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ब्राह्मण, बकरा और तीन ठग

तृतीय तंत्र — काकोलूकीय

पात्र: मित्र शर्मा ब्राह्मण · बकरा · तीन ठग

मित्र शर्मा नाम का एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण पड़ोस के गाँव में यज्ञ कराने गया, और प्रसन्न यजमान ने उसे एक हृष्ट-पुष्ट बकरा भेंट किया। उपहार से संतुष्ट ब्राह्मण बकरे को कंधे पर लादकर खेतों और जंगल के लंबे रास्ते से अपने घर की ओर चल पड़ा।

संयोग से तीन आलसी ठगों की नज़र उस पर पड़ गई, और मोटा-ताज़ा बकरा देखकर उनके मुँह में पानी भर आया। एक बोला, “आज की दावत तो यही होनी चाहिए। पर बिना झगड़े इसे उससे कैसे छीना जाए?” तीनों ने सिर जोड़कर एक चाल रची और पगडंडियों से आगे निकलकर ब्राह्मण की राह में तीन अलग-अलग जगहों पर बैठ गए।

जैसे ही ब्राह्मण पहले ठग के पास से गुज़रा, वह बनावटी घबराहट से चिल्लाया, “छि-छि, पंडित जी! एक पवित्र ब्राह्मण होकर कंधे पर अपवित्र कुत्ता उठाए जा रहे हैं!” ब्राह्मण झल्लाया, “अंधा है क्या? यह बकरा है!” और नाराज़ होकर आगे बढ़ गया। कोस भर बाद दूसरा ठग सिर हिलाता हुआ मिला, “घोर कलियुग! ब्राह्मण होकर मरा हुआ बछड़ा ढो रहे हैं!” अब ब्राह्मण का मन डगमगाया। उसने बकरे को टटोला — गर्म था, मिमिया रहा था, ज़िंदा था — बकरा ही तो है? वह आगे बढ़ा, पर उसके कदम धीमे पड़ चुके थे। तीसरे मोड़ पर आख़िरी ठग हँसते हुए रास्ता रोककर बोला, “अरे महाराज, कुछ तो लाज करो — गधे को अपने कंधों पर सवारी करा रहे हो!”

अब तो संदेह ने बेचारे ब्राह्मण को पूरी तरह निगल लिया। तीन अनजान आदमी, तीन जोड़ी आँखें — क्या सब के सब झूठे और अकेला मैं ही सच्चा? कहीं यह जीव कोई मायावी राक्षस तो नहीं, जो कोस-कोस पर रूप बदलता है! काँपते हुए उसने बकरे को सड़क किनारे पटका और नहा-धोकर शुद्ध होने के लिए सीधा घर भागा। तीनों ठग ठहाके लगाते हुए अपना शिकार समेट ले गए और छककर दावत उड़ाई — और विद्वान ब्राह्मण कभी जान ही न पाया कि उस दिन एक ही जादू चला था: तीन बार दोहराए गए झूठ का जादू।

शिक्षा (Moral)

बार-बार दोहराया गया झूठ सच को भी डिगा देता है — परायों के शोर से अधिक अपनी आँखों और विवेक पर भरोसा रखो।

ब्राह्मण, बकरा और तीन ठग कहानी की शिक्षा क्या है?

बार-बार दोहराया गया झूठ सच को भी डिगा देता है — परायों के शोर से अधिक अपनी आँखों और विवेक पर भरोसा रखो।

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