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या देवी सर्वभूतेषु (तन्त्रोक्त देवीसूक्तम्) — Word-by-Word Meaning

या देवी सर्वभूतेषु (तन्त्रोक्त देवीसूक्तम्)

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

या देवी सर्वभूतेषु
yā devī sarvabhūteṣu
वह देवी जो समस्त प्राणियों में (विद्यमान है)
शक्तिरूपेण संस्थिता
śaktirūpeṇa saṃsthitā
शक्ति के रूप में स्थित है
नमस्तस्यै
namastasyai
उन्हें नमस्कार
नमो नमः
namo namaḥ
बार-बार नमस्कार
नमो देव्यै महादेव्यै
namo devyai mahādevyai
देवी को नमस्कार, महादेवी को नमस्कार

Complete Translation

तन्त्रोक्त देवीसूक्तम् — जो लोकप्रिय रूप से 'या देवी सर्वभूतेषु' कहलाता है — दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के पाँचवें अध्याय में देवताओं द्वारा की गई स्तुति है, जिसे अपराजिता स्तुति भी कहते हैं। शुम्भ-निशुम्भ द्वारा स्वर्ग से वंचित देवता दिव्य माता की उस एक शक्ति के रूप में स्तुति करते हैं जो समस्त प्राणियों में निवास करती हैं — चेतना, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, छाया, शक्ति, तृष्णा, क्षान्ति, जाति, लज्जा, शान्ति, श्रद्धा, कान्ति, लक्ष्मी, वृत्ति, स्मृति, दया, तुष्टि, माता, तथा जगत् में व्याप्त चिति (चैतन्य) रूप में। प्रत्येक आवाहन के बाद प्रिय टेक आती है: 'नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः' — 'उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।' यह देवी की सर्वाधिक पढ़ी और प्रिय स्तुतियों में से एक है, जिसका पाठ प्रतिदिन और विशेषकर नवरात्रि में होता है।

Origin & History

Source: Durga Saptashati (Devi Mahatmyam), Chapter 5 — Markandeya Purana

Author: Sage Markandeya (traditional)

Period: c. 5th–6th century CE

जब शुम्भ और निशुम्भ ने तीनों लोकों को अपने अधिकार में ले लिया, तब देवता हिमालय पर गए और इस स्तुति — तन्त्रोक्त देवीसूक्तम् — से देवी की वंदना की। समस्त प्राणियों में विद्यमान उस एक शक्ति के रूप में उनकी आराधना करते हुए, यह दुर्गा सप्तशती के पाँचवें अध्याय का भक्तिमय हृदय बनती है।

Frequently Asked Questions

'या देवी सर्वभूतेषु' क्या है?
यह तन्त्रोक्त देवीसूक्तम् (अपराजिता स्तुति भी कहलाती है) की टेक है, जो दुर्गा सप्तशती के पाँचवें अध्याय से देवताओं की स्तुति है। प्रत्येक श्लोक कहता है 'या देवी सर्वभूतेषु [X]-रूपेण संस्थिता' — 'जो देवी समस्त प्राणियों में [X] रूप में स्थित हैं' — इसके बाद 'नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।'
'नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः' का क्या अर्थ है?
'उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।' यह त्रिवार नमस्कार उस एक देवी को अर्पित है जो प्रत्येक प्राणी में चेतना, बुद्धि, शक्ति, शान्ति, दया तथा समस्त वस्तुओं के रूप में निवास करती हैं।
देवीसूक्तम् कहाँ से आया है?
यह दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्य के पाँचवें अध्याय (देव्या दूत संवाद) से है, जो मार्कण्डेय पुराण का अंग है। इसे तन्त्रोक्त देवीसूक्तम् या अपराजिता स्तुति भी कहते हैं और इसका पाठ स्वतंत्र रूप से तथा सप्तशती के भीतर दोनों रूपों में होता है।

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