उस दिन शाही दरबार में कामकाज जल्दी निपट गया था। अर्ज़ियाँ सुनी जा चुकी थीं, रिपोर्टें पढ़ी जा चुकी थीं, और बादशाह अकबर का मन कोई खेल खेलने का था। उन्हें ऐसी पहेली से बढ़कर कुछ पसंद न था जो उनके चतुर दरबारियों के सिर खुजवा दे — और ख़ासकर ऐसी, जो शायद एक बार तो कभी न हारने वाले बीरबल को भी उलझा दे।
अकबर ने चॉक का एक टुकड़ा उठाया, सिंहासन के सामने संगमरमर के फ़र्श पर आए और एक लंबी, सीधी लकीर खींच दी। दरबार उत्सुक चुप्पी में देखता रहा। बादशाह ने हाथ झाड़े और सभा की ओर देखकर मुस्कराए।
“मेरी चुनौती यह है,” उन्होंने घोषणा की। “इस लकीर को छोटा कर दो। पर ध्यान से सुनो — न इसे मिटा सकते हो, न रगड़ सकते हो, न छू सकते हो, न फ़र्श काट सकते हो। लकीर ज्यों की त्यों रहे — फिर भी छोटी हो जाए। कौन आज़माएगा?”
दरबारी लकीर को ऐसे घूरने लगे मानो घूरने से ही वह सिकुड़ जाएगी। एक मंत्री उसके दो चक्कर लगा आए। दूसरे ने झुककर तिरछी नज़र से देखा। तीसरे ने सुझाया कि उसका कुछ हिस्सा क़ालीन से ढक दें — “यह छिपाना हुआ, छोटा करना नहीं,” अकबर बोले। चौथे ने कहा कि हॉल के दूर वाले सिरे से लकीर छोटी दिखेगी — “दिखना और होना एक बात नहीं,” बादशाह ने खेल का मज़ा लेते हुए कहा। एक-एक करके आगरा के सबसे बुद्धिमान सिर हार गए। “यह असंभव है, जहाँपनाह। लकीर छोटी करने के लिए उसका कुछ हिस्सा मिटाना ही पड़ेगा।”
इस पूरे समय बीरबल बाँहें बाँधे चुपचाप खड़े रहे, होंठों पर हल्की मुस्कान लिए। “और तुम, बीरबल?” अकबर ने पूछा। “क्या तुम भी कहोगे कि यह असंभव है?”
बीरबल कुछ नहीं बोले। वे आगे बढ़े, बादशाह के हाथ से चॉक ली और संगमरमर पर झुक गए। अकबर की लकीर के ठीक बगल में उन्होंने एक और लकीर खींच दी — गहरी, सीधी और कहीं ज़्यादा लंबी।
फिर वे खड़े हुए। “हो गया, हुज़ूर। देखिए — आपकी लकीर छोटी हो गई है। और मैंने उसे छुआ तक नहीं।”
दरबार पहले दंग रह गया, फिर तालियों से गूँज उठा। अकबर ने बारी-बारी दोनों लकीरों को देखा और खिलखिला पड़े। “कमाल है, बीरबल! तुमने कुछ भी नहीं बदला, फिर भी सब कुछ बदल दिया।” और उसके बाद उस दरबार में जब भी कोई शेख़ी बघारता, पुराने मंत्री आँख मारकर फुसफुसाते, “सँभलकर — कोई तुम्हारी लकीर के पास उससे लंबी लकीर खींच सकता है।”