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ललिता सहस्रनाम — Word-by-Word Meaning

ललिता सहस्रनाम

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

श्रीमाता
Śrīmātā
श्रीमाता — मंगलमयी (श्री) जननी — दिव्य माता जो सबका मूल और पोषण हैं
श्रीमहाराज्ञी
Śrīmahārājñī
श्रीमहाराज्ञी — महान साम्राज्ञी — सम्पूर्ण ब्रह्मांड की परम अधीश्वरी
श्रीमत् सिंहासनेश्वरी
Śrīmat Siṃhāsaneśvarī
श्रीमत् सिंहासनेश्वरी — जो भव्य सिंहासन (पंच ब्रह्मों का आसन) पर विराजमान हैं
चिदग्नि कुण्डसंभूता
Cidagni Kuṇḍasaṃbhūtā
चिदग्नि कुण्डसंभूता — शुद्ध चैतन्य की अग्नि (चित्-अग्नि) के यज्ञकुंड से उत्पन्न
देवकार्य समुद्यता
Devakārya Samudyatā
देवकार्य समुद्यता — देवों का कार्य — भण्डासुर वध — सिद्ध करने हेतु प्रकट हुईं
उद्यद्भानु सहस्राभा
Udyadbhānu Sahasrābhā
उद्यद्भानु सहस्राभा — सहस्र उदीयमान सूर्यों की आभा से देदीप्यमान
चतुर्बाहु समन्विता
Caturbāhu Samanvitā
चतुर्बाहु समन्विता — चार भुजाओं से युक्त
रागस्वरूप पाशाढ्या
Rāgasvarūpa Pāśāḍhyā
रागस्वरूप पाशाढ्या — काम और आसक्ति का स्वरूप पाश धारण करनेवाली
क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला
Krodhākārāṅkuśojjvalā
क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला — क्रोध के स्वरूप अंकुश से उज्ज्वल
मनोरूपेक्षु कोदण्डा
Manorūpekṣu Kodaṇḍā
मनोरूपेक्षु कोदण्डा — जिनका इक्षु-धनुष स्वयं मन है
पञ्च तन्मात्र सायका
Pañca Tanmātra Sāyakā
पञ्च तन्मात्र सायका — जिनके पाँच बाण पाँच तन्मात्र (सूक्ष्म तत्व) हैं
निजारुण प्रभापूर मज्जद् ब्रह्माण्डमण्डला
Nijāruṇa Prabhāpūra Majjad Brahmāṇḍamaṇḍalā
निजारुण प्रभापूर मज्जद् ब्रह्माण्डमण्डला — जिनकी अरुण आभा का प्रवाह सम्पूर्ण ब्रह्मांड मंडल को निमग्न कर देता है
सर्वारुणा
Sarvāruṇā
सर्वारुणा — जो पूर्णतः अरुण — गुलाबी-लाल वर्णवाली हैं
अनवद्याङ्गी
Anavadyāṅgī
अनवद्याङ्गी — निर्दोष, निष्कलंक और पूर्ण अंगोंवाली
सर्वाभरण भूषिता
Sarvābharaṇa Bhūṣitā
सर्वाभरण भूषिता — सभी प्रकार के आभूषणों से अलंकृत
शिवकामेश्वराङ्कस्था
Śivakāmeśvarāṅkasthā
शिवकामेश्वराङ्कस्था — शिव-कामेश्वर की गोद में विराजमान
महापद्माटवी संस्था
Mahāpadmāṭavī Saṃsthā
महापद्माटवी संस्था — कमलों के महावन में निवास करनेवाली
श्रीमन् नगर नायिका
Śrīman Nagara Nāyikā
श्रीमन् नगर नायिका — श्रीपुर, देदीप्यमान नगरी (श्रीचक्र) की अधिष्ठात्री
चिन्तामणि गृहान्तस्था
Cintāmaṇi Gṛhāntasthā
चिन्तामणि गृहान्तस्था — चिंतामणि रत्नों से निर्मित भवन के भीतर निवास करनेवाली
पञ्च ब्रह्मासन स्थिता
Pañca Brahmāsana Sthitā
पञ्च ब्रह्मासन स्थिता — पंच ब्रह्मों द्वारा धारित सिंहासन पर विराजमान
कुण्डलिनी
Kuṇḍalinī
कुण्डलिनी — मेरुदंड के मूल में स्थित कुंडलित सर्प-शक्ति (कुण्डलिनी)
बिसतन्तु तनीयसी
Bisatantu Tanīyasī
बिसतन्तु तनीयसी — कमलनाल के सूक्ष्म तंतु से भी सूक्ष्मतर
भवानी
Bhavānī
भवानी — भवानी — भव (शिव) की पत्नी, सबको जीवनदायिनी
भावनागम्या
Bhāvanāgamyā
भावनागम्या — केवल प्रेमपूर्ण चिंतन और ध्यान से ही प्राप्य
सहस्रारां बुजारूढा
Sahasrārāṃ Bujārūḍhā
सहस्रारां बुजारूढा — मस्तक के सहस्रदल कमल (सहस्रार चक्र) पर आरूढ़
सुधासाराभि वर्षिणी
Sudhāsārābhi Varṣiṇī
सुधासाराभि वर्षिणी — अमरत्व के अमृत की धारा बरसानेवाली
महाशक्तिः
Mahāśaktiḥ
महाशक्तिः — महाशक्ति, ब्रह्मांड की परम ऊर्जा
महात्रिपुर सुन्दरी
Mahātripura Sundarī
महात्रिपुर सुन्दरी — तीन नगरियों (त्रिपुर) की महासुंदरी — तीनों लोकों और तीनों अवस्थाओं से परे सौंदर्य
राजराजेश्वरी
Rājarājeśvarī
राजराजेश्वरी — समस्त राजाओं और सम्राटों की अधीश्वरी
शिवप्रिया
Śivapriyā
शिवप्रिया — शिव की प्रिया
सर्वमङ्गला
Sarvamaṅgalā
सर्वमङ्गला — समस्त मंगल का मूल और मूर्ति
शाम्भवी
Śāmbhavī
शाम्भवी — शाम्भवी — शम्भु (शिव) की शक्ति
सर्वव्याधि प्रशमनी
Sarvavyādhi Praśamanī
सर्वव्याधि प्रशमनी — समस्त रोग और पीड़ा की निवारिणी और शामक
सर्वमृत्यु निवारिणी
Sarvamṛtyu Nivāriṇī
सर्वमृत्यु निवारिणी — जो समस्त मृत्यु और प्राणसंकट को टालती हैं
ललिताम्बिका
Lalitāmbikā
ललिताम्बिका — कृपामयी माता ललिता — जो लीलामयी, कोमल और सर्वातीत हैं
श्री शिवा शिवशक्त्यैक्य रूपिणी
Śrī Śivā Śivaśaktyaikya Rūpiṇī
श्री शिवा शिवशक्त्यैक्य रूपिणी — मंगलमयी शिवा — शिव और शक्ति के पूर्ण ऐक्य का स्वरूप

Complete Translation

मैं परम अम्बिका का ध्यान करती हूँ — सिन्दूर-सी अरुण देहवाली, त्रिनयना, माणिक्य व चन्द्रकला से मुकुटित, स्मितमुखी, हाथों में रत्न-चषक व रक्तकमल धारण किए, रत्नमय घट पर रक्तचरण रखे हुए। मैं उन भवानी का ध्यान करती हूँ जो अरुणवर्णा हैं, जिनके नेत्र करुणा से पूर्ण हैं, जो पाश, अंकुश, पुष्पबाण व इक्षु-धनुष धारण करती हैं, और अणिमा आदि सिद्धियों की किरणों से चारों ओर घिरी हैं। वे श्रीविद्या हैं, शान्ति की मूर्ति, समस्त देवों से वन्दित, सर्व सम्पत्ति की दात्री। आगे आने वाले सहस्र नाम — ब्रह्माण्ड पुराण के उत्तरखण्ड में, अगस्त्य को हयग्रीव द्वारा कथित — उन्हें श्रीमाता, श्रीमहाराज्ञी, सिंहासनेश्वरी, चिदग्नि से प्रकट, देवकार्य हेतु उद्यत, सहस्र सूर्यों-सी प्रभावाली, चतुर्भुजा कहकर गाते हैं। वे श्रीचक्र के मध्य चिन्तामणि गृह में विराजमान श्रीनगरनायिका हैं, चक्रों से ऊपर उठकर सहस्रार में अमृत बरसाती कुण्डलिनी हैं, महात्रिपुरसुन्दरी, राजराजेश्वरी, तथा शिव-शक्ति की एकता का स्वरूप हैं — सर्व रोग व मृत्यु की निवारिणी और मोक्ष की दात्री। श्रद्धा से इन सहस्र नामों का पाठ उन साधकों के लिए माता की सर्वोत्तम उपासना कहा गया है जो श्रीचक्र की पूजा नहीं कर सकते।

Origin & History

Source: Brahmanda Purana (Uttara-khanda, Lalitopakhyana) — Hayagriva–Agastya samvada

Author: The eight Vagdevatas (Vasini and the rest), at the command of Goddess Lalita

Period: Puranic

ब्रह्मांड पुराण के ललितोपाख्यान में, देवी ललिता त्रिपुरसुंदरी द्वारा भण्डासुर के वध के पश्चात, आठ वाग्देवियाँ (वाक्-देवियाँ) — वासिनी, कामेश्वरी आदि — उनकी आज्ञा से उनकी महिमा प्रकट करने हेतु एक हजार नामों की रचना करती हैं। ऋषि हयग्रीव (विष्णु के अवतार) इस परम गुह्य स्तोत्र को ऋषि अगस्त्य को प्रदान करते हैं, जो कलियुग में कृपा के साधन को जानने के इच्छुक थे। यह श्रीविद्या परम्परा का सर्वप्रमुख स्तोत्र बन गया।

Frequently Asked Questions

ललिता सहस्रनाम क्या है?
यह देवी ललिता त्रिपुरसुंदरी के एक हजार नामों का पवित्र स्तोत्र है, जो श्रीविद्या परम्परा की केंद्रीय देवी हैं। यह ब्रह्मांड पुराण के उत्तर-खण्ड में आता है, जहाँ आठ वाग्देवियाँ इसे देवी की आज्ञा से रचती हैं, और ऋषि हयग्रीव इसे अगस्त्य को सिखाते हैं। इसके १००० नाम दिव्य माता का पूर्ण वर्णन करते हैं — उनका रूप, आयुध, आभूषण, श्रीचक्र में उनका स्थान और उनकी ब्रह्मांडीय पहचान।
ललिता सहस्रनाम के पाठ के क्या लाभ हैं?
यह माता की सम्पूर्ण कृपा प्रदान करने वाला माना जाता है — स्वास्थ्य और दीर्घायु (नाम उन्हें समस्त रोग और अकाल मृत्यु की निवारिका कहते हैं), समृद्धि, मंगल, संतान, मन की शांति, और अंततः मोक्ष। परंपरा कहती है कि इसका पाठ श्रीचक्र की पूजा के समान पुण्य प्रदान करता है।
ललिता सहस्रनाम का पाठ कब करना चाहिए?
इसका पाठ विशेषकर शुक्रवार (देवी का दिन), नवरात्रि की नौ रातों में, पूर्णिमा को, तथा ललिता जयंती और श्रीचक्र (ललिता) पूजा के समय किया जाता है। इसे प्रतिदिन, प्रातः या सायं, स्नान के पश्चात जपा जा सकता है।
इसमें कितने नाम और श्लोक हैं?
इसमें देवी के ठीक १००० नाम हैं, जो प्रवाहमान अनुष्टुप् श्लोकों में सजे हैं (नामों के लिए लगभग १८२ श्लोक), जिनके पूर्व ध्यान श्लोक और पश्चात फलश्रुति आती है, जो इसके फल घोषित करती है।

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