बहुत पुरानी बात है, नदी किनारे चार मित्र रहते थे: एक ऊदबिलाव, एक गीदड़, एक बंदर और एक कोमल स्वभाव का खरगोश। चारों में खरगोश सबसे बुद्धिमान था, और वह अपने मित्रों को याद दिलाता रहता, "जब पर्व का दिन आए, तो जो भी भूखा अतिथि मिले, उसके साथ अपना भोजन बाँटो। हृदय से दिया गया दान सबसे बड़ा पुण्य है।"
पूर्णिमा के दिन चारों मित्र भोजन खोजने निकले। ऊदबिलाव को नदी किनारे छूटी हुई मछलियाँ मिलीं। गीदड़ को दही की एक हाँड़ी मिली। बंदर ने पेड़ों से पके आम तोड़ लिए। पर खरगोश के पास तो बस वही मीठी घास थी जिसे वह रोज़ कुतरता था — और अतिथि को भला घास कौन परोसे? तभी एक विचार से उसका हृदय उजियारे से भर गया: "अगर कोई भूखा अतिथि मेरे पास आया, तो मैं उसे वही दूँगा जो सचमुच मेरा अपना है। मैं उसे स्वयं को दे दूँगा।"
ऊपर देवलोक में देवराज शक्र का आसन गरम हो उठा — जैसा तभी होता था जब धरती पर कुछ अद्भुत होने वाला हो। शक्र ने नीचे देखा, तो खरगोश का संकल्प दीपक-सा जगमगाता दिखा। उन्होंने उसकी परीक्षा लेने की ठानी। एक ग़रीब बूढ़े भिखारी का वेश धरकर वे बारी-बारी हर मित्र के पास गए। ऊदबिलाव ने मछलियाँ भेंट कीं, गीदड़ ने दही, बंदर ने आम। अंत में वे खरगोश के पास पहुँचे। खरगोश आनंद से बोला, "हे महात्मा, आज मैं आपको ऐसा दान दूँगा जो आज तक किसी ने नहीं दिया। आग जलाइए, और जब अंगारे दहक उठें, तो मैं उसमें कूदकर स्वयं को भून लूँगा, ताकि आप भरपेट भोजन पा सकें।"
भिखारी ने आग जलाई। खरगोश ने तीन बार अपना शरीर झटका, ताकि उसके रोओं में छिपा कोई नन्हा कीड़ा भी बिना चोट खाए निकल जाए, और फिर वह वीरता से लपटों में कूद पड़ा। पर आग तो भोर की ओस-सी शीतल लगी! शक्र अपने तेजोमय रूप में प्रकट हो गए। उन्होंने कहा, "प्यारे खरगोश, तुम्हारा दान सोने के पहाड़ों से भी बड़ा है। सारी दुनिया को इसे याद रखना होगा।" और पर्वत का सार लेकर शक्र ने चंद्रमा के मुख पर खरगोश की आकृति अंकित कर दी, जिसे आज भी हर बच्चा देख सकता है।
कथा समाप्त कर भगवान बुद्ध ने कहा, "उस जन्म में शक्र अनुरुद्ध थे, और वह साहसी नन्हा खरगोश स्वयं मैं था।"