एक चिड़ीमार ने बादशाह अकबर को मिट्ठू नाम का एक अद्भुत तोता भेंट किया। वह शेर सुना सकता था, मंत्रियों की नक़ल उतार सकता था और बादशाह को चहककर “सलाम, जहाँपनाह!” कहता था। अकबर को मिट्ठू से ऐसा लगाव हुआ कि उन्होंने उसके लिए ख़ास रखवाला रखा, सोने का पिंजरा बनवाया और एक कड़ा शाही फ़रमान जारी किया: “इस तोते की देखभाल में कोई कमी न रहे। और कान खोलकर सुन लो — जो कोई मुझसे कहेगा कि मेरा तोता मर गया, उसे सबसे गहरे कारागार में डाल दिया जाएगा!”
रखवाले ने मिट्ठू को राजकुमार की तरह पाला। अनार और मिर्ची खिलाई, गर्मी में पंखा झला, ठंडी रातों में पिंजरा ढका। पर कोई भी देखभाल, कितनी ही प्यारी क्यों न हो, किसी प्राणी को सदा जीवित नहीं रख सकती। एक सुबह रखवाले ने देखा कि मिट्ठू सोने के पिंजरे में निश्चल पड़ा है। बेचारा पंछी रात में चैन से चल बसा था।
रखवाला थर-थर काँपने लगा। बादशाह को बताए तो कारागार तैयार था — फ़रमान साफ़ था। चुप रहे तो सच वैसे भी खुल जाता। डर से रोता हुआ वह उस एक आदमी के पास दौड़ा जो हर गुत्थी सुलझा सकता था — बीरबल।
बीरबल ने पूरी बात सुनी और उसका कंधा थपथपाया। “घर जाओ। कुछ मत कहना। बादशाह को ख़बर मैं खुद दूँगा।” रखवाला हाँफा, “पर फ़रमान, साहब!” बीरबल बस मुस्करा दिए।
दरबार में बीरबल अचरज से भरा चेहरा लिए सिंहासन के पास पहुँचे। “हुज़ूर, चमत्कार हो गया! आपका मिट्ठू महान साधु बन गया है!” अकबर आगे झुके, “साधु? क्या मतलब, बीरबल?” “चलकर देखिए, जहाँपनाह,” बीरबल बोले। “तोता आँखें मूँदे गहरे ध्यान में लीन है। न खाता है, न पीता है, न बोलता है, न एक पंख हिलाता है। कैसी स्थिरता! कैसी साधना! सल्तनत का कोई संत ऐसा ध्यान नहीं लगा सकता।”
जिज्ञासु बादशाह दौड़े-दौड़े सोने के पिंजरे तक गए — और ठिठक गए। एक नज़र में सच सामने था। “ध्यान?” अकबर चिल्लाए। “अरे बीरबल, तोता तो मर चुका है!”
बीरबल ने झुककर गहरा सलाम किया। “जहाँपनाह, यह बात आपने कही है — मैंने नहीं। और बादशाह खुद बादशाह को तो कारागार में नहीं डालेंगे?” अकबर एक पल अवाक खड़े रहे, फिर अपने ही फ़रमान पर ठहाका मारकर हँस पड़े। रखवाले को क्षमा और इनाम मिला, और अकबर ने जाना कि बिना सोचे दिया गया शाही हुक्म कितना भारी पड़ सकता है।