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गोवर्धनधरं वन्दे — Word-by-Word Meaning

गोवर्धनधरं वन्दे

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

गोवर्धनधरम्
Govardhana-Dharam
गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले (उठाने वाले)
वन्दे
Vande
मैं प्रणाम करता हूँ, मैं वन्दना करता हूँ
गोपालम्
Gopalam
गौओं के रक्षक; ग्वाल स्वामी (कृष्ण)
गोकुलोत्सवम्
Gokulotsavam
गोकुल के उत्सव (आनन्द)
गोविन्दम्
Govindam
गोविन्द — जो गौओं और पृथ्वी को आनन्द देते हैं
गोकुलानन्दम्
Gokulanandam
गोकुल के आनन्द
गोपिकाप्राणवल्लभम्
Gopika-Prana-Vallabham
वह प्रिय जो गोपियों के प्राण-स्वरूप हैं
गोवर्धनो महामेरुः
Govardhano Maha-Meruh
गोवर्धन, (मानो) महान् मेरु पर्वत के समान उठाया गया
गोविन्देन धृतः करे
Govindena Dhritah Kare
गोविन्द द्वारा अपने कर (हाथ) पर धारण किया गया
गोपानाम्
Gopanam
गोपों (व्रजवासियों) का
गोधनानाम्
Go-Dhananam
गोधन (गायों रूपी सम्पत्ति) का
रक्षको भव शाश्वतम्
Rakshako Bhava Shashvatam
सदा के लिए रक्षक बनिए (हम सबके)

Complete Translation

मैं गोवर्धन को धारण करने वाले गोपाल को प्रणाम करता हूँ — जो गोकुल के उत्सव हैं, गोविन्द हैं, गोकुल के आनन्द हैं, और गोपियों के प्राणों के प्रिय हैं। हे गोवर्धन, जो महामेरु के समान गोविन्द के कर पर धारण किए गए — आप सदा गोपों और उनके गोधन (गायों) के रक्षक बनिए।

Origin & History

Source: Govardhan Puja / Annakut tradition (rooted in the Bhagavata Purana, Canto 10)

Author: Unknown (devotional invocation of the Vaishnava tradition)

Period: Puranic / classical

गोवर्धन का उठाया जाना कृष्ण की व्रज-लीला के सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रसंगों में से एक है, जो श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में वर्णित है। इन्द्र के अभिमान को चूर्ण करने और व्रज को पोषित करने वाले पर्वत एवं गौओं के प्रति भक्ति स्थापित करने हेतु बालक कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को एक उँगली पर उठाया और सात दिन की वर्षा में सब लोगों और पशुओं को उसके नीचे आश्रय दिया। इसी की स्मृति में दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा मनाई जाती है, और भगवान को अन्नकूट अर्पित करते समय यह आवाहन — 'गोवर्धनधरं वन्दे' — गाया जाता है।

Frequently Asked Questions

गोवर्धन पूजा क्या है?
गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) दीपावली के अगले दिन, कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को मनाई जाती है। यह कृष्ण द्वारा अपनी कनिष्ठा उँगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर इन्द्र की प्रचण्ड वर्षा से व्रज के लोगों और पशुओं की रक्षा का स्मरण है। भक्त पर्वत का प्रतीक बनाते हैं और कृष्ण को अन्नकूट — विविध भोजन की विशाल सामग्री — अर्पित करते हैं।
'गोवर्धनधरं वन्दे' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'मैं गोवर्धन पर्वत के धारक को प्रणाम करता हूँ।' यह श्लोक कृष्ण को गोपाल, गोविन्द, गोकुल के आनन्द और गोपियों के प्रिय कहकर वन्दना करता है, उस रूप का सम्मान करते हुए जिसमें उन्होंने अपने भक्तों की रक्षा हेतु पर्वत को उठाया।
कृष्ण ने गोवर्धन क्यों उठाया?
जब व्रजवासियों ने कृष्ण की सलाह पर इन्द्र के स्थान पर गोवर्धन पर्वत और गौओं की पूजा की, तो रुष्ट इन्द्र ने प्रलयंकारी वर्षा की। कृष्ण ने अपने बाएँ हाथ की उँगली पर गोवर्धन उठाकर सात दिन तक छाते के समान धारण किया, सब प्राणियों की रक्षा की — यह सिखाते हुए कि ईश्वर की शरण ही सच्ची रक्षा है।
अन्नकूट क्या है?
अन्नकूट का अर्थ है 'भोजन का पर्वत'। गोवर्धन पूजा पर पकाए हुए व्यंजनों, अनाजों और मिठाइयों की विशाल राशि कृष्ण के समक्ष पर्वत के आकार में सजाई जाती है, जो गोवर्धन की समृद्धि का प्रतीक है, और इस मन्त्र के साथ उन्हें अर्पित कर प्रसाद रूप में बाँटी जाती है।

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