बहुत-बहुत पहले संसार के पक्षियों ने एक बड़ी सभा बुलाई — हंस और तोते, सारस और कोयलें, मोर और कबूतर। वे आपस में कहने लगे, “गरुड़ हमारे राजा हैं, पर वे दूर भगवान विष्णु की सेवा में रहते हैं और हमारी कभी सुध नहीं लेते। ऐसा राजा किस काम का जो न प्रजा की रक्षा करे, न राह दिखाए? चलो, रात-भर पहरा देने वाले उल्लू को पक्षियों का राजा बनाएँ!”
तो पवित्र नदियों का जल मँगाया गया, फूलों से राजगद्दी सजाई गई, पक्षियों में जो पुरोहित थे वे मंत्र पढ़ने लगे, और उल्लू गंभीर मुद्रा में शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा में बैठ गया। तभी उधर से एक कौआ उड़ता हुआ आया। “यह कैसा उत्सव है?” उसने पूछा। पक्षियों ने सोचा, “कौआ हम सबमें सबसे चतुर है — इसकी भी राय ले लें।”
कौआ कर्कश हँसी हँसा। “यह कैसी मूर्खता? जब तक प्रतापी गरुड़ जीवित हैं, तुम इस दिन के अंधे, चढ़ी त्योरियों वाले पक्षी को मुकुट पहनाओगे? महान स्वामी का नाम-भर ही प्रजा की रक्षा के लिए बहुत है। पर उल्लू को राजा बनाओ, तो कोमल पक्षी उस डरावने चेहरे के भय में जीवन काटेंगे। जो चाहो करो — मैंने अपनी बात कह दी।” और वह उड़ गया। पक्षी एक-दूसरे का मुँह देखने लगे, उनका उत्साह ठंडा पड़ गया, और एक-एक करके सब चुपचाप घर खिसक गए। राजतिलक कभी हुआ ही नहीं।
जब उल्लू को पता चला कि सभा क्यों बिखर गई, तो वह अपमान और क्रोध से जल उठा। “अरे कौए!” उसने प्रतिज्ञा की। “मैंने यह मुकुट माँगा नहीं था, फिर भी तेरी कड़वी ज़बान ने उसे मुझसे छीन लिया। आज से उल्लू और कौए सदा के लिए बैरी हुए।”
और कौआ मन ही मन कहने लगा, “हाय, जहाँ किसी ने मुझसे पूछा तक नहीं, वहाँ मैं इतना कड़वा क्यों बोला? बिना ज़रूरत कही गई कठोर सच्चाई ऐसा बैर बो देती है जो कभी नहीं मरता।” इसीलिए आज तक उल्लू और कौआ एक-दूसरे को देख नहीं सकते।