ब्रह्मारण्य नामक वन में कर्पूरतिलक नाम का एक शानदार जंगली हाथी रहता था। वह चलते-फिरते पहाड़-सा विशाल था, और कोई पशु उसकी राह काटने की हिम्मत नहीं करता था। झाड़ियों में छिपे सियारों का एक झुंड उसे देखकर लालच-भरे विचार करने लगा: “यह हाथी रूपी पर्वत अगर कभी गिर जाए, तो पूरे झुंड के लिए चार महीने का भोजन हो जाए।” पर पर्वत को गिराए कौन?
“मैं गिराऊँगा,” सबसे बूढ़े सियार ने कहा, “बल से नहीं, बुद्धि से। देखते जाओ।” वह दुलकी चाल से हाथी के पास पहुँचा, नाक ज़मीन से लगाकर झुका और विनम्र स्वर में बोला, “महाराज, इस छोटे-से सेवक की बात सुन लीजिए। वन के पशुओं ने एक बड़ी सभा की है। उन्होंने कहा: बिना राजा की धरती नष्ट हो जाती है — और महान कर्पूरतिलक जैसा राजसी तेज, बल और धीरज किसमें है? उन्होंने आपको वन का राजा चुना है! सिंहासन तैयार है, शुभ मुहूर्त निकट है — शीघ्र चलिए स्वामी, कहीं पवित्र घड़ी बीत न जाए!”
हाथी का हृदय गर्व से फूल उठा। वन का राजा! ख़ुशी से चिंघाड़ता हुआ वह तुरंत सियार के पीछे चल पड़ा, और सियार उसे सीधे एक बड़ी झील की ओर ले गया, जिसके चारों ओर नरम, अथाह दलदल था। हल्का-फुल्का सियार ऊपर की परत पर आराम से दौड़ गया; पर अपना मुकुट पाने की जल्दी में भागता विशाल हाथी पेट तक दलदल में धँस गया।
“मित्र सियार!” वह चिल्लाया। “मैं धँस रहा हूँ! मुझे बचाओ!” बूढ़े सियार ने मुड़कर देखा और दाँत निकाल दिए। “महाराज, अपनी सूँड़ से मेरी पूँछ पकड़ लीजिए और खिंच आइए! आपने एक सियार की चापलूसी पर भरोसा किया — अब देखिए वह आपको कहाँ ले आई।” लाख हाथ-पैर मारने पर भी बलशाली हाथी दलदल से नहीं निकल पाया, और अंत में सियारों को ठीक वही मिल गया जो वे चाहते थे।
इस तरह छोटे पर पैनी बुद्धि वाले उन बलवानों को गिरा देते हैं जो होश खो बैठते हैं — क्योंकि उस प्रशंसा से गहरा कोई जाल नहीं, जिस पर हम इतने प्रसन्न हों कि सवाल ही न करें।