एक सुहानी सुबह बादशाह अकबर और बीरबल शाही बाग़ में टहल रहे थे। हवा ठंडी थी, फ़व्वारे गा रहे थे, और सिर के ऊपर कौओं के झुंड काँव-काँव करते उड़ रहे थे। उन्हें देखकर अकबर की आँखों में शरारत चमक उठी। उन्हें बीरबल से असंभव सवाल पूछने में बड़ा आनंद आता था, और आज एक बढ़िया सवाल मिल गया था।
“बीरबल,” बादशाह बोले, “ज़रा बताओ — मेरे शहर आगरा में कुल कितने कौए हैं?”
कोई और दरबारी होता तो हकलाने लगता। पर बीरबल ने पलक तक नहीं झपकाई। उन्होंने एक पल आसमान की ओर देखा, होंठ हिलाए मानो गिनती कर रहे हों, और शांति से उत्तर दिया, “हुज़ूर, आगरा में ठीक पंचानबे हज़ार चार सौ तिरसठ कौए हैं।”
अकबर की भौंहें उठ गईं। “इतना सटीक! इतना यक़ीन कैसे?”
“गिनती करवा लीजिए, जहाँपनाह,” बीरबल ने झुककर कहा। “आप देखेंगे कि मैं सही हूँ।”
“और अगर गिनने पर कौए तुम्हारी संख्या से ज़्यादा निकले तो?” अकबर ने मुस्कान छिपाते हुए पूछा।
“इसका उत्तर आसान है, हुज़ूर,” बीरबल बोले। “इसका अर्थ होगा कि पड़ोसी नगरों और गाँवों के कौए अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलने आगरा आए हुए हैं। हर शहर में मेहमान आते हैं — तो कौओं में क्यों नहीं?”
“हूँ,” अकबर ने खेल का मज़ा लेते हुए कहा। “और अगर कौए तुम्हारी संख्या से कम निकले तो?”
“यह तो और भी आसान है, जहाँपनाह,” बीरबल ने कहा। “तब समझिए कि हमारे आगरा के कुछ कौए अपने दोस्तों-रिश्तेदारों से मिलने शहर से बाहर गए हैं। हो सकता है दिल्ली में किसी की शादी हो, या फ़तेहपुर में कोई दावत। आख़िर कौओं के भी तो पारिवारिक फ़र्ज़ होते हैं।”
अकबर ठहाका मारकर हँस पड़े। इस आदमी को फँसाना नामुमकिन था! गिनती ज़्यादा निकले या कम, बीरबल का उत्तर अपने दोनों चतुर पैरों पर मज़बूती से खड़ा था। बादशाह ने उसी क्षण अपनी उँगली से अँगूठी उतारकर अपने मंत्री को भेंट कर दी।
“बीरबल, तुमने कौए नहीं गिने,” वे हँसते हुए बोले, “पर सवाल जिन-जिन रास्तों से आ सकता था, वे सारे रास्ते गिन लिए। असली चतुराई यही है।”
और ऊपर कौए काँव-काँव करते रहे — इस बात से बेख़बर कि उन्होंने अभी-अभी बीरबल को थोड़ा और मशहूर कर दिया है।