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बुद्धिमान बटेर

जातक कथा 33 — सम्मोदमान जातक

पात्र: बुद्धिमान बटेर राजा (बोधिसत्त्व) · जाल वाला बहेलिया · बटेरों का झुंड

वाराणसी के पास एक वन में हज़ारों बटेर रहते थे, और उनका मुखिया था एक बुद्धिमान बटेर राजा। उस वन में रोज़ एक बहेलिया आता था। वह बटेर की बोली की ऐसी हूबहू नक़ल करता कि पक्षी आवाज़ के इर्द-गिर्द जमा हो जाते — और पलक झपकते ही वह उन पर अपना बड़ा जाल फेंककर उन्हें टोकरी में भरता और बाज़ार ले जाता।

बुद्धिमान बटेर ने अपने झुंड को बुलाया। "मित्रो, यह बहेलिया हमें झुंड के झुंड उठाए लिए जा रहा है। पर सुनो — उसके जाल को हराने का उपाय मेरे पास है। जैसे ही जाल तुम्हारे ऊपर गिरे, हर पक्षी जाल के एक-एक छेद में अपना सिर डाल दे। फिर सब एक साथ पंख फड़फड़ाओ, जाल को एक होकर उठाओ और किसी काँटेदार झाड़ी पर ले जाकर डाल दो। नीचे से सरककर निकलो और उड़ जाओ!"

अगले ही दिन जाल गिरा — और बटेरों ने ठीक वही किया जो राजा ने सिखाया था। हज़ार पंख एक साथ फड़फड़ाए, जाल पतंग की तरह हवा में उठा, काँटेदार झाड़ी पर जा गिरा, और एक-एक पक्षी बच निकला। दिन पर दिन यही होता रहा, और बहेलिया हर शाम खाली हाथ घर लौटता। उसने अपनी उदास पत्नी से कहा, "चिंता मत करो। अभी वे पक्षी मिल-जुलकर काम कर रहे हैं। पर बटेर आख़िर बटेर हैं — देर-सबेर आपस में झगड़ेंगे ही। और तब मैं सबको पकड़ लूँगा।"

उसकी बात सच निकली। एक सुबह एक बटेर उतरते समय दूसरे के सिर से टकरा गया। "देखकर नहीं उतर सकते, अनाड़ी!" एक ने झिड़का। "जाल कौन ज़्यादा ऊँचा उठाता है, तुम या मैं?" दूसरे ने पलटकर कहा। झगड़ा फैलता गया, यहाँ तक कि आधा झुंड इसी बहस में उलझ गया कि सबसे ज़्यादा मेहनत कौन करता है। बुद्धिमान राजा ने चेताया, "झगड़ते पक्षी जाल नहीं उठा सकते। जहाँ क्रोध है, वहीं संकट पलता है।" पर झगड़ालुओं ने एक न सुनी, इसलिए बुद्धिमान बटेर अपने समझदार साथियों को लेकर दूर चला गया। अगली बार जब क्रोधी पक्षियों पर जाल गिरा, तो हर कोई चिल्लाया, "पहले तुम उठाओ!" — और किसी ने भी नहीं उठाया। बहेलिये ने खुशी-खुशी अपनी टोकरी भर ली।

कथा समाप्त कर भगवान बुद्ध ने कहा, "उस जन्म में झगड़ालू बटेर देवदत्त था, और बुद्धिमान बटेर राजा स्वयं मैं था।"

शिक्षा (Moral)

एकता में बल है, फूट में विनाश।

बुद्धिमान बटेर कहानी की शिक्षा क्या है?

एकता में बल है, फूट में विनाश।

यह कहानी किस ग्रंथ से है?

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