बहुत समय पहले वाराणसी के राजा को अपनी ही आवाज़ से बड़ा प्रेम था। वे सुबह से रात तक बोलते रहते, और दरबार में कोई दूसरा अपनी बात पूरी नहीं कर पाता था। उनका बुद्धिमान मंत्री धैर्य से सही घड़ी की प्रतीक्षा में था, ताकि राजा को कोमलता से एक सीख दे सके। एक दिन वह सीख आसमान से टपक पड़ी — सीधे महल के आँगन में। हुआ यों।
हिमालय की पहाड़ियों के एक तालाब में एक कछुआ रहता था, जिसकी बातें ख़त्म ही नहीं होती थीं। तालाब पर चरने आने वाले दो युवा जंगली हंस उसके मित्र बन गए। एक दिन वे बोले, "मित्र कछुए, सुंदर पर्वत पर हमारा घर इस तालाब से कहीं मनोहर है। चलो, हमारे साथ रहो!" कछुए ने ठंडी साँस भरी, "पर मैं उड़ तो सकता नहीं।" हंस मुस्कुराए। "हम तुम्हें ले चल सकते हैं — बशर्ते तुम मुँह बंद रखो और रास्ते भर किसी से एक शब्द न बोलो।" कछुआ चहक उठा, "अरे, यह कौन-सी बड़ी बात है! मुझे ले चलो।"
तो हंसों ने एक मज़बूत छड़ी दोनों ओर से थाम ली, कछुए ने उसका बीच का हिस्सा दाँतों से कसकर पकड़ लिया, और वे पहाड़ों-खेतों के ऊपर उड़ चले। नीचे गाँव के कुछ बच्चों ने ऊपर देखा और चिल्लाए, "देखो, देखो! दो हंस एक कछुए को छड़ी पर लटकाए लिए जा रहे हैं! कैसा मज़ेदार नज़ारा है!" कछुए का जवाब देने को जी जल उठा। वह किसी तरह चुप रहा। पर बच्चे हँसते ही रहे, और आख़िर उससे रहा न गया। "तुम्हें इससे क्या मतलब, ओ शोर मचाने वालो —" मुँह खुलते ही छड़ी छूट गई और वह गिरा — नीचे, और नीचे — सीधे वाराणसी के महल के खुले आँगन में, जहाँ पत्थरों पर उसकी पीठ की ढाल चटख गई, और बस, बातूनी कछुए की कहानी वहीं दुखद रूप से पूरी हो गई।
राजा और दरबारी दौड़कर बाहर आए। राजा ने पूछा, "बुद्धिमान मंत्री, आसमान से कछुआ कैसे गिर पड़ा?" मंत्री ने समझ लिया कि उसकी घड़ी आ गई है। "महाराज, इस कछुए के ऐसे मित्र थे जो इसे उड़ाकर एक सुंदर घर ले जा रहे थे। इसे बस थोड़ी देर चुप रहना था — पर यह अपनी ज़बान न रोक सका, इसलिए गिर पड़ा। सच है, जो बहुत बोलता है, वह दुख ही पाता है।" राजा समझ गए कि यह बात उन्हीं के लिए कही गई है। उस दिन से वे कम बोलने और अधिक सुनने लगे, और पहले से कहीं अच्छे शासक बने।
कथा समाप्त कर भगवान बुद्ध ने कहा, "उस जन्म में वह बुद्धिमान मंत्री स्वयं मैं था।"