सौन्दर्यलहरी — Word-by-Word Meaning
सौन्दर्यलहरी
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ।
अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरिञ्चादिभिरपि
प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति ॥ १॥
śivaḥ śaktyā yukto yadi bhavati śaktaḥ prabhavituṃ
na cedevaṃ devo na khalu kuśalaḥ spanditumapi |
atastvāmārādhyāṃ hariharaviriñcādibhirapi
praṇantuṃ stotuṃ vā kathamakṛtapuṇyaḥ prabhavati || 1||
शक्ति से युक्त होने पर ही शिव सृष्टि करने में समर्थ होते हैं; उनके बिना तो ईश्वर भी हिल नहीं सकते। तब भला पुण्यहीन व्यक्ति आपकी, जिनकी हरि, हर और ब्रह्मा भी उपासना करते हैं, वन्दना या स्तुति करने का साहस कैसे करे?
तनीयांसं पांसुं तव चरणपङ्केरुहभवं
विरिञ्चिस्सञ्चिन्वन् विरचयति लोकानविकलम् ।
वहत्येनं शौरिः कथमपि सहस्रेण शिरसां
हरस्संक्षुद्यैनं भजति भसितोद्धूलनविधिम् ॥ २॥
tanīyāṃsaṃ pāṃsuṃ tava caraṇapaṅkeruhabhavaṃ
viriñcissañcinvan viracayati lokānavikalam |
vahatyenaṃ śauriḥ kathamapi sahasreṇa śirasāṃ
harassaṃkṣudyainaṃ bhajati bhasitoddhūlanavidhim || 2||
आपके चरणों की धूल के एक ही कण से ब्रह्मा अनन्त लोकों की रचना करते हैं; विष्णु उसे अपने सहस्र फणों पर बड़े कष्ट से धारण करते हैं; और शिव उसे पीसकर वह पवित्र भस्म बनाते हैं जिसे वे अपने शरीर पर लगाते हैं।
अविद्यानामन्त-स्तिमिर-मिहिरद्वीपनगरी
जडानां चैतन्य-स्तबक-मकरन्द-स्रुतिझरी ।
दरिद्राणां चिन्तामणिगुणनिका जन्मजलधौ
निमग्नानां दंष्ट्रा मुररिपु-वराहस्य भवति ॥ ३॥
avidyānāmanta-stimira-mihiradvīpanagarī
jaḍānāṃ caitanya-stabaka-makaranda-srutijharī |
daridrāṇāṃ cintāmaṇiguṇanikā janmajaladhau
nimagnānāṃ daṃṣṭrā muraripu-varāhasya bhavati || 3||
आप मन्दबुद्धि के लिए अज्ञान-अन्धकार को मिटाने वाला उदित सूर्य हैं, जड़मति के लिए मधुर ज्ञान की धारा हैं, दरिद्र के लिए चिन्तामणियों की माला हैं, और संसार-सागर में डूबे हुओं को उठाने वाली वराह की दाढ़ हैं।
सुधासिन्धोर्मध्ये सुरविटपिवाटीपरिवृते
मणिद्वीपे नीपोपवनवति चिन्तामणिगृहे ।
शिवाकारे मञ्चे परमशिवपर्यङ्कनिलयां
भजन्ति त्वां धन्याः कतिचन चिदानन्दलहरीम् ॥ ८॥
sudhāsindhormadhye suraviṭapivāṭīparivṛte
maṇidvīpe nīpopavanavati cintāmaṇigṛhe |
śivākāre mañce paramaśivaparyaṅkanilayāṃ
bhajanti tvāṃ dhanyāḥ katicana cidānandalaharīm || 8||
धन्य हैं वे विरले जो आपकी उपासना करते हैं — जो चिन्तामणियों के नगर में, कल्पवृक्षों से घिरे रत्नद्वीप पर कदम्ब-वन में, सदाशिव रूपी शय्या पर विराजमान, साक्षात् चिदानन्द-लहरी रूप में स्थित हैं।
भवानि त्वं दासे मयि वितर दृष्टिं सकरुणा-
मिति स्तोतुं वाञ्छन् कथयति भवानि त्वमिति यः ।
तदैव त्वं तस्मै दिशसि निजसायुज्यपदवीं
मुकुन्दब्रह्मेन्द्रस्फुटमकुटनीराजितपदाम् ॥ २२॥
bhavāni tvaṃ dāse mayi vitara dṛṣṭiṃ sakaruṇā-
miti stotuṃ vāñchan kathayati bhavāni tvamiti yaḥ |
tadaiva tvaṃ tasmai diśasi nijasāyujyapadavīṃ
mukundabrahmendrasphuṭamakuṭanīrājitapadām || 22||
हे भवानी, अपने इस सेवक पर केवल एक करुणा-कटाक्ष डालने का संकल्प कर लीजिए — और तत्क्षण हरि, ब्रह्मा और इन्द्र की भी कृपा और सम्पदा प्राप्त हो जाती है; क्योंकि आपकी दृष्टि का पड़ना ही मुक्ति है।
जपो जल्पः शिल्पं सकलमपि मुद्राविरचना
गतिः प्रादक्षिण्यक्रमणमशनाद्याहुतिविधिः ।
प्रणामस्संवेशस्सुखमखिलमात्मार्पणदृशा
सपर्यापर्यायस्तव भवतु यन्मे विलसितम् ॥ २७॥
japo jalpaḥ śilpaṃ sakalamapi mudrāviracanā
gatiḥ prādakṣiṇyakramaṇamaśanādyāhutividhiḥ |
praṇāmassaṃveśassukhamakhilamātmārpaṇadṛśā
saparyāparyāyastava bhavatu yanme vilasitam || 27||
मेरा प्रत्येक कार्य आपकी पूजा बन जाए: मेरी व्यर्थ वाणी आपके मन्त्र का जप, मेरे हाथों की गति आपकी मुद्राएँ, मेरा चलना आपकी परिक्रमा, मेरा भोजन आपका नैवेद्य, मेरा शयन आपके सम्मुख प्रणाम हो।
सौन्दर्यलहरी
गतैर्माणिक्यत्वं गगनमणिभिः सान्द्रघटितं
किरीटं ते हैमं हिमगिरिसुते कीर्तयति यः ।
स नीडेयच्छायाच्छुरणशबलं चन्द्रशकलं
धनुः शौनासीरं किमिति न निबध्नाति धिषणाम् ॥ ४२॥
saundaryalaharī
gatairmāṇikyatvaṃ gaganamaṇibhiḥ sāndraghaṭitaṃ
kirīṭaṃ te haimaṃ himagirisute kīrtayati yaḥ |
sa nīḍeyacchāyācchuraṇaśabalaṃ candraśakalaṃ
dhanuḥ śaunāsīraṃ kimiti na nibadhnāti dhiṣaṇām || 42||
हे माता, मैं आपके मुकुट को प्रणाम करता हूँ — जो आपके श्याम, पुष्प-सुगन्धित केशों के बीच मेघमाला में अर्धचन्द्र की भाँति शोभित है। (यहाँ से सौन्दर्यलहरी का आरम्भ होता है, जिसमें देवी का मस्तक से चरण तक स्तवन है।)
प्रदीपज्वालाभिर्दिवसकरनीराजनविधिः
सुधासूतेश्चन्द्रोपलजललवैरर्घ्यरचना ।
स्वकीयैरम्भोभिः सलिलनिधिसौहित्यकरणं
त्वदीयाभिर्वाग्भिस्तव जननि वाचां स्तुतिरियम् ॥ १००॥
pradīpajvālābhirdivasakaranīrājanavidhiḥ
sudhāsūteścandropalajalalavairarghyaracanā |
svakīyairambhobhiḥ salilanidhisauhityakaraṇaṃ
tvadīyābhirvāgbhistava janani vācāṃ stutiriyam || 100||
शब्दों के किन पुष्पों से मैं, एक नन्हा बालक, आपकी स्तुति करूँ जो स्वयं वाणी की जननी हैं — जैसे कोई सूर्य को दीप, चन्द्र को चाँदनी, या समुद्र को उसी के जल की एक बूँद अर्पित करे? फिर भी आपकी कृपा से ही यह स्तुति सम्भव हुई।
Complete Translation
सौन्दर्यलहरी — "सौंदर्य की तरंगें" — दिव्य माता (देवी, त्रिपुरसुन्दरी) की लगभग सौ श्लोकों की स्तुति है, जो आदि शंकराचार्य की कृति मानी जाती है। प्रथम भाग आनन्दलहरी ("आनंद की तरंग", श्लोक १–४१) ब्रह्म के गतिशील रूप शक्ति, श्रीचक्र की उपासना व अंतर्ध्यान का वर्णन करता है; द्वितीय भाग सौन्दर्यलहरी (श्लोक ४२–१००, कुछ संस्करणों में तीन अधिक) देवी के नख-शिख सौंदर्य का भव्य वर्णन है। इसका प्रथम श्लोक ही यह परम सत्य घोषित करता है कि शिव शक्ति से युक्त होकर ही कार्य कर सकते हैं — शक्ति ही प्रभु का प्राण है — और प्रत्येक श्लोक अपना सर्वस्व देवी के चरणों में अर्पित करता है। शिखरिणी छंद में रचित यह एक साथ भक्ति-काव्य, तंत्र-ग्रंथ व श्रीविद्या परम्परा का सर्वप्रिय स्तोत्र है।
Origin & History
Source: Ascribed to Adi Shankaracharya (the Ananda Lahari traditionally received at Kailasa)
Author: Adi Shankaracharya
Period: Classical (Shankaracharya, c. 8th century, by tradition)
परंपरा के अनुसार सौन्दर्यलहरी की रचना आदि शंकराचार्य ने की, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने प्रथम भाग, आनंदलहरी को स्वयं भगवान शिव द्वारा कैलास की दीवार पर लिखा हुआ पाया, और दूसरा भाग देवी के सौंदर्य की स्तुति में रचा। दो 'लहरें' — आनंद और सौंदर्य की — मिलकर एक ऐसी रचना बनाती हैं जो एक साथ भक्ति, दर्शन और तंत्र है, तथा देवी उपासना की श्रीविद्या परंपरा का आधार-स्तंभ है।
Frequently Asked Questions
सौन्दर्यलहरी क्या है?▼
यह दिव्य माता (देवी त्रिपुर सुन्दरी रूप में) की लगभग सौ श्लोकों की स्तुति है, जिसका श्रेय आदि शंकराचार्य को दिया जाता है। 'सौन्दर्यलहरी' का अर्थ है 'सौंदर्य की लहरें'। यह दो भागों में है — आनंदलहरी (श्लोक 1–41) शक्ति की शक्ति और उपासना पर, और सौन्दर्यलहरी (42–100) देवी के सिर से चरण तक सौंदर्य का वर्णन करती है।
सौन्दर्यलहरी में कितने श्लोक हैं?▼
मूल स्तुति में 100 श्लोक हैं; कुछ पाठांतर तीन और जोड़ते हैं (101–103), जो यहाँ सम्मिलित हैं, कुल 103। यह सुंदर शिखरिणी छंद में रचित है।
इसके पाठ के क्या लाभ हैं?▼
माना जाता है कि यह माता की संपूर्ण कृपा प्रदान करता है — समृद्धि, वाक्पटुता, आरोग्य, सौंदर्य, संतान और आध्यात्मिक जागरण। प्रत्येक श्लोक अपने यंत्र और फल सहित एक मंत्र भी है, जो विशिष्ट उद्देश्यों हेतु मार्गदर्शन में पढ़ा जाता है।
इसका पाठ कब करना चाहिए?▼
विशेषकर शुक्रवार (देवी का दिन), नवरात्रि की नौ रातों के दौरान, और पूर्णिमा को, प्रतिमा या श्रीचक्र के समक्ष। इसे स्नान के पश्चात प्रतिदिन भी जपा जा सकता है।
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