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गणपति अथर्वशीर्ष Meaning — Line by Line

गणपति अथर्वशीर्ष

Every verse and every word explained in English & Hindi

Meaning — Line by Line

Every verse of गणपति अथर्वशीर्ष with its Hindi meaning. Tap any word to hear it, or ▶ to recite the verse.

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  1. Verse 1. Shanti patha
  2. Verse 2. Upanishat
  3. Verse 3. Svarupa tattva
  4. Verse 4. Tvam vanmayastvam chinmayah
  5. Verse 5. Sarvam jagadidam tvatto jayate
  6. Verse 6. Tvam gunatrayatitah tvamavasthatrayatitah
  7. Verse 7. Ganesha mantra
  8. Verse 8. Ganesha gayatri
  9. Verse 9. Ganesha rupa
  10. Verse 10. Ashta nama ganapati
  11. Verse 11. Phalashruti
  12. Verse 12. Idamatharvashirshamashishyaya na deyam
  13. Verse 13. Yo durvankurairyajati sa vaishravanopamo bhavati
  14. Verse 14. Shanti mantra
Verse 1#

Shanti patha

शान्ति पाठ भद्रं कर्णेभिः श‍ृणुयाम देवाः भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः व्यशेम देवहितं यदायुः स्वस्ति इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु शान्तिः शान्तिः शान्तिः

Shanti patha Om bhadram karnebhih sharinuyama devah Bhadram pashyemakshabhiryajatrah Sthirairangaistushtuvamsastanubhih Vyashema devahitam yadayuh Om svasti na indro vriddhashravah Svasti nah pusha vishvavedah Svasti nastarkshyo arishtanemih Svasti no brihaspatirdadhatu Om shantih shantih shantih

Meaningशान्ति पाठ: हे देवगण! हम कानों से शुभ सुनें, नेत्रों से शुभ देखें; स्थिर अंगों व शरीर से स्तुति करते हुए देवप्रदत्त आयु का पूर्ण उपभोग करें। वृद्धकीर्ति इन्द्र, सर्वज्ञ पूषा, अरिष्टनेमि तार्क्ष्य और बृहस्पति हमारा कल्याण करें। ॐ शान्ति शान्ति शान्ति।

Verse 2#

Upanishat

उपनिषत् नमस्ते गणपतये त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि त्वमेव केवलं कर्ताऽसि त्वमेव केवलं धर्ताऽसि त्वमेव केवलं हर्ताऽसि त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम् १॥

Upanishat Om namaste ganapataye Tvameva pratyaksham tattvamasi Tvameva kevalam kartasi tvameva kevalam dhartasi Tvameva kevalam hartasi Tvameva sarvam khalvidam brahmasi Tvam sakshadatmasi nityam

Meaningउपनिषत्: हे गणपति! आपको नमस्कार। आप ही प्रत्यक्ष तत्त्व हैं; आप ही एकमात्र कर्ता, धर्ता और हर्ता हैं; आप ही यह सब ब्रह्म हैं; आप ही साक्षात् नित्य आत्मा हैं।

Verse 3#

Svarupa tattva

स्वरूप तत्त्व ऋतं वच्मि सत्यं वच्मि २॥ अव त्वं माम् अव वक्तारम् अव श्रोतारम् अव दातारम् अव धातारम् अवानूचानमव शिष्यम् अव पश्चात्तात् अव पुरस्तात् अवोत्तरात्तात् अव दक्षिणात्तात् अव चोर्ध्वात्तात् अवाधरात्तात् सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात् ३॥

Svarupa tattva Ritam vachmi satyam vachmi Ava tvam mam ava vaktaram ava shrotaram Ava dataram ava dhataram Avanuchanamava shishyam Ava pashchattat ava purastat Avottarattat ava dakshinattat Ava chordhvattat avadharattat Sarvato mam pahi pahi samantat

Meaningस्वरूप तत्त्व: मैं ऋत कहता हूँ, सत्य कहता हूँ। मेरी, वक्ता की और श्रोता की रक्षा करें; आगे-पीछे, ऊपर-नीचे और सब दिशाओं से सर्वत्र मेरी रक्षा करें।

Verse 4#

Tvam vanmayastvam chinmayah

त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः त्वमानन्दमयस्त्वं ब्रह्ममयः त्वं सच्चिदानन्दाद्वितीयोऽसि त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ४॥

Tvam vanmayastvam chinmayah Tvamanandamayastvam brahmamayah Tvam sachchidanandadvitiyosi Tvam pratyaksham brahmasi Tvam jnanamayo vijnanamayosi

Meaningआप वाङ्मय और चिन्मय हैं; आनन्दमय और ब्रह्ममय हैं; अद्वितीय सच्चिदानन्द हैं; प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं; ज्ञानमय और विज्ञानमय हैं।

Verse 5#

Sarvam jagadidam tvatto jayate

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः त्वं चत्वारि वाक्पदानि ५॥

Sarvam jagadidam tvatto jayate Sarvam jagadidam tvattastishthati Sarvam jagadidam tvayi layameshyati Sarvam jagadidam tvayi pratyeti Tvam bhumiraponalonilo nabhah Tvam chatvari vakpadani

Meaningयह सम्पूर्ण जगत आपसे उत्पन्न होता है, आप में स्थित रहता है और आप में ही लय को प्राप्त होता है। आप ही पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हैं; आप ही वाणी के चार पद हैं।

Verse 6#

Tvam gunatrayatitah tvamavasthatrayatitah

त्वं गुणत्रयातीतः त्वमवस्थात्रयातीतः त्वं देहत्रयातीतः त्वं कालत्रयातीतः त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम् त्वं शक्तित्रयात्मकः त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यम् त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वमिन्द्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्त्वं ब्रह्म भूर्भुवःस्वरोम् ६॥

Tvam gunatrayatitah tvamavasthatrayatitah Tvam dehatrayatitah tvam kalatrayatitah Tvam muladharasthitosi nityam Tvam shaktitrayatmakah Tvam yogino dhyayanti nityam Tvam brahma tvam vishnustvam rudrastvamindrastvamagnistvam Vayustvam suryastvam chandramastvam brahma bhurbhuvahsvarom

Meaningआप तीन गुणों, तीन अवस्थाओं, तीन देहों और तीन कालों से परे हैं; मूलाधार में नित्य स्थित हैं; तीन शक्तियों के स्वरूप हैं; योगी सदा आपका ध्यान करते हैं। आप ही ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र तथा भूः-भुवः-स्वः रूप ब्रह्म और ॐ हैं।

Verse 7#

Ganesha mantra

गणेश मन्त्र गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनन्तरम् अनुस्वारः परतरः अर्धेन्दुलसितम् तारेण ऋद्धम् एतत्तव मनुस्वरूपम् गकारः पूर्वरूपम् अकारो मध्यमरूपम् अनुस्वारश्चान्त्यरूपम् बिन्दुरुत्तररूपम् नादः सन्धानम् संहितासन्धिः सैषा गणेशविद्या गणकऋषिः निचृद्गायत्रीच्छन्दः गणपतिर्देवता गं गणपतये नमः ७॥

Ganesha mantra Ganadim purvamuchcharya varnadim tadanantaram Anusvarah paratarah ardhendulasitam tarena riddham Etattava manusvarupam Gakarah purvarupam akaro madhyamarupam Anusvarashchantyarupam binduruttararupam Nadah sandhanam samhitasandhih Saisha ganeshavidya ganakarishih Nichridgayatrichchhandah ganapatirdevata Om gam ganapataye namah

Meaningगणेश मन्त्र: 'ग' वर्ण, उसके बाद 'अ', ऊपर अनुस्वार, अर्धचन्द्र से युक्त और ॐ से अलंकृत — यही आपके मन्त्र का स्वरूप है। यही गणेशविद्या है; ऋषि गणक, छन्द निचृद्गायत्री, देवता गणपति — ॐ गं गणपतये नमः।

Verse 8#

Ganesha gayatri

गणेश गायत्री एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ८॥

Ganesha gayatri Ekadantaya vidmahe vakratundaya dhimahi Tanno dantih prachodayat

Meaningगणेश गायत्री: हम एकदन्त को जानें, वक्रतुण्ड का ध्यान करें; वह दन्ती (गणेश) हमें प्रेरित करें।

Verse 9#

Ganesha rupa

गणेश रूप एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमङ्कुशधारिणम् रदं वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम् रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम् रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पैः सुपूजितम् भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम् आविर्भूतं सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम् एवं ध्यायति यो नित्यं योगी योगिनां वरः ९॥

Ganesha rupa Ekadantam chaturhastam pashamankushadharinam Radam cha varadam hastairbibhranam mushakadhvajam Raktam lambodaram shurpakarnakam raktavasasam Raktagandhanuliptangam raktapushpaih supujitam Bhaktanukampinam devam jagatkaranamachyutam Avirbhutam cha srishtyadau prakriteh purushatparam Evam dhyayati yo nityam sa yogi yoginam varah

Meaningगणेश रूप: एकदन्त, चतुर्भुज, पाश-अंकुश धारण किए, वर देते हुए, मूषकध्वज; रक्तवर्ण, लम्बोदर, सूपकर्ण, रक्तवस्त्रधारी; भक्तों पर कृपालु, जगत् के कारण, अच्युत, सृष्टि के आदि में प्रकट, प्रकृति-पुरुष से परे — जो नित्य ऐसा ध्यान करता है वह योगियों में श्रेष्ठ है।

Verse 10#

Ashta nama ganapati

अष्ट नाम गणपति नमो व्रातपतये नमो गणपतये नमः प्रमथपतये नमस्तेऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय विघ्ननाशिने शिवसुताय श्रीवरदमूर्तये नमो नमः १०॥

Ashta nama ganapati Namo vratapataye namo ganapataye Namah pramathapataye Namastestu lambodarayaikadantaya Vighnanashine shivasutaya Shrivaradamurtaye namo namah

Meaningअष्ट नाम: व्रातपति, गणपति और प्रमथपति को नमस्कार; लम्बोदर, एकदन्त, विघ्ननाशी, शिवसुत और श्रीवरदमूर्ति को बार-बार नमस्कार।

Verse 11#

Phalashruti

फलश्रुति एतदथर्वशीर्षं योऽधीते ब्रह्मभूयाय कल्पते सर्वतः सुखमेधते सर्वविघ्नैर्न बाध्यते पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति सायं प्रातः प्रयुञ्जानो अपापो भवति सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति धर्मार्थकाममोक्षं विन्दति

Phalashruti Etadatharvashirsham yodhite sa brahmabhuyaya kalpate Sa sarvatah sukhamedhate sa sarvavighnairna badhyate Sa panchamahapapatpramuchyate Sayamadhiyano divasakritam papam nashayati Prataradhiyano ratrikritam papam nashayati Sayam pratah prayunjano apapo bhavati Sarvatradhiyanopavighno bhavati Dharmarthakamamoksham cha vindati

Meaningफलश्रुति: जो इस अथर्वशीर्ष का अध्ययन करता है वह ब्रह्मरूप हो जाता है, सर्वत्र सुखी रहता है, किसी विघ्न से बाधित नहीं होता और पंचमहापापों से मुक्त होता है। सायंकाल पाठ से दिन का और प्रातःकाल पाठ से रात्रि का पाप नष्ट होता है; वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करता है।

Verse 12#

Idamatharvashirshamashishyaya na deyam

इदमथर्वशीर्षमशिष्याय देयम् यो यदि मोहाद्दास्यति पापीयान् भवति सहस्रावर्तनाद्यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत् ११॥ अनेन गणपतिमभिषिञ्चति वाग्मी भवति चतुर्थ्यामनश्नन् जपति विद्यावान् भवति इत्यथर्वणवाक्यम् ब्रह्माद्यावरणं विद्यात् बिभेति कदाचनेति १२॥

Idamatharvashirshamashishyaya na deyam Yo yadi mohaddasyati sa papiyan bhavati Sahasravartanadyam yam kamamadhite tam tamanena sadhayet Anena ganapatimabhishinchati sa vagmi bhavati Chaturthyamanashnan japati sa vidyavan bhavati Ityatharvanavakyam Brahmadyavaranam vidyat na bibheti kadachaneti

Meaningयह अयोग्य शिष्य को न दें; मोहवश देने वाला पापी होता है। हजार आवृत्तियों से जो कामना की जाए वह सिद्ध होती है। इससे गणपति का अभिषेक करने वाला वाग्मी होता है, चतुर्थी को उपवास सहित जप करने वाला विद्यावान और यशस्वी होता है; ऐसा जानने वाला कभी नहीं डरता।

Verse 13#

Yo durvankurairyajati sa vaishravanopamo bhavati

यो दूर्वाङ्कुरैर्यजति वैश्रवणोपमो भवति यो लाजैर्यजति यशोवान् भवति मेधावान् भवति यो मोदकसहस्रेण यजति वाञ्छितफलमवाप्नोति यः साज्यसमिद्भिर्यजति सर्वं लभते सर्वं लभते १३॥ अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासन्निधौ वा जप्त्वा सिद्धमन्त्रो भवति महाविघ्नात्प्रमुच्यते महादोषात्प्रमुच्यते महापापात्प्रमुच्यते सर्वविद्भवति सर्वविद्भवति एवं वेद इत्युपनिषत् १४॥

Yo durvankurairyajati sa vaishravanopamo bhavati Yo lajairyajati sa yashovan bhavati sa medhavan bhavati Yo modakasahasrena yajati sa vanchhitaphalamavapnoti Yah sajyasamidbhiryajati sa sarvam labhate sa sarvam labhate Ashtau brahmanan samyaggrahayitva suryavarchasvi bhavati Suryagrahe mahanadyam pratimasannidhau va japtva siddhamantro bhavati Mahavighnatpramuchyate mahadoshatpramuchyate mahapapatpramuchyate Sa sarvavidbhavati sa sarvavidbhavati ya evam veda ityupanishat

Meaningजो दूर्वांकुरों से पूजता है वह कुबेर के समान होता है; लाजा (खील) से पूजने वाला यशस्वी व मेधावी; हजार मोदकों से पूजने वाला वाञ्छित फल; घृत-समिधा से पूजने वाला सब कुछ प्राप्त करता है। आठ ब्राह्मणों को भलीभाँति यह पढ़ाने वाला सूर्य के समान तेजस्वी होता है; सूर्यग्रहण में, महानदी के तट पर या प्रतिमा के समीप जप से सिद्धमन्त्र हो जाता है; वह महाविघ्न, महादोष और महापाप से मुक्त होकर सर्वज्ञ हो जाता है — यही उपनिषद् है।

Verse 14#

Shanti mantra

शान्ति मन्त्र सहनाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै भद्रं कर्णेभिः श‍ृणुयाम देवाः शान्तिः शान्तिः शान्तिः इति श्रीगणपत्यथर्वशीर्षं समाप्तम्

Shanti mantra Om sahanavavatu saha nau bhunaktu Saha viryam karavavahai Tejasvinavadhitamastu ma vidvishavahai Om bhadram karnebhih sharinuyama devah Om shantih shantih shantih Iti shriganapatyatharvashirsham samaptam

Meaningशान्ति मन्त्र: ॐ वह हम दोनों (गुरु-शिष्य) की रक्षा करे, दोनों का पालन करे; हम साथ मिलकर सामर्थ्य प्राप्त करें; हमारा अध्ययन तेजस्वी हो; हम परस्पर द्वेष न करें। ॐ शान्ति शान्ति शान्ति। इस प्रकार श्रीगणपत्यथर्वशीर्ष समाप्त हुआ।

Word-by-Word Breakdown

ॐ गं गणपतये नमः
Om Gam Ganapataye Namah
गणेश का मूल (बीज) मन्त्र जो इस ग्रन्थ में प्रकट किया गया है
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि
Tvameva Pratyaksham Tattvamasi
आप ही प्रत्यक्ष अनुभव में आने वाला तत्त्व (परम सत्य) हैं
गणपतये
Ganapataye
गणपति को — गणों के स्वामी को
एकदन्त
Ekadanta
एकदन्त — एक दाँत वाले
वक्रतुण्ड
Vakratunda
वक्रतुण्ड — टेढ़ी सूँड वाले
लम्बोदर
Lambodara
लम्बोदर — बड़े उदर वाले
विघ्ननाशिने
Vighnanashine
विघ्ननाशी को — विघ्नों के नाशक को
मूलाधार
Muladhara
मूलाधार — वह चक्र जहाँ गणेश नित्य निवास करते हैं
सच्चिदानन्द
Sachchidananda
सच्चिदानन्द — सत्-चित्-आनन्द
ब्रह्मभूयाय कल्पते
Brahmabhuyaya Kalpate
ब्रह्मरूप होने योग्य हो जाता है

Origin & History

Source: Atharva Veda tradition (Atharvashirsha Upanishad)

Author: Traditional (Vedic-Upanishadic)

Period: Ancient

गणपति अथर्वशीर्ष उन उत्तरकालीन उपनिषदीय 'अथर्वशीर्ष' ग्रंथों के परिवार से सम्बन्धित है जो किसी चुने हुए देवता को परब्रह्म के रूप में महिमामण्डित करते हैं। यहाँ भगवान गणेश — प्रत्येक कार्य के पूर्व आवाहित विघ्नहर्ता — को उस साक्षात् सत्य के रूप में प्रकट किया गया है जिससे समस्त सृष्टि उत्पन्न होती है, जिसमें स्थित रहती है और जिसमें लय को प्राप्त होती है। गाणपत्य परम्परा द्वारा दीर्घकाल से प्रिय, इसका पाठ महाराष्ट्र और समस्त भारत में नित्य किया जाता है, विशेषकर भगवान के अभिषेक के समय।

Frequently Asked Questions

गणपति अथर्वशीर्ष क्या है?
गणपति अथर्वशीर्ष (या गणपति उपनिषद्) अथर्ववेद परम्परा से सम्बन्धित एक पावन संस्कृत ग्रंथ है। यह भगवान गणेश को साक्षात् ब्रह्म — परम सत्य, स्रष्टा, पालक और संहारक — घोषित करता है, और इसमें उनका बीजमन्त्र, गायत्री, ध्यान-रूप तथा पाठ की फलश्रुति सम्मिलित है।
'त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि' का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है 'आप ही प्रत्यक्ष रूप से अनुभवगम्य तत्त्व हैं।' यह आरम्भिक घोषणा है कि गणेश केवल एक देवता नहीं, अपितु ब्रह्म, परम तत्त्व, साक्षात् आत्मा का प्रत्यक्ष स्वरूप हैं।
अथर्वशीर्ष में बीजमन्त्र क्या है?
यह ग्रंथ गणेश के बीजमन्त्र की रचना को प्रकट करता है और उसे 'ॐ गं गणपतये नमः' के रूप में देता है, यह समझाते हुए कि 'गं' अक्षर कैसे बनता है और ॐ से अलंकृत होता है।
गणपति अथर्वशीर्ष के पाठ के क्या लाभ हैं?
फलश्रुति विघ्नों, पंचमहापापों और भय से मुक्ति तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति का वचन देती है। कहा जाता है कि हजार आवृत्तियाँ किसी भी सच्ची कामना को पूर्ण करती हैं, और यह बुद्धि, वाक्शक्ति तथा यश प्रदान करता है।
गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ कब करना चाहिए?
नित्य प्रातः व सायंकाल, और विशेषकर संकष्टी व विनायक चतुर्थी, बुधवार तथा गणेश चतुर्थी को। यह समस्त गणेश पूजा के आरम्भ में और अभिषेक के समय पठित होता है।

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