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सुनहरा हिरण

जातक कथा 482 — रुरु जातक

पात्र: रुरु, सुनहरा हिरण (बोधिसत्त्व) · डूबता हुआ व्यापारी का बेटा · वाराणसी के राजा · रानी

घने, शांत वन में रुरु नाम का एक अद्भुत हिरण रहता था। उसका शरीर तपे हुए सोने-सा चमकता था, आँखें रत्नों जैसी थीं, और वह मीठी मानवी वाणी में बोल सकता था। ऐसा अनमोल हिरण देखकर शिकारी पीछे पड़ जाते, इसलिए रुरु हर गाँव से दूर, फूलों से लदे पेड़ों के बीच छिपकर रहता था।

एक दिन नदी में बाढ़ आई और रुरु ने किसी आदमी की पुकार सुनी, जिसे धारा बहाए लिए जा रही थी। वह एक व्यापारी का बेटा था, जिसका सब कुछ डूब चुका था। रुरु गरजती नदी में कूद पड़ा, उस आदमी को अपनी पीठ पर सँभाला और तैरकर किनारे ले आया। कृतज्ञ आदमी बोला, "जो माँगो, दूँगा।" रुरु ने कहा, "बस एक ही बात — किसी को मत बताना कि मैं कहाँ रहता हूँ।" आदमी ने वचन दिया और घर लौट गया।

कुछ ही दिनों बाद वाराणसी की रानी ने सपने में देखा कि एक सुनहरा हिरण सोने के आसन से उपदेश दे रहा है, और उसे देखने की उसकी लालसा जाग उठी। राजा ने घोषणा की — जो ऐसा हिरण खोज देगा, उसे एक गाँव और दस हाथी इनाम में मिलेंगे। यह सुनते ही व्यापारी के बेटे का लोभ उसके वचन को निगल गया। "मैं जानता हूँ वह कहाँ रहता है," उसने कहा, और राजा के धनुर्धरों को सीधे वन तक ले गया।

राजा ने धनुष खींचा, पर रुरु अपनी मीठी वाणी में बोला, "ठहरिए, महाराज। पहले यह बताइए — मेरा ठिकाना आपको किसने दिखाया?" राजा ने व्यापारी के बेटे की ओर इशारा किया। रुरु ने गहरी साँस लेकर कहा, "नदी से लकड़ी का कुंदा निकालना आसान है, पर कृतघ्न मनुष्य का भला करना कठिन।" जब राजा ने सुना कि रुरु ने उसी आदमी की जान बचाई थी जिसने उसे धोखा दिया, तो वे क्रोध से उस विश्वासघाती की ओर मुड़े। पर रुरु ने कोमलता से विनती की, "उसे क्षमा कर दीजिए, राजन्। चाहें तो इनाम भी उसी को दे दीजिए। बस सब प्राणियों को चैन से जीने दीजिए।"

ऐसी क्षमा देखकर राजा चकित रह गए। उन्होंने रुरु का सम्मान किया, उसके दयालु उपदेश सुने और आज्ञा दी कि राज्य में फिर कभी किसी हिरण को कोई हानि न पहुँचाए। रुरु शांति से अपने फूलों भरे वन में लौट गया।

कथा समाप्त कर भगवान बुद्ध ने कहा, "उस जन्म में वह कृतघ्न मनुष्य देवदत्त था, राजा आनंद थे, और सुनहरा हिरण रुरु स्वयं मैं था।"

शिक्षा (Moral)

दया विश्वासघात को भी क्षमा कर देती है, पर उपकार को कभी भूलना नहीं चाहिए।

सुनहरा हिरण कहानी की शिक्षा क्या है?

दया विश्वासघात को भी क्षमा कर देती है, पर उपकार को कभी भूलना नहीं चाहिए।

यह कहानी किस ग्रंथ से है?

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