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तीन मछलियाँ

चतुर्थ भाग — संधि

पात्र: अनागतविधाता, दूरदर्शी मछली · प्रत्युत्पन्नमति, हाज़िरजवाब बुद्धि वाली मछली · यद्भविष्य, भाग्य-भरोसे बैठी मछली · मछुआरे

एक गहरे, शांत तालाब में, जो एक पतली नाली से नदी से जुड़ा था, तीन बड़ी मछलियाँ रहती थीं — बचपन की सहेलियाँ, पर स्वभाव में एक-दूसरे से बिल्कुल अलग। पहली थी अनागतविधाता — “जो संकट आने से पहले ही उपाय कर ले।” दूसरी थी प्रत्युत्पन्नमति — “जिसकी बुद्धि संकट की घड़ी में बिजली-सी चमके।” तीसरी थी यद्भविष्य — “जो होना है, वह होकर रहेगा।”

एक शाम किनारे से गुज़रते कुछ मछुआरों ने पानी में झाँका। “भाई, देखो तो, यह तालाब मछलियों से भरा पड़ा है! सुबह होते ही जाल लेकर आते हैं।” ठहरे पानी पर उनकी आवाज़ साफ़ गूँजी, और तीनों सहेलियों ने एक-एक शब्द सुन लिया।

अनागतविधाता तुरंत बोली, “तुमने सुन लिया। आज रात, जब तक नाली में पानी है, मैं नदी की ओर निकल रही हूँ। मेरे साथ चलो!” प्रत्युत्पन्नमति ने पूँछ झटकी। “संकट आए भी, न भी आए। आया तो मेरी बुद्धि ने आज तक धोखा नहीं दिया — मैं उसी घड़ी कुछ सोच लूँगी।” और यद्भविष्य आलस से हँसी। “मछुआरे पहले भी बातें करते आए हैं। जो लिखा है वह मैं कहीं भी तैरूँ, होकर रहेगा — पुरखों का घर छोड़कर क्यों जाऊँ?” तो उसी रात अनागतविधाता नाली से उतरकर बड़ी नदी में चली गई और सुरक्षित हो गई।

भोर होते ही मछुआरे आए और उन्होंने किनारे से किनारे तक जाल फैला दिया, और पीछे रह गईं दोनों सहेलियाँ उसमें फँस गईं। प्रत्युत्पन्नमति ने पल-भर नहीं गँवाया: वह पेट ऊपर करके अकड़ गई और बहुत पहले मरी हुई मछली की तरह तैरने लगी। “यह तो ख़राब है — कल की मरी पड़ी है,” एक मछुआरे ने कहा और उसे पानी के किनारे की ओर उछाल दिया — जहाँ एक चुपचाप झटके के साथ वह गहरे पानी में सरक गई और ओझल हो गई। पर बेचारी यद्भविष्य जाल में तड़पती, उछलती, फड़फड़ाती रही, और मछुआरों की टोकरी में चली गई — वहीं उसकी कहानी समाप्त हो गई।

बुद्धिमान तीनों को याद रखते हैं: दूरदर्शिता निश्चित बचाती है, हाज़िर बुद्धि बाल-बाल बचाती है — पर जो हाथ पर हाथ धरे भाग्य के भरोसे बैठा रहता है, वह अपने चारों ओर कसते जाल की मदद ही करता है।

शिक्षा (Moral)

संकट को पहले से भाँपकर क़दम उठाएँ, क्योंकि दूरदर्शिता निश्चित बचाती है, हाज़िर बुद्धि बाल-बाल बचाती है, और भाग्य के भरोसे बैठना किसी को नहीं बचाता।

तीन मछलियाँ कहानी की शिक्षा क्या है?

संकट को पहले से भाँपकर क़दम उठाएँ, क्योंकि दूरदर्शिता निश्चित बचाती है, हाज़िर बुद्धि बाल-बाल बचाती है, और भाग्य के भरोसे बैठना किसी को नहीं बचाता।

यह कहानी किस ग्रंथ से है?

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