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हिरन, कौआ और सियार

प्रथम भाग — मित्रलाभ

पात्र: चित्रांग हिरन · सुबुद्धि कौआ · क्षुद्रबुद्धि सियार · किसान

चम्पकवती नामक वन में दो पुराने मित्र रहते थे — चित्रांग नाम का हिरन और सुबुद्धि नाम का कौआ। उनके दिन सुख से बीत रहे थे, कि एक दिन क्षुद्रबुद्धि नाम के सियार की नज़र उस हृष्ट-पुष्ट, चमकीले हिरन पर पड़ी और उसके मुँह में पानी आ गया। उसने सोचा, “पहले इसका विश्वास जीत लूँ, दावत अपने आप मिल जाएगी।” वह नम्र बनकर बोला, “मित्र हिरन, मैं यहाँ अकेला परदेसी हूँ। मुझे अपना मित्र बना लो।” दयालु, भोले हिरन ने हाँ कर दी और उसे अपने बड़े बरगद के पेड़ के पास ले आया।

“चित्रांग!” कौए ने चेताया। “जिसका कुल और स्वभाव न जाना हो, ऐसे अनजान को मित्रता कभी नहीं देनी चाहिए। याद करो बूढ़े गिद्ध जरद्गव को, जिसने एक बिल्ले को आश्रय देकर अपने प्राण गँवाए!” पर सियार मीठी वाणी में बोला, “जिस दिन तुम दोनों पहली बार मिले थे, उस दिन तुम भी तो अनजान ही थे।” भोला हिरन नहीं माना, और तीनों साथ रहने लगे — हालाँकि कौआ सतर्क बना रहा।

एक दिन सियार हिरन को पकती फ़सल से लहलहाते खेत में ले गया। “खाओ मित्र! जहाँ ऐसी मिठास उगती है, वहाँ सूखी घास क्यों चबाना?” हिरन रोज़ उस खेत में जाने लगा, और आख़िर क्रोधित किसान ने मज़बूत रस्सियों का फंदा लगा दिया। हिरन उसमें जकड़ा गया। “अब तो मेरा मित्र सियार ही मुझे बचा सकता है!” वह पुकारा। सियार आया — और दूर खड़ा होकर सोचने लगा, “किसान इससे निपट लेगा, तब मेरी दावत पक्की।” प्रकट में बोला, “मित्र, ये रस्सियाँ नसों की बनी हैं, और आज मेरा पवित्र व्रत है — मैं इन्हें दाँत नहीं लगा सकता। कल ज़रूर!” और वह झाड़ियों में छिपकर बैठ गया।

रात को चिंतित कौआ खोजते-खोजते अपने मित्र तक पहुँचा और सारी बात जान गया। बुद्धिमान सुबुद्धि बोला, “सुनो! सुबह किसान आए तो मरे हुए की तरह अकड़कर निश्चल पड़े रहना। जैसे ही मैं काँव-काँव करूँ, उछलकर भाग जाना।” भोर में किसान ने निश्चल पड़े हिरन को देखा, उसे मरा समझकर रस्सियाँ खोल दीं। कौए ने काँव किया — हिरन उछला और हवा की तरह भाग निकला! झल्लाए किसान ने अपना भारी डंडा फेंका, और वह हिरन को नहीं, झाड़ियों में छिपे सियार को जा लगा — कपटी मित्र का यही उचित अंत था।

शिक्षा (Moral)

कपटी मित्र केवल अपने स्वार्थ के लिए मीठा बोलता है, जबकि सच्चे मित्र की बुद्धि प्राण तक बचा लेती है।

हिरन, कौआ और सियार कहानी की शिक्षा क्या है?

कपटी मित्र केवल अपने स्वार्थ के लिए मीठा बोलता है, जबकि सच्चे मित्र की बुद्धि प्राण तक बचा लेती है।

यह कहानी किस ग्रंथ से है?

हितोपदेश की कथाएँ — प्रथम भाग — मित्रलाभ

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