बहुत समय पहले, घने वन की एक सुनसान झील के किनारे एक बूढ़ा बाघ रहता था। उसके दाँत घिस चुके थे, पंजे कुंद पड़ गए थे, और अब उससे शिकार नहीं होता था। तब उसने एक चाल सोची। उसने झील में स्नान किया, पंजे में पवित्र कुश घास ली और किनारे खड़ा होकर मीठे स्वर में पुकारने लगा, “हे यात्रियो, सुनो! मेरे पास शुद्ध सोने का एक कंगन है। मैं इसे दान करना चाहता हूँ। कौन लेगा?”
उस पार से गुज़रते एक यात्री ने यह सुना और ठिठक गया। “सोना!” उसने सोचा, “पर बाघ के हाथ से?” उसने पुकारकर कहा, “तू तो हिंसक पशु है। तुझ पर भरोसा कैसे करूँ?”
बूढ़ा बाघ साधु की तरह ठंडी साँस भरकर बोला, “जवानी में मैं सचमुच क्रूर था, और उसका फल भी भोगा — आज संसार में मेरा कोई नहीं। फिर एक महात्मा ने मुझे धर्म का मार्ग दिखाया। अब मैं बूढ़ा हूँ, दाँत झड़ गए हैं, चाल धीमी है। स्नान करता हूँ, जप करता हूँ, दान देता हूँ। शास्त्र कहते हैं कि दान सबसे बड़ा पुण्य है — और तुझ जैसे निर्धन यात्री को न दूँ तो किसे दूँ? यह देख, कंगन। पहले झील में स्नान कर, फिर शुद्ध हाथों से आकर इसे ले जा।”
लोभ सावधान मनुष्य को भी अंधा कर देता है। सोने के सपने देखता हुआ यात्री झील में उतरा — और कमर तक धँस गया, क्योंकि चमकते पानी के नीचे गहरा, भारी दलदल था। “हाय! मैं दलदल में फँस गया!” वह चिल्लाया। “डर मत,” बाघ ने मीठे स्वर में कहा, “मैं तुझे निकाल लेता हूँ।” जिस दलदल को वह भली-भाँति जानता था, उस पर धीरे-धीरे चलकर बाघ उस असहाय यात्री तक पहुँचा और उसे दबोच लिया — और वही उस लालची यात्री का अंत था।
इस तरह दुष्ट की मीठी वाणी और मुफ़्त के सोने की चमक ने मिलकर वह कर दिखाया, जो बूढ़े बाघ के घिसे पंजे अकेले कभी न कर पाते।