Mantra.Tips
🏺

ब्राह्मण के मन के लड्डू

चतुर्थ भाग — संधि

पात्र: देवशर्मा निर्धन ब्राह्मण · सत्तू से भरा घड़ा

किसी नगर में देवशर्मा नाम का एक निर्धन ब्राह्मण रहता था। लोगों से मिली भिक्षा के सिवा उसके पास कुछ नहीं था — और एक पर्व के दिन किसी दयालु गृहस्थ ने उसका भिक्षापात्र सत्तू से भर दिया, इतना कि कई दिन चल जाए। फूला न समाया देवशर्मा! उसने सत्तू एक मिट्टी के घड़े में भरा, घड़ा अपनी खाट के ऊपर खूँटी पर टाँगा, और उसके नीचे लेटकर अपने ख़ज़ाने को निहारते-निहारते सपनों में खो गया।

“अकाल के दिन आएँगे,” वह बुदबुदाया, “तब सत्तू सोने के भाव बिकेगा। इस घड़े को मैं सौ चाँदी के सिक्कों में बेचूँगा। सौ सिक्कों से दो अच्छी बकरियाँ ख़रीदूँगा। बकरियाँ जल्दी बढ़ती हैं — शीघ्र ही मेरे पास पूरा रेवड़ होगा, और रेवड़ के बदले मैं गाय-भैंसें ले लूँगा। दूध-घी बेचकर धनवान बन जाऊँगा, और उस धन से खेत और आँगन वाला बड़ा घर ख़रीदूँगा।”

सपना और मीठा होता गया। “मेरा वैभव देखकर कोई कुलीन व्यक्ति अपनी बेटी का विवाह मुझसे कर देगा, और हमारा एक सुंदर बेटा होगा। उसका नाम मैं सोमशर्मा रखूँगा। जब वह ठुमक-ठुमक चलने लगेगा, तो घोड़ों के पास चला जाएगा, और मैं पत्नी को आवाज़ दूँगा, ‘बच्चे को उठा लो!’ पर वह घर के काम में लगी होगी, सुनेगी नहीं — तब मैं ख़ुद उठूँगा और उस घोड़े को सिखाऊँगा कि मेरे बेटे के पास न आए — ऐसे!”

और सपने में डूबे देवशर्मा ने पूरी ताक़त से लात चला दी। पैर ऊपर टँगे घड़े में जा लगा — घड़ा चूर-चूर हो गया — और सत्तू का सारा अनमोल भंडार उसके ऊपर बरस पड़ा, जिससे सपने देखता ब्राह्मण सिर से पाँव तक सफ़ेद हो गया। वह अपने रेवड़ों, महलों और नन्हे सोमशर्मा के मलबे में बैठा रह गया — सब कुछ एक लात में सत्तू की धूल बनकर उड़ गया।

यही दशा उनकी होती है जो आज का काम किए बिना कल के फल पहले ही भोगने लगते हैं: जो हवाई किले बनाता है, वह खूँटी पर टँगा घड़ा भी खो बैठता है।

शिक्षा (Moral)

कल के फल का सुख लेने से पहले आज का काम करें, क्योंकि हवाई किले सपने देखने वाले पर ही आ गिरते हैं।

ब्राह्मण के मन के लड्डू कहानी की शिक्षा क्या है?

कल के फल का सुख लेने से पहले आज का काम करें, क्योंकि हवाई किले सपने देखने वाले पर ही आ गिरते हैं।

यह कहानी किस ग्रंथ से है?

हितोपदेश की कथाएँ — चतुर्थ भाग — संधि

हितोपदेश की कथाएँअगली कहानी: कौए और उल्लू