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अन्तर्ज्योतिर्बहिर्ज्योतिः (शिवोऽहम्) — Word-by-Word Meaning

अन्तर्ज्योतिर्बहिर्ज्योतिः (शिवोऽहम्)

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

अन्तः-ज्योतिः
antaḥ-jyotiḥ
अन्तर का प्रकाश, भीतर का प्रकाश
बहिः-ज्योतिः
bahiḥ-jyotiḥ
बाह्य प्रकाश, बाहर का प्रकाश
प्रत्यक्-ज्योतिः
pratyak-jyotiḥ
अन्तर्यामी ज्योति, भीतर की ओर मुड़ी आत्मा की अन्तरतम ज्योति
परात्-परः
parāt-paraḥ
श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ, परे से भी परे
ज्योतिः-ज्योतिः
jyotiḥ-jyotiḥ
समस्त ज्योतियों की ज्योति (जो प्रकाश को भी प्रकाशित करती है)
स्वयम्-ज्योतिः
svayaṃ-jyotiḥ
स्वयं-प्रकाशमान, स्वयं-दीप्त (अपने ही प्रकाश से चमकने वाली)
आत्म-ज्योतिः
ātma-jyotiḥ
आत्मा का प्रकाश, शुद्ध चेतना की दीप्ति
शिवः
śivaḥ
शिव, मंगलमय, सदा-शुद्ध परम सत्ता
अस्मि अहम्
asmi aham
मैं हूँ (मैं वही हूँ)

Complete Translation

अन्तर का प्रकाश और बाह्य प्रकाश, अन्तर्यामी आत्मज्योति, परात्पर; ज्योतियों की भी ज्योति, स्वयं-प्रकाशमान, आत्मा का दीप्त प्रकाश — वही शिव मैं हूँ।

Origin & History

Source: Advaita Vedanta tradition (a self-luminous Self / Shivoham meditation verse)

Author: Traditional (Advaita Vedanta)

Period: Ancient / classical

यह श्लोक अद्वैत-घोषणाओं की उस समृद्ध परम्परा का अंग है जो आत्मा का स्वयं-प्रकाश ज्योति के रूप में ध्यान करती है और 'शिवोऽहम्' — 'मैं शिव हूँ' — में पराकाष्ठा पाती है। ऐसे श्लोकों का प्रयोग साधक मन को उस साक्षी चेतना पर स्थिर करने के लिए करते हैं जो समस्त आन्तरिक एवं बाह्य अनुभव को प्रकाशित करती है, और उसे अपना वास्तविक स्वरूप, परम सत्ता के साथ अभिन्न, पहचानते हैं।

Frequently Asked Questions

इस श्लोक में 'प्रकाश' से क्या तात्पर्य है?
यहाँ 'ज्योति' (प्रकाश) भौतिक प्रकाश को नहीं, अपितु चेतना को इंगित करती है — वह स्वयं-प्रकाश जागरूकता जिससे शेष सब कुछ जाना जाता है। यह श्लोक आत्मा को 'ज्योतियों की ज्योति' कहता है क्योंकि सूर्य, अग्नि एवं मन भी जागरूकता के प्रकाश में ही प्रकट होते हैं।
'शिवोऽस्म्यहम्' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'मैं शिव हूँ' — यहाँ शिव केवल एक व्यक्तिगत देवता नहीं, अपितु मंगलमय, सदा-शुद्ध, परम सत्ता (ब्रह्म) के रूप में समझे जाते हैं। यह उस अद्वैत सत्य की घोषणा है कि अपनी अन्तरतम आत्मा परम तत्त्व के साथ अभिन्न है।
व्यवहार में इस श्लोक का प्रयोग कैसे होता है?
इसे आत्म-विचार एवं अद्वैत साधना में ध्यानात्मक घोषणा के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। साधक इसका पाठ करता है और इसमें वर्णित स्वयं-प्रकाश जागरूकता में स्थित होता है, और 'मैं वही ज्योति हूँ' की अनुभूति को मन में स्थिर एवं शुद्ध होने देता है।
क्या यह निर्वाण षट्कम् से सम्बन्धित है?
यह वही भाव एवं प्रसिद्ध 'शिवोऽहम्' टेक धारण करता है जो आदि शंकराचार्य के निर्वाण षट्कम् ('चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्') में मिलती है। दोनों ही यह घोषित करते हैं कि शरीर एवं मन से परे सच्ची आत्मा वही आनन्दमय, स्वयं-प्रकाश परम सत्ता है।

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