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करियर और कार्य पर चाणक्य नीति

काम-काज करने वालों के लिए चाणक्य की सलाह आश्चर्यजनक रूप से आधुनिक है — सही स्थान चुनो, अपनी योग्यता सिद्ध करो और लोगों को पहचानो। चाणक्य नीति कहती है कि जहाँ न सम्मान मिले, न आजीविका, न अपने लोग, न सीखने का अवसर — वह स्थान छोड़ देना चाहिए; और वहीं बसना चाहिए जहाँ अर्थ-व्यवस्था, विद्या, शासन, जल और चिकित्सा उपलब्ध हों। वह बताती है कि व्यक्ति की परीक्षा कार्यक्षेत्र में सोने की तरह होती है — त्याग, शील, गुण और कर्म से। साथ ही चेताती है कि बहुत से लोग केवल स्वार्थ सधने तक साथ रहते हैं, और सिखाती है कि जो भी काम हाथ में लो, उसे सिंह के समान पूरी शक्ति से करो। ये श्लोक चाणक्य की करियर-नीति हैं।

यस्मिन्देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः। न च विद्यागमः कश्चित्तं देशं परिवर्जयेत्॥

Chanakya Niti 1.8

जिस स्थान पर सम्मान न मिले, आजीविका न हो, बन्धु-बान्धव न हों और विद्या प्राप्ति का कोई साधन न हो — उस स्थान को त्याग देना चाहिए।

💡 जहाँ न सम्मान मिले, न आय, न अपनापन, न आगे बढ़ने का अवसर — वह नौकरी या शहर बदलने का समय आ गया है।

धनिकः श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यस्तु पञ्चमः। पञ्च यत्र न विद्यन्ते न तत्र दिवसं वसेत्॥

Chanakya Niti 1.9

धनी व्यक्ति, वेदज्ञ विद्वान, राजा, नदी और पाँचवाँ वैद्य — जहाँ ये पाँच न हों, वहाँ एक दिन भी नहीं रहना चाहिए।

💡 रहने और काम करने की जगह उसकी बुनियादी सुविधाओं से चुनिए — अर्थव्यवस्था, शिक्षा, शासन, संसाधन और चिकित्सा।

यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्षणच्छेदनतापताडनैः। तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा॥

जैसे सोने की परीक्षा चार प्रकार से होती है — घिसकर, काटकर, तपाकर और पीटकर — वैसे ही मनुष्य की परीक्षा त्याग, शील, गुण और कर्म से होती है।

💡 आपकी पेशेवर साख दबाव में ही गढ़ी जाती है — आप क्या देते हैं, कैसा व्यवहार करते हैं और क्या कर दिखाते हैं, इसी से आप परखे जाएँगे।

कार्यार्थी भजते लोकं यावत्कार्यं न सिध्यति। उत्तीर्णे च परे पारे नौकायां किं प्रयोजनम्॥

स्वार्थी व्यक्ति तभी तक साथ रहता है जब तक उसका काम सिद्ध नहीं हो जाता; नदी पार उतर जाने के बाद नाव से क्या प्रयोजन?

💡 काम-भर के साथियों और सच्चे सहयोगियों में अंतर करना सीखिए — काम निकल जाने के बाद बनी दूरी को दिल पर न लीजिए।

प्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति। सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते॥

मनुष्य जो भी कार्य करना चाहे — बड़ा हो या छोटा — उसे पूरी शक्ति लगाकर करे; यही एक गुण सिंह से सीखने योग्य है।

💡 आधे-अधूरे मन से किया काम करियर नहीं बनाता — जो भी काम हाथ में लें, छोटा ही सही, पूरी लगन से कीजिए।

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