अन्तर्ज्योतिर्बहिर्ज्योतिः (शिवोऽहम्)
अन्य नाम / खोज: antar jyotir bahir jyotih · antarjyotir bahirjyotih · shivo smy aham · shivoham shivoham · atma jyotih shivoham
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✦ अर्थ
यह दीप्तिमान अद्वैत श्लोक आत्मा का शुद्ध, स्वयं-प्रकाशमान ज्योति के रूप में ध्यान है, जो 'शिवोऽस्म्यहम्' — 'मैं शिव हूँ' — इस महान घोषणा में पराकाष्ठा पाता है। अन्तर का प्रकाश, बाह्य प्रकाश, अन्तर्यामी ज्योति, सबसे परे परात्पर — इन सब आयामों से होकर यह घोषित करता है कि समस्त वस्तुओं को प्रकाशित करने वाली एकमात्र स्वयं-प्रकाश चेतना ही अपना वास्तविक स्वरूप है। यह व्यष्टि आत्मा की परम तत्त्व के साथ अभिन्नता पर एक शक्तिशाली अनुचिन्तन है।
उत्पत्ति और कथा
Advaita Vedanta tradition (a self-luminous Self / Shivoham meditation verse) · Traditional (Advaita Vedanta) · Ancient / classical
यह श्लोक अद्वैत-घोषणाओं की उस समृद्ध परम्परा का अंग है जो आत्मा का स्वयं-प्रकाश ज्योति के रूप में ध्यान करती है और 'शिवोऽहम्' — 'मैं शिव हूँ' — में पराकाष्ठा पाती है। ऐसे श्लोकों का प्रयोग साधक मन को उस साक्षी चेतना पर स्थिर करने के लिए करते हैं जो समस्त आन्तरिक एवं बाह्य अनुभव को प्रकाशित करती है, और उसे अपना वास्तविक स्वरूप, परम सत्ता के साथ अभिन्न, पहचानते हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
उपनिषद् घोषित करते हैं कि आत्मा के क्षेत्र में न सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्र-तारे, न अग्नि — क्योंकि सब उस स्वयं-प्रकाश ज्योति के पश्चात् ही चमकते हैं। जो 'मैं वही ज्योति हूँ' का साक्षात्कार करता है, वह अज्ञान एवं भय के समस्त अन्धकार को पार कर जाता है।
मंत्र
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अन्तर्ज्योतिर्बहिर्ज्योतिः प्रत्यग्ज्योतिः परात्परः। ज्योतिर्ज्योतिः स्वयंज्योतिरात्मज्योतिः शिवोऽस्म्यहम्॥
antar-jyotir bahir-jyotiḥ pratyag-jyotiḥ parāt-paraḥ | jyotir-jyotiḥ svayaṃ-jyotir ātma-jyotiḥ śivo'smy aham ||
अर्थ:अन्तर का प्रकाश और बाह्य प्रकाश, अन्तर्यामी आत्मज्योति, परात्पर; ज्योतियों की भी ज्योति, स्वयं-प्रकाशमान, आत्मा का दीप्त प्रकाश — वही शिव मैं हूँ।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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अन्तर्ज्योतिर्बहिर्ज्योतिः (शिवोऽहम्) पाठ के लाभ
आत्मा की स्वयं-प्रकाश चेतना के रूप में सीधी घोषणा ('मैं शिव हूँ')
अन्तर्ज्योति (भीतर के प्रकाश) तथा साक्षी चेतना के ध्यान के लिए उत्तम
परम सत्ता के साथ तादात्म्य द्वारा सीमा एवं पृथक्ता के भाव को विलीन करता है
गहन शान्ति, निर्भयता एवं आन्तरिक प्रकाश लाता है
इस अद्वैत बोध को पुष्ट करता है कि एक ही ज्योति सब रूपों में चमकती है
ज्ञानमार्ग के लिए एक प्रभावशाली चिन्तनशील श्लोक (महावाक्य-शैली की घोषणा)
अन्तर्ज्योतिर्बहिर्ज्योतिः (शिवोऽहम्) जप विधि
शान्त आसन में बैठकर श्लोक का पाठ करें, फिर 'शिवोऽस्म्यहम्' — मैं वही स्वयं-प्रकाश ज्योति हूँ — इस घोषणा में स्थित हों। प्रत्येक आवृत्ति के साथ ध्यान को बाह्य वस्तुओं से धीरे-धीरे उस जागरूकता की ओर मोड़ें जो समस्त अनुभव को प्रकाशित करती है, और उसी में विश्राम करें। आत्मा के साथ तादात्म्य की घोषणा के रूप में इसे धीरे एवं ध्यानपूर्वक जपना श्रेष्ठ है; 11, 21 अथवा 108 आवृत्तियाँ चिन्तन को गहरा करती हैं।