काशी की पवित्र नगरी में एक धोबी रहता था। दिन-भर वह कपड़ों के ढेर धोता-सुखाता और रात को पत्थर की तरह बेसुध सोता। उसके आँगन में उसके दो सेवक रहते थे: एक गधा, जो भारी गठरियाँ ढोता था, और एक कुत्ता, जो घर की रखवाली करता था।
एक अँधेरी रात एक चोर आँगन में घुस आया और चुपचाप धुले कपड़े समेटने लगा। गधे ने उसे देख लिया और कुत्ते से फुसफुसाकर कहा, “मित्र, यही तो तुम्हारी घड़ी है! ज़ोर से भौंको और मालिक को जगाओ।”
पर कुत्ता रूठा बैठा रहा, हिला तक नहीं। “मुझे मेरे कर्तव्य का पाठ मत पढ़ाओ,” वह धीरे से गुर्राया। “तुमने देखा है मालिक मेरे साथ कैसा बर्ताव करता है — कई-कई दिन मुझे खाना देना भूल जाता है, और मुसीबत आने तक मेरी ओर देखता तक नहीं। आज रात उसे पता चल जाए कि रखवाले कुत्ते का मोल क्या है।”
“अरे नीच!” गधा चिल्लाया। “यह कैसा सेवक है जो मालिक की ज़रूरत की घड़ी में मोल-भाव करता है? कर्तव्य कोई सौदा नहीं होता!” “और यह कैसा गधा है,” कुत्ते ने जम्हाई ली, “जो रखवाले कुत्ते को रखवाली सिखाता है?” “तो फिर तुम्हारा कर्तव्य मैं ही निभाऊँगा!” गधे ने घोषणा की — और आसमान की ओर मुँह उठाकर वह पूरी ताक़त से रेंकने लगा, बार-बार, यहाँ तक कि सारी गली उस शोर से गूँज उठी।
चोर गठरी छोड़कर अँधेरे में भाग गया। और धोबी? उस भयानक रेंकने से अपनी प्यारी नींद से जबरन जागा, तो उसे न चोर दिखा, न उसने कोई कारण पूछा — उसे बस अपना गधा तारों की ओर मुँह करके चीखता दिखा। आगबबूला होकर उसने डंडा उठाया, बेचारे गधे की अच्छी मरम्मत की और फिर सो गया। कुत्ता छाया में बैठा यह सब देखता रहा।
तो गधे ने घर बचाया और बदले में पाई सिर्फ़ मार। संसार का यही ढंग है: जो अपना कर्तव्य छोड़कर दूसरे का कर्तव्य निभाने चलता है — उसका हृदय चाहे कितना ही भला हो — वह धन्यवाद की जगह क्रोध ही पाता है।