ब्रह्मपुर नगर के पास घने जंगलों से ढकी एक पहाड़ी थी। एक रात एक चोर नगर के मंदिर का बड़ा घंटा चुराकर उन्हीं पहाड़ियों की ओर भागा। पर गहरे जंगल में एक बाघ उस पर झपट पड़ा, और उसके बाद वह चोर फिर कभी नहीं दिखा। घंटा चट्टानों के बीच गिरा पड़ा रहा — जब तक बंदरों के एक झुंड ने उसे पा नहीं लिया। उसकी टन-टन से ख़ुश होकर वे चोटियों के बीच हर घड़ी उसे बजाने लगे।
नगरवासियों को पता चला कि चोर का अंत पहाड़ियों में हुआ, और रात-रात भर वहाँ से, जहाँ कोई इंसान नहीं रहता, घंटे की उन्मत्त टन-टन सुनाई देती। फुसफुसाहट फैलने लगी: “पहाड़ी पर एक भयानक राक्षस रहता है! वह घंटा-राक्षस है, जो घूमते हुए घंटा बजाता है!” शाम की परछाईं की तरह डर बढ़ता गया। दरवाज़े बंद रहने लगे, राहगीर लौटने लगे, और एक-एक करके परिवार नगर छोड़ने लगे। राजा गहरी चिंता में पड़ गया।
उसी नगर में कराला नाम की एक पैनी नज़र वाली बुढ़िया रहती थी। उसने ध्यान से सुना और सोचा, “यह घंटा आधी रात को बजता है, दोपहर में बजता है, किसी भी बेवक़्त बजता है — जैसे कोई बच्चा खिलौने से खेल रहा हो, राक्षस डर फैलाता हो ऐसा नहीं। कहीं ये जानवर तो नहीं?” वह चुपचाप पहाड़ी पर चढ़ी, छिपकर देखने लगी — और वहाँ बंदर मज़े से घंटा झुला-झुलाकर बजा रहे थे।
वह राजा के पास गई और बोली, “महाराज, मुझे थोड़ा धन दीजिए, मैं इस घंटा-राक्षस से निपट लूँगी।” राजा तुरंत मान गया। कराला ने ढेर सारे फल और भुने चने ख़रीदे, उन्हें पहाड़ी पर ले जाकर पेड़ों के नीचे ज़मीन पर बिखेर दिया। लालची बंदर घंटा छोड़कर चनों-फलों पर टूट पड़े — और बुढ़िया ने आराम से घंटा उठाया और नगर के मंदिर में लौटा दिया।
नगर में आनंद छा गया, राजा ने कराला को बड़े पुरस्कारों से सम्मानित किया, और भयानक घंटा-राक्षस फिर कभी नहीं सुना गया। क्योंकि अधिकतर डर बस ऐसी आवाज़ें हैं जिन्हें हमने अभी परखा नहीं — और एक शांत, चतुर नज़र उन्हें हमेशा के लिए चुप करा सकती है।