एक दिन बादशाह अकबर के दरबार में एक अजीब और दुखभरा मुक़दमा आया। सिंहासन के सामने दो स्त्रियाँ खड़ी थीं, और उनके बीच टोकरी में एक नन्हा शिशु किलकारियाँ भर रहा था। दोनों स्त्रियाँ रो रही थीं, और दोनों के मुँह से एक ही बात निकल रही थी — “हुज़ूर, यह बच्चा मेरा है!”
पहली स्त्री बोली, “मैं इसकी माँ हूँ। यह मेरी पड़ोसन थी। जब मैं बीमार पड़ी तो इसने बच्चे को सँभाला — और अब लौटाने से इनकार करती है!” दूसरी स्त्री चीख़ पड़ी, “इसकी बात मत मानिए, हुज़ूर! बच्चा मेरा है। पड़ोसन यह है, मैं नहीं!”
कोई गवाह नहीं था। दोनों एक ही घर में रहती थीं, और गली में कोई पक्के तौर पर नहीं बता सकता था कि बच्चा किसका है। अकबर ने बार-बार सवाल पूछे, पर दोनों के उत्तर एक जैसे सधे हुए थे और आँसू एक जैसे सच्चे लगते थे। हारकर बादशाह बीरबल की ओर मुड़े, “इंसाफ़ की गाड़ी कीचड़ में फँस गई है, बीरबल। इसे बाहर निकालो।”
बीरबल ने दोनों स्त्रियों को चुपचाप ग़ौर से देखा। फिर ऊँची, कठोर आवाज़ में बोले, “यह मुक़दमा बातों से तय नहीं हो सकता। ठीक है — एक ही न्यायपूर्ण रास्ता बचा है। सिपाही, तलवार निकालो! जब दोनों स्त्रियाँ बच्चे पर दावा करती हैं, तो बच्चे के दो बराबर हिस्से करके एक-एक हिस्सा दोनों माँओं को दे दो।”
पूरा दरबार सन्न रह गया। सिपाही आगे बढ़ा और धीरे-धीरे तलवार उठाई — जैसा बीरबल ने उसे चुपके से समझा रखा था। यह केवल एक परीक्षा थी — बीरबल बच्चे पर आँच तक न आने देते — पर दोनों स्त्रियाँ यह नहीं जानती थीं।
एक स्त्री ने हाथ जोड़कर कहा, “फ़ैसला ठीक है। हम दोनों आधा-आधा ले लेंगी।” पर दूसरी स्त्री चीख़ती हुई तलवार और टोकरी के बीच आ गई। “नहीं! रुको! मैंने झूठ बोला — बच्चा इसी का है, मेरा नहीं! इसे दे दो, बस मेरा बच्चा जीवित रहे! उसे कुछ मत करो!”
बीरबल मुस्कराए और उन्होंने शिशु को उठाकर उसी स्त्री की काँपती बाँहों में रख दिया। “जहाँपनाह, असली माँ यह रही,” वे बोले। “सच्ची माँ अपना बच्चा खो देना सह लेगी, पर उसे दुख में नहीं देख सकती।” झूठा दावा करने वाली स्त्री ने अपराध क़बूल किया और उसे दरबार से विदा कर दिया गया। अकबर ने एक बार फिर कहा कि जैसे विद्वान पुस्तकें पढ़ते हैं, वैसे बीरबल दिलों को पढ़ लेते हैं।