एक विशाल हरे-भरे वन में एक ख़ुशमिज़ाज नन्हा तोता रहता था। उसे अपना घर बहुत प्यारा था — ऊँचे पेड़, ठंडे झरने, और उनके संग रहने वाले हिरण, हाथी और गाते पंछी। एक सूखे मौसम में एक ठूँठ पर बिजली गिरी, और भयानक आग फैलने लगी। लपटें डाल से डाल पर कूदने लगीं, घाटियों में धुआँ भर गया, और सारे जानवर जान बचाकर भागने-उड़ने लगे।
नन्हा तोता उड़कर धुएँ के ऊपर पहुँच गया। ऊँची, साफ़ हवा में सुरक्षित होकर उसने नीचे देखा — तो आग की दीवारों के बीच फँसे जानवर दिखे: नन्हे जीव, धीमे जीव, ऐसे परिवार जो तेज़ भाग नहीं सकते थे। उसने कहा, "मुझे कुछ करना ही होगा।" वह झट नदी की ओर झपटा, पानी में डुबकी लगाई और दहकती आग के ऊपर लौट आया। फिर उसने पंख झटके, और कुछ नन्ही बूँदें — छोटी-सी, अनमोल बूँदें — चमकती हुई गरजती लपटों में जा गिरीं। वह फिर नदी की ओर उड़ा, फिर आग की ओर, बार-बार, हर बार चुटकी भर पानी लिए, जबकि आँच उसके पंख झुलसाती रही और धुआँ उसकी आँखों में चुभता रहा।
दुनिया से बहुत ऊपर, बादलों के महलों में विराजे कुछ देवताओं ने नीचे देखा और हँस पड़े। "देखो उस मूर्ख तोते को! पंखों की बूँदों से जंगल की आग बुझाने चला है!" पर एक देवता नहीं हँसा। सुनहरे गरुड़ का रूप धरकर वह नन्हे तोते के पास उड़ आया और बोला, "नन्हे पंछी, यह आग तेरे बस की नहीं। उड़ जा, अपनी जान बचा!" लाल आँखों और धुएँ से सने पंखों वाले तोते ने पलटकर पुकारा, "मुझे आसमान से सलाह नहीं चाहिए। मुझे मदद चाहिए! नीचे मेरे मित्र हैं — और जब तक मेरे पंखों में उड़ान है, मैं रुकूँगा नहीं।"
देवता का हृदय काँप उठा। अपनी बेपरवाह हँसी पर लज्जित होकर वह रो पड़ा — और देवता के आँसू कोई छोटी चीज़ नहीं होते। वे मीठी वर्षा बनकर धार पर धार गिरते गए, लपटों में छन-छन करते हुए, जब तक आख़िरी अंगारा भी बुझ न गया। वन से पहले भाप उठी, फिर बूँदें टपकीं, फिर उसने फिर से साँस ली। राख से हरे अंकुर फूटे, जानवर घर लौट आए, और एक ऊँची डाल पर बैठा था एक बेहद थका, बेहद ख़ुश नन्हा तोता।
कथा समाप्त कर भगवान बुद्ध ने कहा, "उस जन्म में वह हार न मानने वाला बहादुर नन्हा तोता स्वयं मैं था।"