कड़ाके की सर्दी की एक शाम बादशाह अकबर महल के सरोवर के किनारे खड़े ठिठुर रहे थे। “क्या कोई इस बर्फ़ जैसे ठंडे पानी में पूरी रात खड़ा रह सकता है?” उन्होंने पूछा। दरबारियों ने कहा, “असंभव, जहाँपनाह!” तब अकबर ने घोषणा की — जो सूर्योदय तक गले तक पानी में खड़ा रहेगा, उसे एक हज़ार सोने की मोहरें मिलेंगी।
अपने परिवार का पेट पालने के लिए एक ग़रीब धोबी ने यह चुनौती स्वीकार कर ली। पूरी रात वह बर्फ़ीले पानी में खड़ा रहा। दाँत किटकिटाते रहे, पर हिम्मत बनाए रखने के लिए उसने अपनी नज़रें दूर महल की मीनार पर जलते एक नन्हे दीये पर टिकाए रखीं। भोर होते ही वह काँपता हुआ बाहर निकला और अपना इनाम माँगने पहुँचा।
“तुमने इतनी ठंड कैसे सही?” अकबर ने पूछा। सीधे-सच्चे धोबी ने कहा, “हुज़ूर, मैं आपकी मीनार के दीये को देखता रहा। उसी से मुझे हौसला मिला।” एक ईर्ष्यालु दरबारी फुसफुसाया, “देखा! वह उस दीये की गर्मी से खुद को गर्म करता रहा। इनाम का हक़दार नहीं है।” अकबर मान गए और ग़रीब धोबी खाली हाथ लौट गया।
बीरबल को यह घोर अन्याय लगा, पर वे उस समय चुप रहे। अगले दिन वे दरबार नहीं आए। अकबर ने संदेशवाहक भेजा तो उत्तर मिला, “मेरी खिचड़ी पकते ही हाज़िर होता हूँ।” सारा दिन बीत गया। आख़िरकार जिज्ञासु बादशाह स्वयं बीरबल के घर जा पहुँचे।
वहाँ बीरबल एक पेड़ के नीचे बैठे थे। ज़मीन पर छोटी-सी आग जल रही थी और उससे बहुत ऊपर, एक ऊँचे बाँस से बँधी, दाल-चावल की हाँडी लटक रही थी। अकबर हँस पड़े, “बीरबल, क्या मति मारी गई है? हाँडी आग से इतनी दूर है — खिचड़ी कभी नहीं पकेगी!”
बीरबल ने हाथ जोड़कर कहा, “क्यों नहीं पकेगी, जहाँपनाह? जब मीलों दूर मीनार पर जलता दीया ठंडे सरोवर में खड़े धोबी को गर्मी दे सकता है, तो कुछ ही हाथ नीचे जलती यह आग मेरी खिचड़ी क्यों नहीं पका सकती?”
अकबर स्तब्ध रह गए। उन्हें अपना अन्याय समझ आ गया। धोबी को दरबार में बुलाकर सम्मान दिया गया और दो हज़ार मोहरें भेंट की गईं — और बीरबल की वह खिचड़ी, जो कभी पकी ही नहीं, सदा के लिए मशहूर हो गई।