किसी चौड़ी नदी के किनारे जामुन का एक विशाल पेड़ था, जो बारहों महीने मीठे और रसीले फलों से लदा रहता था। उसकी डालियों पर रक्तमुख नाम का एक हँसमुख बंदर रहता था। एक दोपहर करालमुख नाम का मगरमच्छ पानी से निकलकर पेड़ की छाँव में आ बैठा। स्वभाव से मिलनसार बंदर ने उसे मुट्ठी भर जामुन खिलाए। मगरमच्छ ने इतना स्वादिष्ट फल पहले कभी नहीं चखा था। बस, उसी दिन से दोनों में गहरी मित्रता हो गई।
अब करालमुख रोज़ तैरकर आता, दोनों घंटों बातें करते और जामुन खाते। शाम को वह अपनी पत्नी के लिए भी फल ले जाता। पत्नी को जामुन तो भाते, पर पति को दिन भर रोकने वाले उस मित्र से उसे जलन होने लगी। उसके मन में एक बुरा विचार आया — जो बंदर रोज़ इतने मीठे फल खाता है, उसका कलेजा तो और भी मीठा होगा! उसने बीमारी का बहाना बनाया और कहा कि उसकी जान अब केवल बंदर का कलेजा खाने से ही बच सकती है।
करालमुख का हृदय काँप उठा, पर वह पत्नी की ज़िद के आगे झुक गया। भारी मन से उसने रक्तमुख को घर भोजन पर बुलाया और कहा कि भाभी अपने देवर से मिलना चाहती है। भोला बंदर खुशी-खुशी उसकी पीठ पर बैठ गया। पर बीच धारा में पहुँचकर अपराधी मगरमच्छ से सच छिपाया न गया, और उसने पूरी बात कह सुनाई।
रक्तमुख का दिल धक से रह गया, फिर भी उसने धैर्य नहीं खोया। शांत स्वर में बोला, “अरे मित्र, यह बात पहले क्यों नहीं बताई? हम बंदर अपना कलेजा तो पेड़ की खोह में सँभालकर रखते हैं। मुझे वापस ले चलो, मैं अभी लाकर देता हूँ।” मूर्ख मगरमच्छ तुरंत लौट पड़ा। किनारा छूते ही रक्तमुख उछलकर सबसे ऊँची डाल पर जा बैठा और बोला, “जा रे विश्वासघाती! भला कोई अपना कलेजा शरीर से अलग रखता है? जो मित्र के साथ छल करे, उसकी मित्रता आज से समाप्त!” और मगरमच्छ खाली हाथ लौट गया — उसने मित्र भी खोया और मीठे जामुन भी।