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बंदर और मगरमच्छ

जातक कथा 57 — वानरिन्द जातक

पात्र: वानरराज (बोधिसत्त्व) · मगरमच्छ · मगरमच्छ की पत्नी

एक नदी के किनारे एक बलवान और चतुर वानरराज रहता था। नदी के बीचोबीच एक बड़ी चपटी चट्टान थी, और उसके पार फलों के पेड़ों से भरा एक हरा-भरा टापू। हर सुबह बंदर किनारे से उछलकर चट्टान पर, और चट्टान से टापू पर पहुँच जाता, जहाँ वह आम और कटहल की दावत उड़ाता। हर शाम वह उसी रास्ते लौटता: टापू से चट्टान, चट्टान से किनारा। उसका पैर कभी नहीं चूका।

उसी नदी में एक मगरमच्छ रहता था, और उसकी पत्नी ने बंदर को इधर-उधर कूदते देखा था। वह ललचाकर बोली, "कितना बलवान है यह बंदर! इसका कलेजा तो ताक़त और मिठास से भरा होगा। स्वामी, मुझे इस बंदर का कलेजा खाना है।" मगरमच्छ को समझ नहीं आया कि इतने फुर्तीले प्राणी को पकड़े कैसे, पर आख़िर उसने एक चाल सोची। "बंदर चट्टान से होकर आता-जाता है," उसने सोचा। "आज शाम मैं उसी चट्टान पर चुपचाप लेट जाऊँगा, और जैसे ही वह मेरी पीठ पर उतरेगा — हप्प!"

उस शाम बंदर फल खाकर टापू के किनारे आया, चट्टान पर नज़र डाली — और ठिठक गया। कुछ अजीब था। उसने सोचा, "नदी का पानी तो बढ़ा नहीं, फिर चट्टान सुबह से ऊँची कैसे दिखती है?" अपने अनुमान को परखने के लिए चतुर बंदर ने आवाज़ लगाई, "अरे ओ चट्टान! सुनो जी, चट्टान!" सन्नाटा। उसने तीसरी बार पुकारा, "चट्टान, रोज़ की तरह आज मुझे जवाब क्यों नहीं देती?" मगरमच्छ ने सोचा, "अच्छा, तो यह चट्टान रोज़ इससे बातें करती है! मुझे ही जवाब देना पड़ेगा।" और अपनी सबसे भारी, पत्थर-जैसी आवाज़ में वह बोला, "हाँ बंदर भाई? मैं यहाँ हूँ!"

बंदर मीठे स्वर में बोला, "अरे वाह, मित्र मगरमच्छ! तो मेरी चट्टान पर तुम बैठे हो। कहो, क्या चाहिए?" "तुम्हारा कलेजा!" मगरमच्छ बोला। "ठीक है," बंदर ने कहा। "दूसरा कोई रास्ता तो है नहीं। तुम अपना मुँह खूब बड़ा खोलो और मैं आऊँ तो मुझे झट से पकड़ लेना।" अब बात यह है कि मगरमच्छ जब मुँह पूरा खोलता है, तो उसकी आँखें अपने आप कसकर बंद हो जाती हैं। मगरमच्छ ने अपने विशाल जबड़े खोले, आँखें मुँद गईं — और बंदर हल्के से उछलकर मगरमच्छ के सिर पर उतरा, वहाँ से किनारे पर कूदा और फुर्ती से अपने पेड़ पर चढ़ गया। मगरमच्छ ने अचरज से पानी पर पूँछ पटकी। "बंदर, तुम जीत गए! जिसके पास तुम्हारी तरह सत्य, विचार, साहस और बुद्धि चारों एक साथ हों, उसे कोई नहीं हरा सकता।" और वह खाली जबड़े लिए घर लौट गया।

कथा समाप्त कर भगवान बुद्ध ने कहा, "उस जन्म में मगरमच्छ देवदत्त था, और वानरराज स्वयं मैं था।"

शिक्षा (Moral)

सजग आँखें और शांत बुद्धि बड़े से बड़े जाल को भी मात दे देती हैं।

बंदर और मगरमच्छ कहानी की शिक्षा क्या है?

सजग आँखें और शांत बुद्धि बड़े से बड़े जाल को भी मात दे देती हैं।

यह कहानी किस ग्रंथ से है?

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