हिमालय की ऊँचाइयों में, गंगा नदी के किनारे, आम का एक ऐसा अद्भुत पेड़ था जिसके फल शहद से भी मीठे थे। उसकी डालियों पर अस्सी हज़ार वानर रहते थे, जिनका राजा था एक बुद्धिमान और बलशाली वानरराज। उसने अपने दल को चेताया, "एक भी आम नदी में न गिरने पाए, वरना वह अपने पीछे-पीछे संकट ले आएगा।" इसलिए वानर पानी के ऊपर झुकी डालियों का हर फल सावधानी से तोड़ लेते थे।
पर चींटियों के एक घोंसले के पीछे छिपा हुआ एक आम किसी की नज़र में न आया। वह पककर नदी में गिर पड़ा और बहते-बहते वाराणसी जा पहुँचा, जहाँ राजा ब्रह्मदत्त स्नान कर रहे थे। एक बार चखते ही राजा को और आम चाहिए थे। वे सैनिकों के साथ नदी के ऊपर की ओर चल पड़े और उस विशाल पेड़ तक जा पहुँचे — जहाँ वानर मज़े से आम खा रहे थे। राजा ने आज्ञा दी, "पेड़ को घेर लो। भोर होते ही धनुर्धर इन्हें भगा देंगे। ये आम केवल मेरे होंगे।"
डरे हुए वानर अपने राजा के चारों ओर सिमट आए। वानरराज ने शांत स्वर में कहा, "डरो मत। मैं तुम सबको बचाऊँगा।" एक ज़बरदस्त छलाँग में उसने नदी पार की, अपने पैर में बेंत की लंबी रस्सी बाँधी और वापस पेड़ की ओर कूदा। पर रस्सी थोड़ी छोटी पड़ गई। तब वानरराज ने हाथों से डाल थाम ली और अपने ही शरीर को तानकर पुल बना दिया। "मेरी पीठ पर से निकल जाओ!" उसने पुकारा। सारी रात अस्सी हज़ार वानर उसकी पीठ पर से होकर सुरक्षित पार होते रहे, और उसकी बाँहें दर्द से काँपती रहीं।
राजा ब्रह्मदत्त यह सब देखकर दंग रह गए। सूरज निकलते ही उन्होंने थके हुए वानरराज को कोमलता से नीचे उतरवाया, मुलायम वस्त्र में लपेटा और शहद-पानी पिलाया। ब्रह्मदत्त ने पूछा, "तुम तो इनके राजा हो। फिर अपनी इतनी पीड़ा सहकर सबका बोझ क्यों उठाया?" वानरराज मुस्कराया, "सच्चा राजा अपनी प्रजा का होता है। उनका सुख अपने सुख से पहले आता है।" वाराणसी के राजा उन शब्दों को कभी नहीं भूले और उस दिन से अपनी प्रजा पर सदा दया रखने लगे।
कथा समाप्त कर भगवान बुद्ध ने कहा, "उस पूर्व जन्म में वाराणसी के राजा मेरे शिष्य आनंद थे, वानर मेरे अनुयायी थे, और वानरराज स्वयं मैं था।"