बादशाह अकबर और बीरबल गहरे मित्र थे, पर जैसे सभी अच्छे दोस्त करते हैं, वे एक-दूसरे को छेड़ने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते थे। अकबर हमेशा ताक में रहते कि कभी तो अपने हाज़िरजवाब मंत्री पर एक बाज़ी मार लें, और बीरबल हमेशा ऐन आख़िरी पल पर बच निकलते।
बीरबल की एक आदत पर बादशाह अक्सर उन्हें टोकते थे — उन्हें तंबाकू के पत्ते चबाने का शौक़ था। शाही हकीम इस पर नाक-भौं सिकोड़ते, और अकबर, जो उसे छूते तक नहीं थे, जब-तब बीरबल को छेड़ते, “बुद्धिमान आदमी और नासमझ आदत!” — और बीरबल बस मुस्कराकर बात बदल देते।
एक शाम दोनों नगर की दीवारों से बाहर खेतों का दौरा करने निकले। ढलते सूरज में खेत हरे-सुनहरे लहरा रहे थे। थोड़ी देर में वे तंबाकू के ऊँचे पौधों वाले एक खेत के पास से गुज़रे, जिनके चौड़े पत्ते हवा में झूम रहे थे। और वहीं, खेत के किनारे, एक गधा खड़ा था।
गधे ने तंबाकू के पत्तों को सूँघा, नाक सिकोड़ी, मुँह फेर लिया और सादी घास चबाने चल दिया। अकबर की आँखें चमक उठीं। आख़िरकार बीरबल पर चलाने के लिए एकदम सही तीर मिल गया!
“वह देखो, बीरबल!” बादशाह ने चाबुक से इशारा करते हुए कान तक मुस्कराकर कहा। “देखा? गधा भी तंबाकू को मुँह नहीं लगाता। तुम्हारे प्यारे पत्तों को सूँघकर चल दिया। अब बोलो, मेरे दोस्त?”
पीछे चल रहे दरबारी दबी हँसी हँसने लगे। बीरबल ने एक नज़र गधे को देखा, फिर बादशाह को, और शांत भाव से हल्का-सा झुककर उत्तर दिया, “आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं, जहाँपनाह। तंबाकू को केवल गधा ही मुँह नहीं लगाता।”
एक पल सन्नाटा रहा। फिर बात का मतलब खुला, और खेतों में सबसे ऊँची हँसी खुद अकबर की गूँजी। उनका चलाया तीर हवा में मुड़कर सीधा उन्हीं की ओर लौट आया था! “बीरबल,” उन्होंने आँखें पोंछते हुए कहा, “तुम्हें छेड़ना दीवार पर गेंद फेंकने जैसा है — वह और तेज़ी से वापस आती है।”
और यूँ बादशाह बुद्धि की वह छोटी-सी लड़ाई हार गए, पर गधे और तंबाकू के खेत का यह क़िस्सा आगरा के बाज़ारों में फैल गया — और लोग आज तक उस पर मुस्कराते हैं।