक्ष उमापुत्रोऽघनाशनः 5 कुमारगुरुरीशानपुत्रो मूषकवाहनः सिद्धिप्रियः सिद्धिपतिः सिद्धः सिद्धिविनायकः 6 अविघ्नस्तुम्बुरुः सिंहवाहनो मोहिनीप्रियः कटङ्कटो राजपुत्रः शाकलः सम्मितोमितः 7 कूष्माण्डसामसम्भूतिर्दुर्जयो धूर्जयो जयः भूपतिर्भुवनपतिर्भूतानां पतिरव्ययः 8 विश्वकर्ता विश्वमुखो विश्वरूपो निधिर्गुणः कविः कवीनामृषभो ब्रह्मण्यो ब्रह्मवित्प्रियः 9 ज्येष्ठराजो निधिपतिर्निधिप्रियपतिप्रियः हिरण्मयपुरान्तःस्थः सूर्यमण्डलमध्यगः 10
Shriganapatiruvacha Om ganeshvaro ganakrido gananatho ganadhipah | Ekadanto vakratundo gajavaktro mahodarah || 1 || Lambodaro dhumravarno vikato vighnanashanah | Sumukho durmukho buddho vighnarajo gajananah || 2 || Bhimah pramoda amodah suranando madotkatah | Herambah shambarah shambhurlambakarno mahabalah || 3 || Nandano lampato bhimo meghanado gananjayah | Vinayako virupaksho virah shuravarapradah || 4 || Mahaganapatirbuddhipriyah kshipraprasadanah | Rudrapriyo ganadhyaksha umaputroghanashanah || 5 || Kumaragururishanaputro mushakavahanah | Siddhipriyah siddhipatih siddhah siddhivinayakah || 6 || Avighnastumburuh simhavahano mohinipriyah | Katankato rajaputrah shakalah sammitomitah || 7 || Kushmandasamasambhutirdurjayo dhurjayo jayah | Bhupatirbhuvanapatirbhutanam patiravyayah || 8 || Vishvakarta vishvamukho vishvarupo nidhirgunah | Kavih kavinamrishabho brahmanyo brahmavitpriyah || 9 || Jyeshtharajo nidhipatirnidhipriyapatipriyah | Hiranmayapurantahsthah suryamandalamadhyagah || 10 ||
गणपति स्वयं अपने प्रियतम नामों से माला आरम्भ करते हैं: गणेश्वर, गणक्रीड, गणनाथ, गणाधिप; एकदन्त, वक्रतुण्ड, गजवक्त्र, महोदर, लम्बोदर, धूम्रवर्ण, विकट, विघ्ननाशन, सुमुख, विघ्नराज, गजानन; भीम, हेरम्ब, विनायक। वे बुद्धिप्रिय और शीघ्र प्रसन्न होने वाले महागणपति हैं, रुद्रप्रिय, उमापुत्र, मूषकवाहन, सिद्धियों के पति सिद्धिविनायक, भूपति, भुवनपति, भूतों के अविनाशी पति, विश्वकर्ता, कवियों में ऋषभ, हिरण्मय नगर के भीतर और सूर्यमण्डल के मध्य विराजमान।
Verse 4
कराहतिध्वस्तसिन्धुसलिलः पूषदन्तभित् उमाङ्ककेलिकुतुकी मुक्तिदः कुलपावनः 11 किरीटी कुण्डली हारी वनमाली मनोमयः वैमुख्यहतदैत्यश्रीः पादाहतिजितक्षितिः 12 सद्योजातः स्वर्णमुञ्जमेखली दुर्निमित्तहृत् दुःस्वप्नहृत्प्रसहनो गुणी नादप्रतिष्ठितः 13 सुरूपः सर्वनेत्राधिवासो वीरासनाश्रयः पीताम्बरः खण्डरदः खण्डवैशाखसंस्थितः 14 चित्राङ्गः श्यामदशनो भालचन्द्रो हविर्भुजः योगाधिपस्तारकस्थः पुरुषो गजकर्णकः 15 गणाधिराजो विजयः स्थिरो गजपतिध्वजी देवदेवः स्मरः प्राणदीपको वायुकीलकः 16 विपश्चिद्वरदो नादो नादभिन्नमहाचलः वराहरदनो मृत्युञ्जयो व्याघ्राजिनाम्बरः 17 इच्छाशक्तिभवो देवत्राता दैत्यविमर्दनः शम्भुवक्त्रोद्भवः शम्भुकोपहा शम्भुहास्यभूः 18 शम्भुतेजाः शिवाशोकहारी गौरीसुखावहः उमाङ्गमलजो गौरीतेजोभूः स्वर्धुनीभवः 19 यज्ञकायो महानादो गिरिवर्ष्मा शुभाननः सर्वात्मा सर्वदेवात्मा ब्रह्ममूर्धा ककुप्श्रुतिः 20
Karahatidhvastasindhusalilah pushadantabhit | Umankakelikutuki muktidah kulapavanah || 11 || Kiriti kundali hari vanamali manomayah | Vaimukhyahatadaityashrih padahatijitakshitih || 12 || Sadyojatah svarnamunjamekhali durnimittahrit | Duhsvapnahritprasahano guni nadapratishthitah || 13 || Surupah sarvanetradhivaso virasanashrayah | Pitambarah khandaradah khandavaishakhasamsthitah || 14 || Chitrangah shyamadashano bhalachandro havirbhujah | Yogadhipastarakasthah purusho gajakarnakah || 15 || Ganadhirajo vijayah sthiro gajapatidhvaji | Devadevah smarah pranadipako vayukilakah || 16 || Vipashchidvarado nado nadabhinnamahachalah | Varaharadano mrityunjayo vyaghrajinambarah || 17 || Ichchhashaktibhavo devatrata daityavimardanah | Shambhuvaktrodbhavah shambhukopaha shambhuhasyabhuh || 18 || Shambhutejah shivashokahari gaurisukhavahah | Umangamalajo gauritejobhuh svardhunibhavah || 19 || Yajnakayo mahanado girivarshma shubhananah | Sarvatma sarvadevatma brahmamurdha kakupshrutih || 20 ||
यह दशक उनकी लीला और पराक्रम का उत्सव है: करप्रहार से समुद्र-जल मथ दिया, पूषा के दाँत तोड़े, उमा की गोद में क्रीड़ा के कुतूहली, मुक्तिदाता, कुल को पवित्र करने वाले। किरीट, कुण्डल, हार और वनमाला से सुशोभित, उन्होंने विमुख दैत्यों की श्री हर ली और चरण-प्रहार से पृथ्वी जीत ली। वे दुर्निमित्त और दुःस्वप्न हरते हैं, पीताम्बरधारी हैं, खण्डित दन्त और भाल पर चन्द्र धारण करते हैं, हवि के भोक्ता, योग के अधिपति, गजकर्ण हैं। शम्भु के मुख से प्रकट, उमा के अङ्ग-मल से जन्मे, शिव का क्रोध हरने वाले और गौरी को सुख देने वाले — उनका शरीर ही यज्ञ है, उनका मस्तक ब्रह्म है।
Verse 5
ब्रह्माण्डकुम्भश्चिद्व्योमभालःसत्यशिरोरुहः जगज्जन्मलयोन्मेषनिमेषोऽग्न्यर्कसोमदृक् 21 गिरीन्द्रैकरदो धर्माधर्मोष्ठः सामबृंहितः ग्रहर्क्षदशनो वाणीजिह्वो वासवनासिकः 22 भ्रूमध्यसंस्थितकरो ब्रह्मविद्यामदोदकः कुलाचलांसः सोमार्कघण्टो रुद्रशिरोधरः 23 नदीनदभुजः सर्पाङ्गुलीकस्तारकानखः व्योमनाभिः श्रीहृदयो मेरुपृष्ठोऽर्णवोदरः 24 कुक्षिस्थयक्षगन्धर्वरक्षःकिन्नरमानुषः पृथ्वीकटिः सृष्टिलिङ्गः शैलोरुर्दस्रजानुकः 25 पातालजङ्घो मुनिपात्कालाङ्गुष्ठस्त्रयीतनुः ज्योतिर्मण्डललाङ्गूलो हृदयालाननिश्चलः 26 हृत्पद्मकर्णिकाशाली वियत्केलिसरोवरः सद्भक्तध्याननिगडः पूजावारिनिवारितः 27 प्रतापी काश्यपो मन्ता गणको विष्टपी बली यशस्वी धार्मिको जेता प्रथमः प्रमथेश्वरः 28 चिन्तामणिर्द्वीपपतिः कल्पद्रुमवनालयः रत्नमण्डपमध्यस्थो रत्नसिंहासनाश्रयः 29 तीव्राशिरोद्धृतपदो ज्वालिनीमौलिलालितः नन्दानन्दितपीठश्रीर्भोगदो भूषितासनः 30
Brahmandakumbhashchidvyomabhalahsatyashiroruhah | Jagajjanmalayonmeshanimeshognyarkasomadrik || 21 || Girindraikarado dharmadharmoshthah samabrimhitah | Graharkshadashano vanijihvo vasavanasikah || 22 || Bhrumadhyasamsthitakaro brahmavidyamadodakah | Kulachalamsah somarkaghanto rudrashirodharah || 23 || Nadinadabhujah sarpangulikastarakanakhah | Vyomanabhih shrihridayo meruprishthornavodarah || 24 || Kukshisthayakshagandharvarakshahkinnaramanushah | Prithvikatih srishtilingah shailorurdasrajanukah || 25 || Patalajangho munipatkalangushthastrayitanuh | Jyotirmandalalangulo hridayalananishchalah || 26 || Hritpadmakarnikashali viyatkelisarovarah | Sadbhaktadhyananigadah pujavarinivaritah || 27 || Pratapi kashyapo manta ganako vishtapi bali | Yashasvi dharmiko jeta prathamah pramatheshvarah || 28 || Chintamanirdvipapatih kalpadrumavanalayah | Ratnamandapamadhyastho ratnasimhasanashrayah || 29 || Tivrashiroddhritapado jvalinimaulilalitah | Nandananditapithashrirbhogado bhushitasanah || 30 ||
यहाँ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उनका शरीर बनकर प्रकट होता है: ब्रह्माण्ड उनका कुम्भ (कपाल), चिदाकाश ललाट, सत्य केश; नेत्रों का खुलना-मुँदना जगत का जन्म और लय है, अग्नि-सूर्य-चन्द्र उनके नेत्र हैं। गिरिराज उनका एकदन्त, धर्म-अधर्म ओष्ठ, ग्रह-नक्षत्र दाँत, वाणी जिह्वा, इन्द्र नासिका; नदियाँ भुजाएँ, सर्प अङ्गुलियाँ, तारे नख; आकाश नाभि, श्री हृदय, मेरु पृष्ठ, समुद्र उदर, पृथ्वी कटि, पाताल जङ्घा — त्रयी (वेद) ही उनकी तनु है। वे चिन्तामणि-द्वीप के पति हैं, कल्पद्रुम-वन में निवास करते हैं, रत्नमण्डप के मध्य रत्नसिंहासन पर विराजते हैं।
Verse 6
सकामदायिनीपीठः स्फुरदुग्रासनाश्रयः तेजोवतीशिरोरत्नं सत्यानित्यावतंसितः 31 सविघ्ननाशिनीपीठः सर्वशक्त्यम्बुजालयः लिपिपद्मासनाधारो वह्निधामत्रयालयः 32 उन्नतप्रपदो गूढगुल्फः संवृतपार्ष्णिकः पीनजङ्घः श्लिष्टजानुः स्थूलोरुः प्रोन्नमत्कटिः 33 निम्ननाभिः स्थूलकुक्षिः पीनवक्षा बृहद्भुजः पीनस्कन्धः कम्बुकण्ठो लम्बोष्ठो लम्बनासिकः 34 भग्नवामरदस्तुङ्गसव्यदन्तो महाहनुः ह्रस्वनेत्रत्रयः शूर्पकर्णो निबिडमस्तकः 35 स्तबकाकारकुम्भाग्रो रत्नमौलिर्निरङ्कुशः सर्पहारकटीसूत्रः सर्पयज्ञोपवीतवान् 36 सर्पकोटीरकटकः सर्पग्रैवेयकाङ्गदः सर्पकक्षोदराबन्धः सर्पराजोत्तरच्छदः 37 रक्तो रक्ताम्बरधरो रक्तमालाविभूषणः रक्तेक्षनो रक्तकरो रक्तताल्वोष्ठपल्लवः 38 श्वेतः श्वेताम्बरधरः श्वेतमालाविभूषणः श्वेतातपत्ररुचिरः श्वेतचामरवीजितः 39 सर्वावयवसम्पूर्णः सर्वलक्षणलक्षितः सर्वाभरणशोभाढ्यः सर्वशोभासमन्वितः 40
Sakamadayinipithah sphuradugrasanashrayah | Tejovatishiroratnam satyanityavatamsitah || 31 || Savighnanashinipithah sarvashaktyambujalayah | Lipipadmasanadharo vahnidhamatrayalayah || 32 || Unnataprapado gudhagulphah samvritaparshnikah | Pinajanghah shlishtajanuh sthuloruh pronnamatkatih || 33 || Nimnanabhih sthulakukshih pinavaksha brihadbhujah | Pinaskandhah kambukantho lamboshtho lambanasikah || 34 || Bhagnavamaradastungasavyadanto mahahanuh | Hrasvanetratrayah shurpakarno nibidamastakah || 35 || Stabakakarakumbhagro ratnamaulirnirankushah | Sarpaharakatisutrah sarpayajnopavitavan || 36 || Sarpakotirakatakah sarpagraiveyakangadah | Sarpakakshodarabandhah sarparajottarachchhadah || 37 || Rakto raktambaradharo raktamalavibhushanah | Raktekshano raktakaro raktatalvoshthapallavah || 38 || Shvetah shvetambaradharah shvetamalavibhushanah | Shvetatapatraruchirah shvetachamaravijitah || 39 || Sarvavayavasampurnah sarvalakshanalakshitah | Sarvabharanashobhadhyah sarvashobhasamanvitah || 40 ||
नाम-माला उनके शक्ति-पीठों से होती हुई — सकामदायिनी, तेजोवती, सत्या, सविघ्ननाशिनी — अक्षरों के पद्मासन और अग्नि के त्रिधाम तक जाती है। फिर चरण से मस्तक तक प्रेमपूर्ण रूप-वर्णन: उन्नत प्रपद, गूढ़ गुल्फ, पीन जङ्घा, मिले हुए घुटने, स्थूल ऊरु, गहरी नाभि, चौड़ा वक्ष, विशाल भुजाएँ, शङ्ख-सा कण्ठ, लम्बे ओष्ठ और नासिका, टूटा वाम दन्त और उन्नत दक्षिण दन्त, तीन छोटे नेत्र, सूप-से कान, रत्नमुकुट से मण्डित सघन मस्तक — वे निरङ्कुश हैं। सर्प ही उनकी करधनी, यज्ञोपवीत, कङ्कण, ग्रैवेयक और उत्तरीय हैं। वे रक्तवर्ण हैं — रक्त वस्त्र, रक्त माला, रक्त नेत्र, रक्त कर — और श्वेत भी: श्वेत वस्त्र, श्वेत माला, श्वेत छत्र, श्वेत चामर; सर्व अवयवों से सम्पूर्ण, सर्व लक्षणों से लक्षित, सर्व आभरणों से शोभित।
Verse 7
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यः सर्वकारणकारणम् सर्वदेववरः शार्ङ्गी बीजपूरी गदाधरः 41 शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः किरीटी कुण्डली हारी वनमाली शुभाङ्गदः 42 इक्षुचापधरः शूली चक्रपाणिः सरोजभृत् पाशी धृतोत्पलः शालिमञ्जरीभृत्स्वदन्तभृत् 43 कल्पवल्लीधरो विश्वाभयदैककरो वशी अक्षमालाधरो ज्ञानमुद्रावान् मुद्गरायुधः 44 पूर्णपात्री कम्बुधरो विधृताङ्कुशमूलकः करस्थाम्रफलश्चूतकलिकाभृत्कुठारवान् 45 पुष्करस्थस्वर्णघटीपूर्णरत्नाभिवर्षकः भारतीसुन्दरीनाथो विनायकरतिप्रियः 46 महालक्ष्मीप्रियतमः सिद्धलक्ष्मीमनोरमः रमारमेशपूर्वाङ्गो दक्षिणोमामहेश्वरः 47 महीवराहवामाङ्गो रतिकन्दर्पपश्चिमः आमोदमोदजननः सप्रमोदप्रमोदनः 48 संवर्धितमहावृद्धिरृद्धिसिद्धिप्रवर्धनः दन्तसौमुख्यसुमुखः कान्तिकन्दलिताश्रयः 49 मदनावत्याश्रिताङ्घ्रिः कृतवैमुख्यदुर्मुखः विघ्नसम्पल्लवः पद्मः सर्वोन्नतमदद्रवः 50
Sarvamangalamangalyah sarvakaranakaranam | Sarvadevavarah sharngi bijapuri gadadharah || 41 || Shubhango lokasarangah sutantustantuvardhanah | Kiriti kundali hari vanamali shubhangadah || 42 || Ikshuchapadharah shuli chakrapanih sarojabhrit | Pashi dhritotpalah shalimanjaribhritsvadantabhrit || 43 || Kalpavallidharo vishvabhayadaikakaro vashi | Akshamaladharo jnanamudravan mudgarayudhah || 44 || Purnapatri kambudharo vidhritankushamulakah | Karasthamraphalashchutakalikabhritkutharavan || 45 || Pushkarasthasvarnaghatipurnaratnabhivarshakah | Bharatisundarinatho vinayakaratipriyah || 46 || Mahalakshmipriyatamah siddhalakshmimanoramah | Ramarameshapurvango dakshinomamaheshvarah || 47 || Mahivarahavamango ratikandarpapashchimah | Amodamodajananah sapramodapramodanah || 48 || Samvardhitamahavriddhirriddhisiddhipravardhanah | Dantasaumukhyasumukhah kantikandalitashrayah || 49 || Madanavatyashritanghrih kritavaimukhyadurmukhah | Vighnasampallavah padmah sarvonnatamadadravah || 50 ||
वे समस्त मङ्गलों के मङ्गल और सब कारणों के कारण हैं, सब देवों में वरेण्य। यह दशक उनके अनेक हाथ भरता है: इक्षु-धनुष और बीजपूर, गदा, शूल, चक्र, कमल, पाश, उत्पल, धान की मञ्जरी, अपना दन्त, कल्पवल्ली, विश्व को अभय देने वाला एक हाथ, अक्षमाला, ज्ञानमुद्रा, मुद्गर, पूर्णपात्र, शङ्ख, अङ्कुश, आम्रफल और आम की कली, कुठार; कमल पर रखी स्वर्ण-घटी से वे रत्नों की वर्षा करते हैं। वे भारती-सुन्दरी के नाथ, महालक्ष्मी के प्रियतम हैं; आगे रमा-रमेश, दक्षिण में उमा-महेश्वर, वाम में वराह-भूमि, पीछे रति-कन्दर्प — वे आमोद-प्रमोद के जनक और ऋद्धि-सिद्धि के प्रवर्धक हैं।
Verse 8
विघ्नकृन्निम्नचरणो द्राविणीशक्तिसत्कृतः तीव्राप्रसन्ननयनो ज्वालिनीपालितैकदृक् 51 मोहिनीमोहनो भोगदायिनीकान्तिमण्डनः कामिनीकान्तवक्त्रश्रीरधिष्ठितवसुन्धरः 52 वसुधारामदोन्नादो महाशङ्खनिधिप्रियः नमद्वसुमतीमाली महापद्मनिधिः प्रभुः 53 सर्वसद्गुरुसंसेव्यः शोचिष्केशहृदाश्रयः ईशानमूर्धा देवेन्द्रशिखः पवननन्दनः 54 प्रत्युग्रनयनो दिव्यो दिव्यास्त्रशतपर्वधृक् ऐरावतादिसर्वाशावारणो वारणप्रियः 55 वज्राद्यस्त्रपरीवारो गणचण्डसमाश्रयः जयाजयपरिकरो विजयाविजयावहः 56 अजयार्चितपादाब्जो नित्यानन्दवनस्थितः विलासिनीकृतोल्लासः शौण्डी सौन्दर्यमण्डितः 57 अनन्तानन्तसुखदः सुमङ्गलसुमङ्गलः ज्ञानाश्रयः क्रियाधार इच्छाशक्तिनिषेवितः 58 सुभगासंश्रितपदो ललिताललिताश्रयः कामिनीपालनः कामकामिनीकेलिलालितः 59 सरस्वत्याश्रयो गौरीनन्दनः श्रीनिकेतनः गुरुगुप्तपदो वाचासिद्धो वागीश्वरीपतिः 60
Vighnakrinnimnacharano dravinishaktisatkritah | Tivraprasannanayano jvalinipalitaikadrik || 51 || Mohinimohano bhogadayinikantimandanah | Kaminikantavaktrashriradhishthitavasundharah || 52 || Vasudharamadonnado mahashankhanidhipriyah | Namadvasumatimali mahapadmanidhih prabhuh || 53 || Sarvasadgurusamsevyah shochishkeshahridashrayah | Ishanamurdha devendrashikhah pavananandanah || 54 || Pratyugranayano divyo divyastrashataparvadhrik | Airavatadisarvashavarano varanapriyah || 55 || Vajradyastraparivaro ganachandasamashrayah | Jayajayaparikaro vijayavijayavahah || 56 || Ajayarchitapadabjo nityanandavanasthitah | Vilasinikritollasah shaundi saundaryamanditah || 57 || Anantanantasukhadah sumangalasumangalah | Jnanashrayah kriyadhara ichchhashaktinishevitah || 58 || Subhagasamshritapado lalitalalitashrayah | Kaminipalanah kamakaminikelilalitah || 59 || Sarasvatyashrayo gaurinandanah shriniketanah | Guruguptapado vachasiddho vagishvaripatih || 60 ||
उनके चारों ओर शक्तियाँ और निधियाँ हैं: द्राविणी से सत्कृत, ज्वालिनी से रक्षित दृष्टि, मोहिनी के मोहन, भोगदायिनी की कान्ति से मण्डित, वसुन्धरा के अधिष्ठाता, महाशङ्ख और महापद्म निधियों के प्रिय प्रभु। वे सब सद्गुरुओं से सेव्य हैं; ईशान उनका मूर्धा, देवेन्द्र शिखा, पवन-नन्दन के प्रिय। प्रचण्ड नेत्रों वाले, दिव्य, सौ पर्व वाले दिव्यास्त्र धारण करने वाले, ऐरावत आदि दिग्गजों के स्वामी, गजप्रिय, जया-विजया से सेवित, विजय दिलाने वाले। नित्यानन्द-वन में विलासिनी शक्तियों संग उल्लासमय, सौन्दर्य-मण्डित, अनन्त सुखदाता; ज्ञान के आश्रय, क्रिया के आधार, इच्छाशक्ति से सेवित; सरस्वती के आश्रय, गौरीनन्दन, श्री के निकेतन, वागीश्वरी के पति।
Verse 9
नलिनीकामुको वामारामो ज्येष्ठामनोरमः रौद्रीमुद्रितपादाब्जो हुम्बीजस्तुङ्गशक्तिकः 61 विश्वादिजननत्राणः स्वाहाशक्तिः सकीलकः अमृताब्धिकृतावासो मदघूर्णितलोचनः 62 उच्छिष्टोच्छिष्टगणको गणेशो गणनायकः सार्वकालिकसंसिद्धिर्नित्यसेव्यो दिगम्बरः 63 अनपायोऽनन्तदृष्टिरप्रमेयोऽजरामरः अनाविलोऽप्रतिहतिरच्युतोऽमृतमक्षरः 64 अप्रतर्क्योऽक्षयोऽजय्योऽनाधारोऽनामयोमलः अमेयसिद्धिरद्वैतमघोरोऽग्निसमाननः 65 अनाकारोऽब्धिभूम्यग्निबलघ्नोऽव्यक्तलक्षणः आधारपीठमाधार आधाराधेयवर्जितः 66 आखुकेतन आशापूरक आखुमहारथः इक्षुसागरमध्यस्थ इक्षुभक्षणलालसः 67 इक्षुचापातिरेकश्रीरिक्षुचापनिषेवितः इन्द्रगोपसमानश्रीरिन्द्रनीलसमद्युतिः 68 इन्दीवरदलश्याम इन्दुमण्डलमण्डितः इध्मप्रिय इडाभाग इडावानिन्दिराप्रियः 69 इक्ष्वाकुविघ्नविध्वंसी इतिकर्तव्यतेप्सितः ईशानमौलिरीशान ईशानप्रिय ईतिहा 70
Nalinikamuko vamaramo jyeshthamanoramah | Raudrimudritapadabjo humbijastungashaktikah || 61 || Vishvadijananatranah svahashaktih sakilakah | Amritabdhikritavaso madaghurnitalochanah || 62 || Uchchhishtochchhishtaganako ganesho gananayakah | Sarvakalikasamsiddhirnityasevyo digambarah || 63 || Anapayonantadrishtiraprameyojaramarah | Anavilopratihatirachyutomritamaksharah || 64 || Apratarkyokshayojayyonadharonamayomalah | Ameyasiddhiradvaitamaghorognisamananah || 65 || Anakarobdhibhumyagnibalaghnovyaktalakshanah | Adharapithamadhara adharadheyavarjitah || 66 || Akhuketana ashapuraka akhumaharathah | Ikshusagaramadhyastha ikshubhakshanalalasah || 67 || Ikshuchapatirekashririkshuchapanishevitah | Indragopasamanashririndranilasamadyutih || 68 || Indivaradalashyama indumandalamanditah | Idhmapriya idabhaga idavanindirapriyah || 69 || Ikshvakuvighnavidhvamsi itikartavyatepsitah | Ishanamaulirishana ishanapriya itiha || 70 ||
इस दशक में उच्छिष्ट-गणपति परम्परा के गूढ़ नाम और स्वरों से आरम्भ होने वाली अक्षर-नामावली है: उनका बीज हुम्, शक्ति तुङ्गा, स्वाहा-शक्ति सहित; वे अमृत-सागर में निवास करते हैं, मद से घूर्णित नेत्र, उच्छिष्ट गणों के नायक, दिगम्बर। फिर निषेधों की धारा उनकी परात्परता घोषित करती है: अपाय-रहित, अनन्त दृष्टि, अप्रमेय, अजर-अमर, निर्मल, अप्रतिहत, अच्युत, अमृत, अक्षर, अतर्क्य, अक्षय, अजेय, अनाधार, अनामय, अमल, अमेय-सिद्धि, अद्वैत, अघोर होकर भी अग्नि-समान मुख वाले। मूषक-ध्वज, आशाओं के पूरक, इक्षु-सागर के मध्य विराजमान, इक्षु-भक्षण के लोभी; इन्द्रगोप-सी शोभा, इन्द्रनील-सी द्युति, नीलकमल-दल-से श्याम, चन्द्रमण्डल से मण्डित, इन्दिरा के प्रिय, ईशान-मौलि, ईतियों के नाशक।
Verse 10
ईषणात्रयकल्पान्त ईहामात्रविवर्जितः उपेन्द्र उडुभृन्मौलिरुडुनाथकरप्रियः 71 उन्नतानन उत्तुङ्ग उदारस्त्रिदशाग्रणीः ऊर्जस्वानूष्मलमद ऊहापोहदुरासदः 72 ऋग्यजुःसामनयन ऋद्धिसिद्धिसमर्पकः ऋजुचित्तैकसुलभो ऋणत्रयविमोचनः 73 लुप्तविघ्नः स्वभक्तानां लुप्तशक्तिः सुरद्विषाम् लुप्तश्रीर्विमुखार्चानां लूताविस्फोटनाशनः 74 एकारपीठमध्यस्थ एकपादकृतासनः एजिताखिलदैत्यश्रीरेधिताखिलसंश्रयः 75 ऐश्वर्यनिधिरैश्वर्यमैहिकामुष्मिकप्रदः ऐरम्मदसमोन्मेष ऐरावतसमाननः 76 ओङ्कारवाच्य ओङ्कार ओजस्वानोषधीपतिः औदार्यनिधिरौद्धत्यधैर्य औन्नत्यनिःसमः 77 अङ्कुशः सुरनागानामङ्कुशाकारसंस्थितः अः समस्तविसर्गान्तपदेषु परिकीर्तितः 78 कमण्डलुधरः कल्पः कपर्दी कलभाननः कर्मसाक्षी कर्मकर्ता कर्माकर्मफलप्रदः 79 कदम्बगोलकाकारः कूष्माण्डगणनायकः कारुण्यदेहः कपिलः कथकः कटिसूत्रभृत् 80
Ishanatrayakalpanta ihamatravivarjitah | Upendra udubhrinmaulirudunathakarapriyah || 71 || Unnatanana uttunga udarastridashagranih | Urjasvanushmalamada uhapohadurasadah || 72 || Rigyajuhsamanayana riddhisiddhisamarpakah | Rijuchittaikasulabho rinatrayavimochanah || 73 || Luptavighnah svabhaktanam luptashaktih suradvisham | Luptashrirvimukharchanam lutavisphotanashanah || 74 || Ekarapithamadhyastha ekapadakritasanah | Ejitakhiladaityashriredhitakhilasamshrayah || 75 || Aishvaryanidhiraishvaryamaihikamushmikapradah | Airammadasamonmesha airavatasamananah || 76 || Onkaravachya onkara ojasvanoshadhipatih | Audaryanidhirauddhatyadhairya aunnatyanihsamah || 77 || Ankushah suranaganamankushakarasamsthitah | Ah samastavisargantapadeshu parikirtitah || 78 || Kamandaludharah kalpah kapardi kalabhananah | Karmasakshi karmakarta karmakarmaphalapradah || 79 || Kadambagolakakarah kushmandagananayakah | Karunyadehah kapilah kathakah katisutrabhrit || 80 ||
स्वर-नाम आगे बढ़ते हैं: वे उपेन्द्र हैं, चन्द्र को मुकुट में धारण करने वाले; उन्नत मुख, उत्तुङ्ग, उदार, देवों के अग्रणी, ऊर्जस्वी, ऊहापोह से परे। ऋक्-यजुः-साम उनके नेत्र हैं; वे ऋद्धि-सिद्धि अर्पित करते हैं, सरल चित्त वालों को सहज सुलभ हैं, तीन ऋणों से छुड़ाते हैं। भक्तों के विघ्न लुप्त हो जाते हैं, देवद्रोहियों की शक्ति लुप्त हो जाती है। एकार-पीठ के मध्य एक पाद मोड़कर आसीन, समस्त दैत्य-श्री को कम्पित करने वाले, सब आश्रयों की वृद्धि करने वाले। ऐश्वर्य के निधि, इहलोक-परलोक दोनों के दाता, ऐरावत-से मुख वाले; ओङ्कार से वाच्य, स्वयं ओङ्कार, ओजस्वी, ओषधियों के पति; औदार्य के निधि, औन्नत्य में अनुपम; देवों और नागों के अङ्कुश, अङ्कुश के आकार में स्थित, और पदों के अन्त का विसर्ग 'अः' भी वही हैं। क-नामों में वे कमण्डलुधारी, कपर्दी, कलभ-मुख, कर्मसाक्षी, कर्मकर्ता और कर्म-अकर्म के फलदाता, कदम्ब-गोलक-आकार, कूष्माण्ड-गणों के नायक, करुणा-शरीर, कपिल, कथक, कटिसूत्रधारी हैं।
Verse 11
खर्वः खड्गप्रियः खड्गः खान्तान्तःस्थः खनिर्मलः खल्वाटशृङ्गनिलयः खट्वाङ्गी खदुरासदः 81 गुणाढ्यो गहनो गद्यो गद्यपद्यसुधार्णवः गद्यगानप्रियो गर्जो गीतगीर्वाणपूर्वजः 82 गुह्याचाररतो गुह्यो गुह्यागमनिरूपितः गुहाशयो गुडाब्धिस्थो गुरुगम्यो गुरुर्गुरुः 83 घण्टाघर्घरिकामाली घटकुम्भो घटोदरः ङकारवाच्यो ङाकारो ङकाराकारशुण्डभृत् 84 चण्डश्चण्डेश्वरश्चण्डी चण्डेशश्चण्डविक्रमः चराचरपिता चिन्तामणिश्चर्वणलालसः 85 छन्दश्छन्दोद्भवश्छन्दो दुर्लक्ष्यश्छन्दविग्रहः जगद्योनिर्जगत्साक्षी जगदीशो जगन्मयः 86 जप्यो जपपरो जाप्यो जिह्वासिंहासनप्रभुः स्रवद्गण्डोल्लसद्धानझङ्कारिभ्रमराकुलः 87 टङ्कारस्फारसंरावष्टङ्कारमणिनूपुरः ठद्वयीपल्लवान्तस्थसर्वमन्त्रेषु सिद्धिदः 88 डिण्डिमुण्डो डाकिनीशो डामरो डिण्डिमप्रियः ढक्कानिनादमुदितो ढौङ्को ढुण्ढिविनायकः 89 तत्त्वानां प्रकृतिस्तत्त्वं तत्त्वम्पदनिरूपितः तारकान्तरसंस्थानस्तारकस्तारकान्तकः 90
Kharvah khadgapriyah khadgah khantantahsthah khanirmalah | Khalvatashringanilayah khatvangi khadurasadah || 81 || Gunadhyo gahano gadyo gadyapadyasudharnavah | Gadyaganapriyo garjo gitagirvanapurvajah || 82 || Guhyachararato guhyo guhyagamanirupitah | Guhashayo gudabdhistho gurugamyo gururguruh || 83 || Ghantaghargharikamali ghatakumbho ghatodarah | Nakaravachyo nakaro nakarakarashundabhrit || 84 || Chandashchandeshvarashchandi chandeshashchandavikramah | Characharapita chintamanishcharvanalalasah || 85 || Chhandashchhandodbhavashchhando durlakshyashchhandavigrahah | Jagadyonirjagatsakshi jagadisho jaganmayah || 86 || Japyo japaparo japyo jihvasimhasanaprabhuh | Sravadgandollasaddhanajhankaribhramarakulah || 87 || Tankaraspharasamravashtankaramaninupurah | Thadvayipallavantasthasarvamantreshu siddhidah || 88 || Dindimundo dakinisho damaro dindimapriyah | Dhakkaninadamudito dhaunko dhundhivinayakah || 89 || Tattvanam prakritistattvam tattvampadanirupitah | Tarakantarasamsthanastarakastarakantakah || 90 ||
अब माला व्यञ्जनों से चलती है: ख से वे खर्व, खड्गप्रिय, खट्वाङ्गी, दुरासद हैं; ग से गुणाढ्य, गहन, गद्य-पद्य-सुधा के सागर, गान-प्रिय, गीत-गन्धर्वों के पूर्वज, गुह्य आचारों में रत, गुह्य आगमों में निरूपित, हृदय-गुहा में शयन करने वाले, गुरुओं के भी गुरु। घ से घण्टा-घर्घरिका की माला वाले, घट-से कुम्भ और घट-से उदर वाले; ङ से ङकार-वाच्य, जिनकी सूँड़ ङकार के आकार की है। च से चण्ड, चण्डेश्वर, चण्डविक्रम, चराचर के पिता, चिन्तामणि, चर्वण के लोभी; छ से छन्द और छन्दों के उद्भव; ज से जगद्योनि, जगत्साक्षी, जगदीश, जगन्मय, जप्य, जाप्य, जिह्वा-सिंहासन के प्रभु — बहते गण्ड-मद पर गुञ्जते भ्रमरों से घिरे। ट-ठ से टङ्कार भरते मणि-नूपुर और दोनों ठकारों के मध्य सब मन्त्रों में सिद्धिदाता; ड-ढ से डाकिनियों के ईश, डमरु-प्रिय, ढक्का-निनाद से मुदित ढुण्ढि-विनायक। त से वे तत्त्वों की प्रकृति और स्वयं तत्त्व हैं, 'तत् त्वम्' पद से निरूपित, तारों के मध्य विराजमान, तारक (उद्धारक) और तारकासुर के अन्तक।
Verse 12
स्थाणुः स्थाणुप्रियः स्थाता स्थावरं जङ्गमं जगत् दक्षयज्ञप्रमथनो दाता दानं दमो दया 91 दयावान्दिव्यविभवो दण्डभृद्दण्डनायकः दन्तप्रभिन्नाभ्रमालो दैत्यवारणदारणः 92 दंष्ट्रालग्नद्वीपघटो देवार्थनृगजाकृतिः धनं धनपतेर्बन्धुर्धनदो धरणीधरः 93 ध्यानैकप्रकटो ध्येयो ध्यानं ध्यानपरायणः ध्वनिप्रकृतिचीत्कारो ब्रह्माण्डावलिमेखलः 94 नन्द्यो नन्दिप्रियो नादो नादमध्यप्रतिष्ठितः निष्कलो निर्मलो नित्यो नित्यानित्यो निरामयः 95 परं व्योम परं धाम परमात्मा परं पदम् 96 परात्परः पशुपतिः पशुपाशविमोचनः पूर्णानन्दः परानन्दः पुराणपुरुषोत्तमः 97 पद्मप्रसन्नवदनः प्रणताज्ञाननाशनः प्रमाणप्रत्ययातीतः प्रणतार्तिनिवारणः 98 फणिहस्तः फणिपतिः फूत्कारः फणितप्रियः बाणार्चिताङ्घ्रियुगलो बालकेलिकुतूहली ब्रह्म ब्रह्मार्चितपदो ब्रह्मचारी बृहस्पतिः 99 बृहत्तमो ब्रह्मपरो ब्रह्मण्यो ब्रह्मवित्प्रियः बृहन्नादाग्र्यचीत्कारो ब्रह्माण्डावलिमेखलः 100
Sthanuh sthanupriyah sthata sthavaram jangamam jagat | Dakshayajnapramathano data danam damo daya || 91 || Dayavandivyavibhavo dandabhriddandanayakah | Dantaprabhinnabhramalo daityavaranadaranah || 92 || Damshtralagnadvipaghato devarthanrigajakritih | Dhanam dhanapaterbandhurdhanado dharanidharah || 93 || Dhyanaikaprakato dhyeyo dhyanam dhyanaparayanah | Dhvaniprakritichitkaro brahmandavalimekhalah || 94 || Nandyo nandipriyo nado nadamadhyapratishthitah | Nishkalo nirmalo nityo nityanityo niramayah || 95 || Param vyoma param dhama paramatma param padam || 96 || Paratparah pashupatih pashupashavimochanah | Purnanandah paranandah puranapurushottamah || 97 || Padmaprasannavadanah pranatajnananashanah | Pramanapratyayatitah pranatartinivaranah || 98 || Phanihastah phanipatih phutkarah phanitapriyah | Banarchitanghriyugalo balakelikutuhali | Brahma brahmarchitapado brahmachari brihaspatih || 99 || Brihattamo brahmaparo brahmanyo brahmavitpriyah | Brihannadagryachitkaro brahmandavalimekhalah || 100 ||
वे स्थाणु हैं और स्थाणु (शिव) के प्रिय, स्थावर-जङ्गम जगत स्वयं; दक्ष-यज्ञ के प्रमथन; द से दाता, दान, दम और दया; दयावान, दिव्य विभव वाले, दण्डधारी दण्डनायक, दन्त से मेघमाला बेधने वाले, दैत्यों के गज-विदारक, जिनकी दंष्ट्रा में द्वीपों के घट टँगे हैं, देवों के लिए नर-गज आकृति धारण करने वाले। ध से वे धन और धनपति कुबेर के बन्धु, धनद, धरणीधर हैं; ध्यान मात्र से प्रकट, स्वयं ध्येय, ध्यान और ध्यान-परायण; उनकी चीत्कार ध्वनि की प्रकृति है, ब्रह्माण्डों की पंक्ति उनकी मेखला। न से नन्द्य, नादमध्य में प्रतिष्ठित नाद, निष्कल, निर्मल, नित्य, नित्य-अनित्य से परे, निरामय। प से परम व्योम, परम धाम, परमात्मा, परम पद, परात्पर; पशुओं को पाश से छुड़ाने वाले पशुपति; पूर्णानन्द, परानन्द, पुराण-पुरुषोत्तम; प्रसन्न कमल-मुख, प्रणतों का अज्ञान नष्ट करने वाले, प्रमाण-प्रत्यय से अतीत, प्रणतों की पीड़ा हरने वाले। फ-ब से फणि-हस्त, फणिपति, फूत्कार, बाण से अर्चित चरण, बाल-क्रीड़ा के कुतूहली; वे स्वयं ब्रह्म हैं, ब्रह्मा से अर्चित पद, ब्रह्मचारी, बृहस्पति, बृहत्तम, ब्रह्मज्ञों के प्रिय।
Verse 13
भ्रूक्षेपदत्तलक्ष्मीको भर्गो भद्रो भयापहः भगवान् भक्तिसुलभो भूतिदो भूतिभूषणः 101 भव्यो भूतालयो भोगदाता भ्रूमध्यगोचरः मन्त्रो मन्त्रपतिर्मन्त्री मदमत्तो मनो मयः 102 मेखलाहीश्वरो मन्दगतिर्मन्दनिभेक्षणः महाबलो महावीर्यो महाप्राणो महामनाः 103 यज्ञो यज्ञपतिर्यज्ञगोप्ता यज्ञफलप्रदः यशस्करो योगगम्यो याज्ञिको याजकप्रियः 104 रसो रसप्रियो रस्यो रञ्जको रावणार्चितः राज्यरक्षाकरो रत्नगर्भो राज्यसुखप्रदः 105 लक्षो लक्षपतिर्लक्ष्यो लयस्थो लड्डुकप्रियः लासप्रियो लास्यपरो लाभकृल्लोकविश्रुतः 106 वरेण्यो वह्निवदनो वन्द्यो वेदान्तगोचरः विकर्ता विश्वतश्चक्षुर्विधाता विश्वतोमुखः 107 वामदेवो विश्वनेता वज्रिवज्रनिवारणः विवस्वद्बन्धनो विश्वाधारो विश्वेश्वरो विभुः 108 शब्दब्रह्म शमप्राप्यः शम्भुशक्तिगणेश्वरः शास्ता शिखाग्रनिलयः शरण्यः शम्बरेश्वरः 109 षडृतुकुसुमस्रग्वी षडाधारः षडक्षरः संसारवैद्यः सर्वज्ञः सर्वभेषजभेषजम् 110
Bhrukshepadattalakshmiko bhargo bhadro bhayapahah | Bhagavan bhaktisulabho bhutido bhutibhushanah || 101 || Bhavyo bhutalayo bhogadata bhrumadhyagocharah | Mantro mantrapatirmantri madamatto mano mayah || 102 || Mekhalahishvaro mandagatirmandanibhekshanah | Mahabalo mahaviryo mahaprano mahamanah || 103 || Yajno yajnapatiryajnagopta yajnaphalapradah | Yashaskaro yogagamyo yajniko yajakapriyah || 104 || Raso rasapriyo rasyo ranjako ravanarchitah | Rajyarakshakaro ratnagarbho rajyasukhapradah || 105 || Laksho lakshapatirlakshyo layastho laddukapriyah | Lasapriyo lasyaparo labhakrillokavishrutah || 106 || Varenyo vahnivadano vandyo vedantagocharah | Vikarta vishvatashchakshurvidhata vishvatomukhah || 107 || Vamadevo vishvaneta vajrivajranivaranah | Vivasvadbandhano vishvadharo vishveshvaro vibhuh || 108 || Shabdabrahma shamaprapyah shambhushaktiganeshvarah | Shasta shikhagranilayah sharanyah shambareshvarah || 109 || Shadritukusumasragvi shadadharah shadaksharah | Samsaravaidyah sarvajnah sarvabheshajabheshajam || 110 ||
भ से वे भ्रू-क्षेप मात्र से लक्ष्मी देते हैं — भर्ग, भद्र, भय हरने वाले, भगवान, भक्ति से सुलभ, भूति देने और भूति से भूषित, भव्य, भूतों के आलय, भोगदाता, भ्रूमध्य में गोचर। म से मन्त्र, मन्त्रपति, मन्त्री, मद-मत्त, मनोमय; मेखला के सर्पों के ईश्वर, मन्द गति और कोमल दृष्टि वाले; महाबल, महावीर्य, महाप्राण, महामना। य से यज्ञ, यज्ञपति, यज्ञ के गोप्ता और फलदाता, यशस्कर, योगगम्य, याज्ञिक, याजक-प्रिय। र से रस, रसप्रिय, रञ्जक, रावण से अर्चित, राज्य की रक्षा करने वाले, रत्नगर्भ, राज्य-सुखप्रद। ल से लक्ष और लक्षपति, लक्ष्य, लय में स्थित — और प्रसिद्ध लड्डुकप्रिय, लास्य-प्रिय, लाभ कराने वाले, लोक-विश्रुत। व से वरेण्य, वह्निवदन, वन्द्य, वेदान्त-गोचर, विश्वतश्चक्षु, विधाता, विश्वतोमुख, वामदेव, विश्वनेता, वज्र-निवारक, विश्वाधार, विश्वेश्वर, विभु। श से शब्दब्रह्म, शम से प्राप्य, शम्भु-शक्ति के गणेश्वर, शास्ता, शिखाग्र-निवासी, शरण्य, शम्बरेश्वर। ष से षड्-ऋतुओं के पुष्पों की माला वाले, षडाधार, षडक्षर; और स से संसार के वैद्य, सर्वज्ञ, सब औषधियों की औषधि।
Verse 14
सृष्टिस्थितिलयक्रीडः सुरकुञ्जरभेदकः सिन्दूरितमहाकुम्भः सदसद्भक्तिदायकः 111 साक्षी समुद्रमथनः स्वयंवेद्यः स्वदक्षिणः स्वतन्त्रः सत्यसङ्कल्पः सामगानरतः सुखी 112 हंसो हस्तिपिशाचीशो हवनं हव्यकव्यभुक् हव्यं हुतप्रियो हृष्टो हृल्लेखामन्त्रमध्यगः 113 क्षेत्राधिपः क्षमाभर्ता क्षमाक्षमपरायणः क्षिप्रक्षेमकरः क्षेमानन्दः क्षोणीसुरद्रुमः 114 धर्मप्रदोऽर्थदः कामदाता सौभाग्यवर्धनः विद्याप्रदो विभवदो भुक्तिमुक्तिफलप्रदः 115 आभिरूप्यकरो वीरश्रीप्रदो विजयप्रदः सर्ववश्यकरो गर्भदोषहा पुत्रपौत्रदः 116 मेधादः कीर्तिदः शोकहारी दौर्भाग्यनाशनः प्रतिवादिमुखस्तम्भो रुष्टचित्तप्रसादनः 117 पराभिचारशमनो दुःखहा बन्धमोक्षदः लवस्त्रुटिः कला काष्ठा निमेषस्तत्परक्षणः 118 घटी मुहूर्तः प्रहरो दिवा नक्तमहर्निशम् पक्षो मासर्त्वयनाब्दयुगं कल्पो महालयः 119 राशिस्तारा तिथिर्योगो वारः करणमंशकम् लग्नं होरा कालचक्रं मेरुः सप्तर्षयो ध्रुवः 120
Srishtisthitilayakridah surakunjarabhedakah | Sinduritamahakumbhah sadasadbhaktidayakah || 111 || Sakshi samudramathanah svayamvedyah svadakshinah | Svatantrah satyasankalpah samaganaratah sukhi || 112 || Hamso hastipishachisho havanam havyakavyabhuk | Havyam hutapriyo hrishto hrillekhamantramadhyagah || 113 || Kshetradhipah kshamabharta kshamakshamaparayanah | Kshiprakshemakarah kshemanandah kshonisuradrumah || 114 || Dharmapradorthadah kamadata saubhagyavardhanah | Vidyaprado vibhavado bhuktimuktiphalapradah || 115 || Abhirupyakaro virashriprado vijayapradah | Sarvavashyakaro garbhadoshaha putrapautradah || 116 || Medhadah kirtidah shokahari daurbhagyanashanah | Prativadimukhastambho rushtachittaprasadanah || 117 || Parabhicharashamano duhkhaha bandhamokshadah | Lavastrutih kala kashtha nimeshastatparakshanah || 118 || Ghati muhurtah praharo diva naktamaharnisham | Paksho masartvayanabdayugam kalpo mahalayah || 119 || Rashistara tithiryogo varah karanamamshakam | Lagnam hora kalachakram meruh saptarshayo dhruvah || 120 ||
वे सृष्टि-स्थिति-लय की क्रीड़ा करते हैं, देव-गज (ऐरावत) के भेदक हैं, सिन्दूर से रँगे महाकुम्भ (गण्डस्थल) वाले, सत्-असत् दोनों में भक्ति देने वाले। साक्षी, समुद्र-मथन, स्वयंवेद्य, स्वदक्षिण, स्वतन्त्र, सत्यसङ्कल्प, सामगान में रत, सुखी। ह से वे हंस हैं, हस्ति-पिशाची के ईश, स्वयं हवन और हव्य-कव्य के भोक्ता, हव्य, हुत-प्रिय, हृष्ट, हृल्लेखा-मन्त्र के मध्य विराजमान। क्ष से क्षेत्राधिप, क्षमा (पृथ्वी) के भर्ता, क्षमा-परायण, क्षिप्र क्षेमकारी, क्षेमानन्द, पृथ्वी पर देवों के कल्पवृक्ष। फिर दाता-नाम: धर्मप्रद, अर्थद, कामदाता, सौभाग्यवर्धन, विद्याप्रद, विभवद, भुक्ति-मुक्ति-फलप्रद; सौन्दर्य, वीरश्री और विजय देने वाले, सर्ववशकारी, गर्भदोष हरने वाले, पुत्र-पौत्रद, मेधाद, कीर्तिद, शोकहारी, दौर्भाग्यनाशन; प्रतिवादी का मुख स्तम्भित करने वाले, रुष्ट चित्त को प्रसन्न करने वाले, पर-अभिचार शमन करने वाले, दुःखहर, बन्ध-मोक्षद। और तब काल स्वयं उनका शरीर बन जाता है: लव, त्रुटि, कला, काष्ठा, निमेष, तत्पर, क्षण, घटी, मुहूर्त, प्रहर, दिन-रात, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, वर्ष, युग, कल्प, महालय; राशि, तारा, तिथि, योग, वार, करण, अंशक, लग्न, होरा, कालचक्र, मेरु, सप्तर्षि और ध्रुव।
Verse 15
राहुर्मन्दः कविर्जीवो बुधो भौमः शशी रविः कालः सृष्टिः स्थितिर्विश्वं स्थावरं जङ्गमं जगत् 121 भूरापोऽग्निर्मरुद्व्योमाहङ्कृतिः प्रकृतिः पुमान् ब्रह्मा विष्णुः शिवो रुद्र ईशः शक्तिः सदाशिवः 122 त्रिदशाः पितरः सिद्धा यक्षा रक्षांसि किन्नराः सिद्धविद्याधरा भूता मनुष्याः पशवः खगाः 123 समुद्राः सरितः शैला भूतं भव्यं भवोद्भवः साङ्ख्यं पातञ्जलं योगं पुराणानि श्रुतिः स्मृतिः 124 वेदाङ्गानि सदाचारो मीमांसा न्यायविस्तरः आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वं काव्यनाटकम् 125 वैखानसं भागवतं मानुषं पाञ्चरात्रकम् शैवं पाशुपतं कालामुखम्भैरवशासनम् 126 शाक्तं वैनायकं सौरं जैनमार्हतसंहिता सदसद्व्यक्तमव्यक्तं सचेतनमचेतनम् 127 बन्धो मोक्षः सुखं भोगो योगः सत्यमणुर्महान् स्वस्ति हुम्फट् स्वधा स्वाहा श्रौषट् वौषट् वषण् नमः 128 ज्ञानं विज्ञानमानन्दो बोधः संवित्समोऽसमः एक एकाक्षराधार एकाक्षरपरायणः 129 एकाग्रधीरेकवीर एकोऽनेकस्वरूपधृक् द्विरूपो द्विभुजो द्व्यक्षो द्विरदो द्वीपरक्षकः 130
Rahurmandah kavirjivo budho bhaumah shashi ravih | Kalah srishtih sthitirvishvam sthavaram jangamam jagat || 121 || Bhurapognirmarudvyomahankritih prakritih puman | Brahma vishnuh shivo rudra ishah shaktih sadashivah || 122 || Tridashah pitarah siddha yaksha rakshamsi kinnarah | Siddhavidyadhara bhuta manushyah pashavah khagah || 123 || Samudrah saritah shaila bhutam bhavyam bhavodbhavah | Sankhyam patanjalam yogam puranani shrutih smritih || 124 || Vedangani sadacharo mimamsa nyayavistarah | Ayurvedo dhanurvedo gandharvam kavyanatakam || 125 || Vaikhanasam bhagavatam manusham pancharatrakam | Shaivam pashupatam kalamukhambhairavashasanam || 126 || Shaktam vainayakam sauram jainamarhatasamhita | Sadasadvyaktamavyaktam sachetanamachetanam || 127 || Bandho mokshah sukham bhogo yogah satyamanurmahan | Svasti humphat svadha svaha shraushat vaushat vashan namah 128 || Jnanam vijnanamanando bodhah samvitsamosamah | Eka ekaksharadhara ekaksharaparayanah || 129 || Ekagradhirekavira ekonekasvarupadhrik | Dvirupo dvibhujo dvyaksho dvirado dviparakshakah || 130 ||
ब्रह्माण्ड-गणना आगे बढ़ती है: वे राहु और शनि हैं, शुक्र और बृहस्पति, बुध, मङ्गल, चन्द्र और सूर्य; काल, सृष्टि, स्थिति, स्थावर-जङ्गम विश्व; भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, अहङ्कार, प्रकृति और पुरुष; ब्रह्मा, विष्णु, शिव, रुद्र, ईश, शक्ति, सदाशिव; देवगण, पितर, सिद्ध, यक्ष, राक्षस, किन्नर, विद्याधर, भूत, मनुष्य, पशु, पक्षी; समुद्र, नदियाँ, पर्वत, भूत-भविष्य और भव के उद्भव। वे ज्ञान का हर मार्ग हैं: सांख्य, पातञ्जल योग, पुराण, श्रुति, स्मृति, वेदाङ्ग, सदाचार, मीमांसा, न्याय का विस्तार, आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्व, काव्य-नाटक, और हर शासन — वैखानस, भागवत, मानुष, पाञ्चरात्र, शैव, पाशुपत, कालामुख, भैरव, शाक्त, वैनायक, सौर और जैन-आर्हत संहिता। वे सत्-असत्, व्यक्त-अव्यक्त, सचेतन-अचेतन, बन्ध और मोक्ष, सुख, भोग, योग, सत्य, अणु और महान हैं; स्वस्ति, हुम्, फट्, स्वधा, स्वाहा, श्रौषट्, वौषट्, वषट् और नमः — ये यज्ञ-घोष भी वही हैं; ज्ञान, विज्ञान, आनन्द, बोध, संवित्। और फिर संख्या-नाम आरम्भ होते हैं: एक, एकाक्षर के आधार, एकाग्रधी, एकवीर — एक होकर अनेक रूप धारण करने वाले; और द्वि: द्विरूप, द्विभुज, द्व्यक्ष, द्विरद, द्वीप-रक्षक।
Verse 16
द्वैमातुरो द्विवदनो द्वन्द्वहीनो द्वयातिगः त्रिधामा त्रिकरस्त्रेता त्रिवर्गफलदायकः 131 त्रिगुणात्मा त्रिलोकादिस्त्रिशक्तीशस्त्रिलोचनः चतुर्विधवचोवृत्तिपरिवृत्तिप्रवर्तकः 132 चतुर्बाहुश्चतुर्दन्तश्चतुरात्मा चतुर्भुजः चतुर्विधोपायमयश्चतुर्वर्णाश्रमाश्रयः 133 चतुर्थीपूजनप्रीतश्चतुर्थीतिथिसम्भवः पञ्चाक्षरात्मा पञ्चात्मा पञ्चास्यः पञ्चकृत्तमः 134 पञ्चाधारः पञ्चवर्णः पञ्चाक्षरपरायणः पञ्चतालः पञ्चकरः पञ्चप्रणवमातृकः 135 पञ्चब्रह्ममयस्फूर्तिः पञ्चावरणवारितः पञ्चभक्षप्रियः पञ्चबाणः पञ्चशिखात्मकः 136 षट्कोणपीठः षट्चक्रधामा षड्ग्रन्थिभेदकः षडङ्गध्वान्तविध्वंसी षडङ्गुलमहाह्रदः 137 षण्मुखः षण्मुखभ्राता षट्शक्तिपरिवारितः षड्वैरिवर्गविध्वंसी षडूर्मिभयभञ्जनः 138 षट्तर्कदूरः षट्कर्मा षड्गुणः षड्रसाश्रयः सप्तपातालचरणः सप्तद्वीपोरुमण्डलः 139 सप्तस्वर्लोकमुकुटः सप्तसप्तिवरप्रदः सप्ताङ्गराज्यसुखदः सप्तर्षिगणवन्दितः 140
Dvaimaturo dvivadano dvandvahino dvayatigah | Tridhama trikarastreta trivargaphaladayakah || 131 || Trigunatma trilokadistrishaktishastrilochanah | Chaturvidhavachovrittiparivrittipravartakah || 132 || Chaturbahushchaturdantashchaturatma chaturbhujah | Chaturvidhopayamayashchaturvarnashramashrayah 133 || Chaturthipujanapritashchaturthitithisambhavah || Panchaksharatma panchatma panchasyah panchakrittamah || 134 || Panchadharah panchavarnah panchaksharaparayanah | Panchatalah panchakarah panchapranavamatrikah || 135 || Panchabrahmamayasphurtih panchavaranavaritah | Panchabhakshapriyah panchabanah panchashikhatmakah || 136 || Shatkonapithah shatchakradhama shadgranthibhedakah | Shadangadhvantavidhvamsi shadangulamahahradah || 137 || Shanmukhah shanmukhabhrata shatshaktiparivaritah | Shadvairivargavidhvamsi shadurmibhayabhanjanah || 138 || Shattarkadurah shatkarma shadgunah shadrasashrayah | Saptapatalacharanah saptadviporumandalah || 139 || Saptasvarlokamukutah saptasaptivarapradah | Saptangarajyasukhadah saptarshiganavanditah || 140 ||
संख्या-नाम चढ़ते जाते हैं: दो से वे द्वैमातुर (दो माताओं के पुत्र), द्विवदन, फिर भी द्वन्द्वहीन और द्वैत से परे; तीन से त्रिधामा, त्रिकर, त्रेता, त्रिवर्ग-फलदायक, त्रिगुणात्मा, त्रिलोक के आदि, त्रिशक्तियों के ईश, त्रिलोचन; चार से चारों वाणी-वृत्तियों के प्रवर्तक, चतुर्बाहु, चतुर्दन्त, चतुरात्मा, चार उपायों के मय, चार वर्ण-आश्रमों के आश्रय, चतुर्थी-पूजन से प्रीत और चतुर्थी तिथि में प्रकट। पाँच से पञ्चाक्षर के आत्मा, पञ्चात्मा, पञ्चास्य, पञ्चकृत्तम, पञ्चाधार, पञ्चवर्ण, पञ्चाक्षर-परायण, पञ्चताल, पञ्चकर, पाँच प्रणवों की मातृका, पञ्चब्रह्ममय स्फूर्ति, पञ्चावरण से घिरे, पञ्चभक्ष-प्रिय, पञ्चबाण, पञ्चशिखात्मक। छह से षट्कोण-पीठ, षट्चक्र-धाम, षड्ग्रन्थि-भेदक, षडङ्ग-अन्धकार के विध्वंसी, षण्मुख (कार्तिकेय) के भ्राता, षट्शक्तियों से घिरे, छह अन्तःशत्रुओं के विध्वंसी, षडूर्मि-भय के भञ्जक, षट्तर्कों से दूर, षट्कर्मा, षड्गुण, षड्रसों के आश्रय। सात से वे सप्त पातालों में चरण और सप्त द्वीपों का विशाल मण्डल रखते हैं, सप्त स्वर्लोक उनका मुकुट है, सप्ताश्व सूर्य को वर देने वाले, सप्ताङ्ग राज्य का सुख देने वाले, सप्तर्षि-गण से वन्दित।
Verse 17
सप्तच्छन्दोनिधिः सप्तहोत्रः सप्तस्वराश्रयः सप्ताब्धिकेलिकासारः सप्तमातृनिषेवितः 141 सप्तच्छन्दो मोदमदः सप्तच्छन्दो मखप्रभुः अष्टमूर्तिर्ध्येयमूर्तिरष्टप्रकृतिकारणम् 142 अष्टाङ्गयोगफलभृदष्टपत्राम्बुजासनः अष्टशक्तिसमानश्रीरष्टैश्वर्यप्रवर्धनः 143 अष्टपीठोपपीठश्रीरष्टमातृसमावृतः अष्टभैरवसेव्योऽष्टवसुवन्द्योऽष्टमूर्तिभृत् 144 अष्टचक्रस्फुरन्मूर्तिरष्टद्रव्यहविःप्रियः अष्टश्रीरष्टसामश्रीरष्टैश्वर्यप्रदायकः नवनागासनाध्यासी नवनिध्यनुशासितः 145 नवद्वारपुरावृत्तो नवद्वारनिकेतनः नवनाथमहानाथो नवनागविभूषितः 146 नवनारायणस्तुल्यो नवदुर्गानिषेवितः नवरत्नविचित्राङ्गो नवशक्तिशिरोद्धृतः 147 दशात्मको दशभुजो दशदिक्पतिवन्दितः दशाध्यायो दशप्राणो दशेन्द्रियनियामकः 148 दशाक्षरमहामन्त्रो दशाशाव्यापिविग्रहः एकादशमहारुद्रैःस्तुतश्चैकादशाक्षरः 149 द्वादशद्विदशाष्टादिदोर्दण्डास्त्रनिकेतनः त्रयोदशभिदाभिन्नो विश्वेदेवाधिदैवतम् 150
Saptachchhandonidhih saptahotrah saptasvarashrayah | Saptabdhikelikasarah saptamatrinishevitah || 141 || Saptachchhando modamadah saptachchhando makhaprabhuh | Ashtamurtirdhyeyamurtirashtaprakritikaranam || 142 || Ashtangayogaphalabhridashtapatrambujasanah | Ashtashaktisamanashrirashtaishvaryapravardhanah || 143 || Ashtapithopapithashrirashtamatrisamavritah | Ashtabhairavasevyoshtavasuvandyoshtamurtibhrit || 144 || Ashtachakrasphuranmurtirashtadravyahavihpriyah | Ashtashrirashtasamashrirashtaishvaryapradayakah | Navanagasanadhyasi navanidhyanushasitah || 145 || Navadvarapuravritto navadvaraniketanah | Navanathamahanatho navanagavibhushitah || 146 || Navanarayanastulyo navadurganishevitah | Navaratnavichitrango navashaktishiroddhritah || 147 || Dashatmako dashabhujo dashadikpativanditah | Dashadhyayo dashaprano dashendriyaniyamakah || 148 || Dashaksharamahamantro dashashavyapivigrahah | Ekadashamaharudraihstutashchaikadashaksharah || 149 || Dvadashadvidashashtadidordandastraniketanah | Trayodashabhidabhinno vishvedevadhidaivatam || 150 ||
वे सप्त छन्दों के निधि, सप्त होत्र, सप्त स्वरों के आश्रय, सप्त सागरों के क्रीड़ा-सरोवर, सप्त मातृकाओं से सेवित हैं। आठ से अष्टमूर्ति, ध्येयमूर्ति, अष्ट प्रकृतियों के कारण, अष्टाङ्ग योग का फल देने वाले, अष्टदल कमल पर आसीन, अष्ट शक्तियों के समान श्री वाले, अष्ट ऐश्वर्यों के प्रवर्धक, अष्ट पीठ-उपपीठों की श्री, अष्ट मातृकाओं से आवृत, अष्ट भैरवों से सेव्य, अष्ट वसुओं से वन्द्य, अष्टमूर्तिधारी, अष्ट चक्रों में स्फुरित, अष्ट द्रव्यों की हवि के प्रिय, अष्ट ऐश्वर्यों के दाता। नौ से नवनागों के आसन पर विराजमान, नवनिधियों के अनुशासक, नवद्वार-पुर से घिरे और उसी में निवास, नवनाथों के महानाथ, नवनागों से विभूषित, नवनारायण-तुल्य, नवदुर्गाओं से सेवित, नवरत्नों से विचित्र अङ्ग, नवशक्तियों से शिरोधृत। दस से दशात्मक, दशभुज, दश दिक्पालों से वन्दित, दश प्राण, दशेन्द्रिय-नियामक, दशाक्षर महामन्त्र, दशों दिशाओं में व्यापी विग्रह। ग्यारह से एकादश महारुद्रों से स्तुत, एकादशाक्षर; बारह से द्वादश-द्विदश-अष्ट भुजदण्डों के अस्त्र-निकेतन; तेरह से त्रयोदश भेदों में भिन्न, विश्वेदेवों के अधिदैवत।
Verse 18
चतुर्दशेन्द्रवरदश्चतुर्दशमनुप्रभुः चतुर्दशाद्यविद्याढ्यश्चतुर्दशजगत्पतिः 151 सामपञ्चदशः पञ्चदशीशीतांशुनिर्मलः तिथिपञ्चदशाकारस्तिथ्या पञ्चदशार्चितः 152 षोडशाधारनिलयः षोडशस्वरमातृकः षोडशान्तपदावासः षोडशेन्दुकलात्मकः 153 कलासप्तदशी सप्तदशसप्तदशाक्षरः अष्टादशद्वीपपतिरष्टादशपुराणकृत् 154 अष्टादशौषधीसृष्टिरष्टादशविधिः स्मृतः अष्टादशलिपिव्यष्टिसमष्टिज्ञानकोविदः 155 अष्टादशान्नसम्पत्तिरष्टादशविजातिकृत् एकविंशः पुमानेकविंशत्यङ्गुलिपल्लवः 156 चतुर्विंशतितत्त्वात्मा पञ्चविंशाख्यपूरुषः सप्तविंशतितारेशः सप्तविंशतियोगकृत् 157 द्वात्रिंशद्भैरवाधीशश्चतुस्त्रिंशन्महाह्रदः षट्त्रिंशत्तत्त्वसम्भूतिरष्टत्रिंशत्कलात्मकः 158 पञ्चाशद्विष्णुशक्तीशः पञ्चाशन्मातृकालयः द्विपञ्चाशद्वपुःश्रेणीत्रिषष्ट्यक्षरसंश्रयः पञ्चाशदक्षरश्रेणीपञ्चाशद्रुद्रविग्रहः 159 चतुःषष्टिमहासिद्धियोगिनीवृन्दवन्दितः नमदेकोनपञ्चाशन्मरुद्वर्गनिरर्गलः 160
Chaturdashendravaradashchaturdashamanuprabhuh | Chaturdashadyavidyadhyashchaturdashajagatpatih || 151 || Samapanchadashah panchadashishitamshunirmalah | Tithipanchadashakarastithya panchadasharchitah || 152 || Shodashadharanilayah shodashasvaramatrikah | Shodashantapadavasah shodashendukalatmakah || 153 || Kalasaptadashi saptadashasaptadashaksharah | Ashtadashadvipapatirashtadashapuranakrit || 154 || Ashtadashaushadhisrishtirashtadashavidhih smritah | Ashtadashalipivyashtisamashtijnanakovidah || 155 || Ashtadashannasampattirashtadashavijatikrit | Ekavimshah pumanekavimshatyangulipallavah || 156 || Chaturvimshatitattvatma panchavimshakhyapurushah | Saptavimshatitareshah saptavimshatiyogakrit || 157 || Dvatrimshadbhairavadhishashchatustrimshanmahahradah | Shattrimshattattvasambhutirashtatrimshatkalatmakah || 158 || Panchashadvishnushaktishah panchashanmatrikalayah | Dvipanchashadvapuhshrenitrishashtyaksharasamshrayah | Panchashadaksharashrenipanchashadrudravigrahah || 159 || Chatuhshashtimahasiddhiyoginivrindavanditah | Namadekonapanchashanmarudvarganirargalah || 160 ||
चौदह से वे चौदह इन्द्रों के वरदाता, चौदह मनुओं के प्रभु, चौदह विद्याओं से आढ्य, चौदह भुवनों के पति हैं। पन्द्रह से साम-पञ्चदश, पूर्णिमा के शीतांशु-से निर्मल, पन्द्रह तिथियों के आकार, पञ्चदशी को पूजित। सोलह से षोडश आधारों के निलय, षोडश स्वरों की मातृका, षोडशान्त पद में वास, चन्द्रमा की सोलह कलाओं के आत्मा। सत्रह से सप्तदशी कला और सप्तदशाक्षर। अठारह से अठारह द्वीपों के पति, अठारह पुराणों के कर्ता, अठारह ओषधियों की सृष्टि, अठारह विधियों में स्मृत, अठारह लिपियों की व्यष्टि-समष्टि के ज्ञाता, अठारह अन्नों की सम्पत्ति, अठारह जातियों के कर्ता। इक्कीस से एकविंश पुरुष, इक्कीस अङ्गुलि-पल्लव; चौबीस तत्त्वों के आत्मा, पच्चीसवें पुरुष; सत्ताईस नक्षत्रों के ईश, सत्ताईस योगों के कर्ता; बत्तीस भैरवों के अधीश, चौंतीस के महाह्रद; छत्तीस तत्त्वों से सम्भूत, अड़तीस कलाओं के आत्मा; पचास विष्णु-शक्तियों के ईश, पचास मातृकाओं के आलय, बावन की वपुःश्रेणी, त्रेसठ अक्षरों के संश्रय, पचास रुद्रों के विग्रह; चौंसठ महासिद्धि-योगिनियों से वन्दित, नमन करते उनचास मरुतों के अवरोध-रहित स्वामी।
Verse 19
चतुःषष्ट्यर्थनिर्णेता चतुःषष्टिकलानिधिः अष्टषष्टिमहातीर्थक्षेत्रभैरववन्दितः 161 चतुर्नवतिमन्त्रात्मा षण्णवत्यधिकप्रभुः शतानन्दः शतधृतिः शतपत्रायतेक्षणः 162 शतानीकः शतमखः शतधारावरायुधः सहस्रपत्रनिलयः सहस्रफणिभूषणः 163 सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् सहस्रनामसंस्तुत्यः सहस्राक्षबलापहः 164 दशसाहस्रफणिभृत्फणिराजकृतासनः अष्टाशीतिसहस्राद्यमहर्षिस्तोत्रपाठितः 165 लक्षाधारः प्रियाधारो लक्षाधारमनोमयः चतुर्लक्षजपप्रीतश्चतुर्लक्षप्रकाशकः 166 चतुरशीतिलक्षाणां जीवानां देहसंस्थितः कोटिसूर्यप्रतीकाशः कोटिचन्द्रांशुनिर्मलः 167 शिवोद्भवाद्यष्टकोटिवैनायकधुरन्धरः सप्तकोटिमहामन्त्रमन्त्रितावयवद्युतिः 168 त्रयस्त्रिंशत्कोटिसुरश्रेणीप्रणतपादुकः अनन्तदेवतासेव्यो ह्यनन्तशुभदायकः 169 अनन्तनामानन्तश्रीरनन्तोऽनन्तसौख्यदः अनन्तशक्तिसहितो ह्यनन्तमुनिसंस्तुतः 170
Chatuhshashtyarthanirneta chatuhshashtikalanidhih | Ashtashashtimahatirthakshetrabhairavavanditah || 161 || Chaturnavatimantratma shannavatyadhikaprabhuh | Shatanandah shatadhritih shatapatrayatekshanah || 162 || Shatanikah shatamakhah shatadharavarayudhah | Sahasrapatranilayah sahasraphanibhushanah || 163 || Sahasrashirsha purushah sahasrakshah sahasrapat | Sahasranamasamstutyah sahasrakshabalapahah || 164 || Dashasahasraphanibhritphanirajakritasanah | Ashtashitisahasradyamaharshistotrapathitah || 165 || Lakshadharah priyadharo lakshadharamanomayah | Chaturlakshajapapritashchaturlakshaprakashakah || 166 || Chaturashitilakshanam jivanam dehasamsthitah | Kotisuryapratikashah kotichandramshunirmalah || 167 || Shivodbhavadyashtakotivainayakadhurandharah | Saptakotimahamantramantritavayavadyutih || 168 || Trayastrimshatkotisurashrenipranatapadukah | Anantadevatasevyo hyanantashubhadayakah || 169 || Anantanamanantashriranantonantasaukhyadah | Anantashaktisahito hyanantamunisamstutah || 170 ||
वे चौंसठ अर्थों के निर्णेता और चौंसठ कलाओं के निधि हैं, अड़सठ महातीर्थों के क्षेत्र-भैरवों से वन्दित, चौरानबे मन्त्रों के आत्मा, छियानबे से अधिक के प्रभु। सौ से शतानन्द, शतधृति (ब्रह्मा), शतदल-से दीर्घ नेत्र, शतानीक, शतमख (इन्द्र), शतधारा वाले श्रेष्ठ आयुध। सहस्र से वे सहस्रदल कमल के निवासी, सहस्र फणों वाले सर्पों से विभूषित, और स्वयं पुरुषसूक्त के पुरुष हैं — सहस्रशीर्षा, सहस्राक्ष, सहस्रपात् — सहस्र नामों से संस्तुत्य, सहस्राक्ष इन्द्र का बल हरने वाले। दस सहस्र फण धारण करते हैं, फणिराज के आसन पर विराजते हैं; अट्ठासी हजार आदि महर्षि उनका स्तोत्र-पाठ करते हैं। वे लक्ष के आधार हैं, चार लाख जप से प्रसन्न, चौरासी लाख योनियों के जीवों की देह में स्थित। कोटि सूर्यों के समान तेजस्वी, कोटि चन्द्र-किरणों-से निर्मल, शिव से उद्भूत आठ कोटि विनायकों के धुरन्धर, सात कोटि महामन्त्रों से मन्त्रित अवयवों की द्युति वाले, तैंतीस कोटि देवों की श्रेणी से प्रणत पादुका वाले — अनन्त देवताओं से सेव्य, अनन्त शुभ के दाता: अनन्त नाम, अनन्त श्री, अनन्त, अनन्त सौख्यद, अनन्त शक्ति सहित, अनन्त मुनियों से संस्तुत।
Verse 20
इति वैनायकं नाम्नां सहस्रमिदमीरितम् इदं ब्राह्मे मुहूर्ते यः पठति प्रत्यहं नरः 171 करस्थं तस्य सकलमैहिकामुष्मिकं सुखम् आयुरारोग्यमैश्वर्यं धैर्यं शौर्यं बलं यशः 172 मेधा प्रज्ञा धृतिः कान्तिः सौभाग्यमभिरूपता सत्यं दया क्षमा शान्तिर्दाक्षिण्यं धर्मशीलता 173 जगत्संवननं विश्वसंवादो वेदपाटवम् सभापाण्डित्यमौदार्यं गाम्भीर्यं ब्रह्मवर्चसम् 174 ओजस्तेजः कुलं शीलं प्रतापो वीर्यमार्यता ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं स्थैर्यं विश्वासता तथा 175 धनधान्यादिवृद्धिश्च सकृदस्य जपाद्भवेत् वश्यं चतुर्विधं विश्वं जपादस्य प्रजायते 176 राज्ञो राजकलत्रस्य राजपुत्रस्य मन्त्रिणः जप्यते यस्य वश्यार्थे दासस्तस्य जायते 177 धर्मार्थकाममोक्षाणामनायासेन साधनम् शाकिनीडाकिनीरक्षोयक्षग्रहभयापहम् 178 साम्राज्यसुखदं सर्वसपत्नमदमर्दनम् समस्तकलहध्वंसि दग्धबीजप्ररोहणम् 179 दुःस्वप्नशमनं क्रुद्धस्वामिचित्तप्रसादनम् षड्वर्गाष्टमहासिद्धित्रिकालज्ञानकारणम् 180
Iti vainayakam namnam sahasramidamiritam | Idam brahme muhurte yah pathati pratyaham narah || 171 || Karastham tasya sakalamaihikamushmikam sukham | Ayurarogyamaishvaryam dhairyam shauryam balam yashah || 172 || Medha prajna dhritih kantih saubhagyamabhirupata | Satyam daya kshama shantirdakshinyam dharmashilata || 173 || Jagatsamvananam vishvasamvado vedapatavam | Sabhapandityamaudaryam gambhiryam brahmavarchasam || 174 || Ojastejah kulam shilam pratapo viryamaryata | Jnanam vijnanamastikyam sthairyam vishvasata tatha || 175 || Dhanadhanyadivriddhishcha sakridasya japadbhavet | Vashyam chaturvidham vishvam japadasya prajayate || 176 || Rajno rajakalatrasya rajaputrasya mantrinah | Japyate yasya vashyarthe sa dasastasya jayate || 177 || Dharmarthakamamokshanamanayasena sadhanam | Shakinidakinirakshoyakshagrahabhayapaham || 178 || Samrajyasukhadam sarvasapatnamadamardanam | Samastakalahadhvamsi dagdhabijaprarohanam || 179 || Duhsvapnashamanam kruddhasvamichittaprasadanam | Shadvargashtamahasiddhitrikalajnanakaranam || 180 ||
यहाँ फलश्रुति आरम्भ होती है: 'इस प्रकार विनायक के सहस्र नाम कहे गए। जो मनुष्य प्रतिदिन ब्राह्म-मुहूर्त में इनका पाठ करता है, उसके हाथ में इहलोक-परलोक का सम्पूर्ण सुख आ जाता है': आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धैर्य, शौर्य, बल, यश, मेधा, प्रज्ञा, धृति, कान्ति, सौभाग्य, सुन्दरता, सत्य, दया, क्षमा, शान्ति, दाक्षिण्य, धर्मशीलता, जगत का वशीकरण, विश्व से संवाद, वेद-पाटव, सभा-पाण्डित्य, औदार्य, गाम्भीर्य और ब्रह्मवर्चस। एक बार के जप से भी धन-धान्य की वृद्धि होती है और चारों प्रकार का विश्व अनुकूल हो जाता है; राजा, राजपत्नी, राजपुत्र और मन्त्री वश में आते हैं। यह धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष का अनायास साधन है; शाकिनी-डाकिनी-राक्षस-यक्ष-ग्रहों का भय हरता है; साम्राज्य-सुख देता है, समस्त शत्रुओं का मद मर्दन करता है, सब कलह नष्ट करता है, जले हुए बीजों को भी अंकुरित करता है; दुःस्वप्न शमन करता है, क्रुद्ध स्वामी का चित्त प्रसन्न करता है; षड्वर्ग, अष्ट महासिद्धियाँ और त्रिकाल-ज्ञान देता है।
Verse 21
परकृत्यप्रशमनं परचक्रप्रमर्दनम् सङ्ग्राममार्गे सवेषामिदमेकं जयावहम् 181 सर्ववन्ध्यत्वदोषघ्नं गर्भरक्षैककारणम् पठ्यते प्रत्यहं यत्र स्तोत्रं गणपतेरिदम् 182 देशे तत्र दुर्भिक्षमीतयो दुरितानि तद्गेहं जहाति श्रीर्यत्रायं जप्यते स्तवः 183 क्षयकुष्ठप्रमेहार्शभगन्दरविषूचिकाः गुल्मं प्लीहानमशमानमतिसारं महोदरम् 184 कासं श्वासमुदावर्तं शूलं शोफामयोदरम् शिरोरोगं वमिं हिक्कां गण्डमालामरोचकम् 185 वातपित्तकफद्वन्द्वत्रिदोषजनितज्वरम् आगन्तुविषमं शीतमुष्णं चैकाहिकादिकम् 186 इत्याद्युक्तमनुक्तं वा रोगदोषादिसम्भवम् सर्वं प्रशमयत्याशु स्तोत्रस्यास्य सकृज्जपः 187 प्राप्यतेऽस्य जपात्सिद्धिः स्त्रीशूद्रैः पतितैरपि सहस्रनाममन्त्रोऽयं जपितव्यः शुभाप्तये 188 महागणपतेः स्तोत्रं सकामः प्रजपन्निदम् इच्छया सकलान् भोगानुपभुज्येह पार्थिवान् 189 मनोरथफलैर्दिव्यैर्व्योमयानैर्मनोरमैः चन्द्रेन्द्रभास्करोपेन्द्रब्रह्मशर्वादिसद्मसु 190
Parakrityaprashamanam parachakrapramardanam | Sangramamarge saveshamidamekam jayavaham || 181 || Sarvavandhyatvadoshaghnam garbharakshaikakaranam | Pathyate pratyaham yatra stotram ganapateridam || 182 || Deshe tatra na durbhikshamitayo duritani cha | Na tadgeham jahati shriryatrayam japyate stavah || 183 || Kshayakushthaprameharshabhagandaravishuchikah | Gulmam plihanamashamanamatisaram mahodaram || 184 || Kasam shvasamudavartam shulam shophamayodaram | Shirorogam vamim hikkam gandamalamarochakam || 185 || Vatapittakaphadvandvatridoshajanitajvaram | Agantuvishamam shitamushnam chaikahikadikam || 186 || Ityadyuktamanuktam va rogadoshadisambhavam | Sarvam prashamayatyashu stotrasyasya sakrijjapah || 187 || Prapyatesya japatsiddhih strishudraih patitairapi | Sahasranamamantroyam japitavyah shubhaptaye || 188 || Mahaganapateh stotram sakamah prajapannidam | Ichchhaya sakalan bhoganupabhujyeha parthivan || 189 || Manorathaphalairdivyairvyomayanairmanoramaih | Chandrendrabhaskaropendrabrahmasharvadisadmasu || 190 ||
फल आगे कहे जाते हैं: यह पर-कृत्य (अभिचार) शान्त करता है, शत्रु-चक्र को कुचलता है; युद्ध-मार्ग में यह अकेला ही विजय दिलाता है। सब प्रकार के वन्ध्यत्व-दोष नष्ट करता है और गर्भ-रक्षा का एकमात्र कारण है। जिस देश में गणपति का यह स्तोत्र प्रतिदिन पढ़ा जाता है, वहाँ दुर्भिक्ष, ईतियाँ और दुरित नहीं होते; जहाँ यह स्तव जपा जाता है, उस घर को लक्ष्मी कभी नहीं छोड़तीं। यह रोगों की पूरी सूची हरता है — क्षय, कुष्ठ, प्रमेह, अर्श, भगन्दर, विषूचिका, गुल्म, प्लीहा, पथरी, अतिसार, महोदर, कास, श्वास, उदावर्त, शूल, शोथ, शिरोरोग, वमन, हिचकी, गण्डमाला, अरुचि, वात-पित्त-कफ और त्रिदोष के ज्वर, आगन्तुक और विषम ज्वर, शीत-उष्ण, एकाहिक आदि — कहे और अनकहे सब रोग-दोष इस स्तोत्र का एक जप शीघ्र शान्त कर देता है। इसकी सिद्धि सबके लिए खुली है — स्त्री, शूद्र और पतित भी इसके जप से सिद्धि पाते हैं। सकाम होकर जपने वाला इच्छानुसार सब पार्थिव भोग भोगकर दिव्य मनोरम विमानों से चन्द्र, इन्द्र, सूर्य, उपेन्द्र, ब्रह्मा और शर्व के लोकों में विहार करता है।
Verse 22
कामरूपः कामगतिः कामदः कामदेश्वरः भुक्त्वा यथेप्सितान्भोगानभीष्टैः सह बन्धुभिः 191 गणेशानुचरो भूत्वा गणो गणपतिप्रियः नन्दीश्वरादिसानन्दैर्नन्दितः सकलैर्गणैः 192 शिवाभ्यां कृपया पुत्रनिर्विशेषं लालितः शिवभक्तः पूर्णकामो गणेश्वरवरात्पुनः 193 जातिस्मरो धर्मपरः सार्वभौमोऽभिजायते निष्कामस्तु जपन्नित्यं भक्त्या विघ्नेशतत्परः 194 योगसिद्धिं परां प्राप्य ज्ञानवैराग्यसंयुतः निरन्तरे निराबाधे परमानन्दसञ्ज्ञिते 195 विश्वोत्तीर्णे परे पूर्णे पुनरावृत्तिवर्जिते लीनो वैनायके धाम्नि रमते नित्यनिर्वृते 196 यो नामभिर्हुतैर्दत्तैः पूजयेदर्चये​एन्नरः राजानो वश्यतां यान्ति रिपवो यान्ति दासताम् 197 तस्य सिध्यन्ति मन्त्राणां दुर्लभाश्चेष्टसिद्धयः मूलमन्त्रादपि स्तोत्रमिदं प्रियतमं मम 198 नभस्ये मासि शुक्लायां चतुर्थ्यां मम जन्मनि दूर्वाभिर्नामभिः पूजां तर्पणं विधिवच्चरेत् 199 अष्टद्रव्यैर्विशेषेण कुर्याद्भक्तिसुसंयुतः तस्येप्सितं धनं धान्यमैश्वर्यं विजयो यशः 200
Kamarupah kamagatih kamadah kamadeshvarah | Bhuktva yathepsitanbhoganabhishtaih saha bandhubhih || 191 || Ganeshanucharo bhutva gano ganapatipriyah | Nandishvaradisanandairnanditah sakalairganaih || 192 || Shivabhyam kripaya putranirvishesham cha lalitah | Shivabhaktah purnakamo ganeshvaravaratpunah || 193 || Jatismaro dharmaparah sarvabhaumobhijayate | Nishkamastu japannityam bhaktya vighneshatatparah || 194 || Yogasiddhim param prapya jnanavairagyasamyutah | Nirantare nirabadhe paramanandasanjnite || 195 || Vishvottirne pare purne punaravrittivarjite | Lino vainayake dhamni ramate nityanirvrite || 196 || Yo namabhirhutairdattaih pujayedarchayeennarah | Rajano vashyatam yanti ripavo yanti dasatam || 197 || Tasya sidhyanti mantranam durlabhashcheshtasiddhayah | Mulamantradapi stotramidam priyatamam mama || 198 || Nabhasye masi shuklayam chaturthyam mama janmani | Durvabhirnamabhih pujam tarpanam vidhivachcharet || 199 || Ashtadravyairvisheshena kuryadbhaktisusamyutah | Tasyepsitam dhanam dhanyamaishvaryam vijayo yashah || 200 ||
कामरूप और कामगति होकर, इष्ट बन्धुओं सहित यथेच्छ भोग भोगकर, पाठक गणेश का अनुचर बन जाता है — गणपति का प्रिय गण, नन्दीश्वर आदि समस्त गणों से आनन्दपूर्वक अभिनन्दित, और शिव-पार्वती द्वारा अपने पुत्र के समान कृपा से दुलारा हुआ। पूर्णकाम शिवभक्त होकर वह गणेश्वर के वर से पुनः जातिस्मर (पूर्वजन्मों का स्मरण रखने वाला), धर्मपरायण और सार्वभौम सम्राट होता है। और जो निष्काम होकर भक्ति से नित्य जप करता है, विघ्नेश में तत्पर — वह ज्ञान-वैराग्य से युक्त परम योगसिद्धि पाकर उस वैनायक धाम में लीन हो जाता है जो निरन्तर, निराबाध, परमानन्द नामक, विश्व से परे, पूर्ण और पुनरावृत्ति-रहित है — वहाँ नित्य तृप्त होकर रमण करता है। जो इन नामों से हवन, दान और पूजन-अर्चन करता है — राजा उसके वश में आते हैं, शत्रु दास बन जाते हैं; उसे मन्त्रों की दुर्लभ इष्ट-सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। भगवान कहते हैं: 'यह स्तोत्र मुझे मेरे मूलमन्त्र से भी प्रियतर है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को — मेरे जन्मदिन पर — दूर्वा और इन नामों से विधिवत् पूजा-तर्पण करे, विशेषतः अष्टद्रव्यों से भक्तिपूर्वक — तो वर्ष भर विघ्नराज उसके इष्ट अर्थ सिद्ध करेंगे; उसे धन, धान्य, ऐश्वर्य, विजय और यश निश्चित मिलेगा।'
Verse 23
भविष्यति सन्देहः पुत्रपौत्रादिकं सुखम् इदं प्रजपितं स्तोत्रं पठितं श्रावितं श्रुतम् 201 व्याकृतं चर्चितं ध्यातं विमृष्टमभिवन्दितम् इहामुत्र विश्वेषां विश्वैश्वर्यप्रदायकम् 202 स्वच्छन्दचारिणाप्येष येन सन्धार्यते स्तवः रक्ष्यते शिवोद्भूतैर्गणैरध्यष्टकोटिभिः 203 लिखितं पुस्तकस्तोत्रं मन्त्रभूतं प्रपूजयेत् तत्र सर्वोत्तमा लक्ष्मीः सन्निधत्ते निरन्तरम् 204 दानैरशेषैरखिलैर्व्रतैश्च तीर्थैरशेषैरखिलैर्मखैश्च तत्फलं विन्दति यद्गणेशसहस्रनामस्मरणेन सद्यः 205 एतन्नाम्नां सहस्रं पठति दिनमणौ प्रत्यहम्प्रोज्जिहाने सायं मध्यन्दिने वा त्रिषवणमथवा सन्ततं वा जनो यः स्यादैश्वर्यधुर्यः प्रभवति वचसां कीर्तिमुच्चैस्तनोति दारिद्र्यं हन्ति विश्वं वशयति सुचिरं वर्धते पुत्रपौत्रैः 206 अकिञ्चनोप्येकचित्तो नियतो नियतासनः प्रजपंश्चतुरो मासान् गणेशार्चनतत्परः 207 दरिद्रतां समुन्मूल्य सप्तजन्मानुगामपि लभते महतीं लक्ष्मीमित्याज्ञा पारमेश्वरी 208 आयुष्यं वीतरोगं कुलमतिविमलं सम्पदश्चार्तिनाशः कीर्तिर्नित्यावदाता भवति खलु नवा कान्तिरव्याजभव्या पुत्राः सन्तः कलत्रं गुणवदभिमतं यद्यदन्यच्च तत्त - न्नित्यं यः स्तोत्रमेतत् पठति गणपतेस्तस्य हस्ते समस्तम् 209 गणञ्जयो गणपतिर्हेरम्बो धरणीधरः महागणपतिर्बुद्धिप्रियः क्षिप्रप्रसादनः 210
Bhavishyati na sandehah putrapautradikam sukham | Idam prajapitam stotram pathitam shravitam shrutam || 201 || Vyakritam charchitam dhyatam vimrishtamabhivanditam | Ihamutra cha vishvesham vishvaishvaryapradayakam || 202 || Svachchhandacharinapyesha yena sandharyate stavah | Sa rakshyate shivodbhutairganairadhyashtakotibhih || 203 || Likhitam pustakastotram mantrabhutam prapujayet | Tatra sarvottama lakshmih sannidhatte nirantaram || 204 || Danairasheshairakhilairvrataishcha tirthairasheshairakhilairmakhaishcha | Na tatphalam vindati yadganeshasahasranamasmaranena sadyah || 205 || Etannamnam sahasram pathati dinamanau pratyahamprojjihane Sayam madhyandine va trishavanamathava santatam va jano yah | Sa syadaishvaryadhuryah prabhavati vachasam kirtimuchchaistanoti Daridryam hanti vishvam vashayati suchiram vardhate putrapautraih || 206 || Akinchanopyekachitto niyato niyatasanah | Prajapamshchaturo masan ganesharchanatatparah || 207 || Daridratam samunmulya saptajanmanugamapi | Labhate mahatim lakshmimityajna parameshvari || 208 || Ayushyam vitarogam kulamativimalam sampadashchartinashah Kirtirnityavadata bhavati khalu nava kantiravyajabhavya | Putrah santah kalatram gunavadabhimatam yadyadanyachcha tatta - Nnityam yah stotrametat pathati ganapatestasya haste samastam || 209 || Gananjayo ganapatirherambo dharanidharah | Mahaganapatirbuddhipriyah kshipraprasadanah || 210 ||
वचन पूर्ण होता है: पुत्र-पौत्रादि का सुख निःसन्देह मिलेगा। यह स्तोत्र — जपा, पढ़ा, सुनाया, सुना, व्याख्यात, चर्चित, ध्यात, विमृष्ट या अभिवन्दित — इहलोक और परलोक में सबको विश्व का ऐश्वर्य देता है। स्वच्छन्द विचरने वाला भी यदि इस स्तव को धारण करता है, तो शिव से उत्पन्न आठ कोटि गण उसकी रक्षा करते हैं। स्तोत्र की लिखित पुस्तक को मन्त्र-स्वरूप मानकर पूजे — वहाँ सर्वोत्तमा लक्ष्मी निरन्तर निवास करती हैं। समस्त दानों, व्रतों, तीर्थों और यज्ञों से भी वह फल नहीं मिलता जो गणेश-सहस्रनाम के स्मरण से तत्काल मिल जाता है। जो सूर्योदय पर, सन्ध्या या मध्याह्न में, त्रिकाल अथवा निरन्तर इन सहस्र नामों का पाठ करता है — वह ऐश्वर्य में अग्रणी और वाणी का स्वामी होता है, ऊँची कीर्ति फैलाता है, दारिद्र्य का नाश करता है, विश्व को वश में करता है और पुत्र-पौत्रों सहित चिरकाल बढ़ता है। अकिञ्चन भी — एकाग्रचित्त, नियमित, स्थिर आसन वाला — गणेश-अर्चन में तत्पर होकर चार मास जप करे, तो सात जन्मों से पीछा करती दरिद्रता को भी जड़ से उखाड़कर महती लक्ष्मी पाता है — यही परमेश्वर की आज्ञा है। नीरोग दीर्घायु, अति निर्मल कुल, सम्पदा, पीड़ा का नाश, नित्य उज्ज्वल कीर्ति, सहज नवीन कान्ति, सज्जन पुत्र, गुणवती प्रिय पत्नी — जो भी और हो, वह सब इस स्तोत्र के नित्य पाठक के हाथ में है। फिर इक्कीस नामों की माला आरम्भ होती है: गणञ्जय, गणपति, हेरम्ब, धरणीधर, महागणपति, बुद्धिप्रिय, क्षिप्रप्रसादन —
Verse 24
अमोघसिद्धिरमृतमन्त्रश्चिन्तामणिर्निधिः सुमङ्गलो बीजमाशापूरको वरदः कलः 211 काश्यपो नन्दनो वाचासिद्धो ढुण्ढिर्विनायकः मोदकैरेभिरत्रैकविंशत्या नामभिः पुमान् 212 उपायनं ददेद्भक्त्या मत्प्रसादं चिकीर्षति वत्सरं विघ्नराजोऽस्य तथ्यमिष्टार्थसिद्धये 213 यः स्तौति मद्गतमना ममाराधनतत्परः स्तुतो नाम्ना सहस्रेण तेनाहं नात्र संशयः 214 नमो नमः सुरवरपूजिताङ्घ्रये नमो नमो निरुपममङ्गलात्मने नमो नमो विपुलदयैकसिद्धये नमो नमः करिकलभाननाय ते 215 किङ्किणीगणरचितचरणः प्रकटितगुरुमितचारुकरणः मदजललहरीकलितकपोलः शमयतु दुरितं गणपतिनाम्ना 216 इति श्रीगणेशपुराणे उपासनाखण्डे ईश्वरगणेशसंवादे गणेशसहस्रनामस्तोत्रं नाम षट्चत्वारिंशोध्यायः
Amoghasiddhiramritamantrashchintamanirnidhih | Sumangalo bijamashapurako varadah kalah || 211 || Kashyapo nandano vachasiddho dhundhirvinayakah | Modakairebhiratraikavimshatya namabhih puman || 212 || Upayanam dadedbhaktya matprasadam chikirshati | Vatsaram vighnarajosya tathyamishtarthasiddhaye || 213 || Yah stauti madgatamana mamaradhanatatparah | Stuto namna sahasrena tenaham natra samshayah || 214 || Namo namah suravarapujitanghraye Namo namo nirupamamangalatmane | Namo namo vipuladayaikasiddhaye Namo namah karikalabhananaya te || 215 || Kinkiniganarachitacharanah Prakatitagurumitacharukaranah | Madajalalaharikalitakapolah Shamayatu duritam ganapatinamna || 216 || || Iti shriganeshapurane upasanakhande ishvaraganeshasamvade Ganeshasahasranamastotram nama shatchatvarimshodhyayah ||
— अमोघसिद्धि, अमृतमन्त्र, चिन्तामणि, निधि, सुमङ्गल, बीज, आशापूरक, वरद, कल, काश्यप, नन्दन, वाचासिद्ध, ढुण्ढि और विनायक। जो भक्तिपूर्वक इन इक्कीस नामों के साथ मोदकों का उपहार अर्पित करता है, मेरी प्रसन्नता चाहता हुआ — उसके इष्ट अर्थ विघ्नराज वर्ष भर में सत्य ही सिद्ध करेंगे। जो मुझमें मन लगाकर, मेरी आराधना में तत्पर होकर स्तुति करता है — इन सहस्र नामों से स्तुत होकर मैं उससे प्रसन्न होता हूँ, इसमें संशय नहीं। अन्तिम वन्दना: 'नमो नमः — देवश्रेष्ठों से पूजित चरणों वाले को; नमो नमः — अनुपम मङ्गल-स्वरूप को; नमो नमः — विपुल दया की एकमात्र सिद्धि को; नमो नमः — करि-कलभ (गज-शावक) मुख वाले तुझको। जिनके चरणों में किङ्किणियाँ बजती हैं, जिनकी सुन्दर चेष्टाएँ अपार गुरुता प्रकट करती हैं, जिनके कपोल मद-जल की लहरों से भीगे हैं — वे गणपति अपने नाम से ही समस्त पाप-दुरित शान्त करें।' इस प्रकार श्रीगणेश पुराण के उपासनाखण्ड में ईश्वर-गणेश संवाद में गणेश-सहस्रनाम-स्तोत्र नामक छियालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।

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