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आपदामपहर्तारम् (आपदामपहर्तारं श्लोक) — Word-by-Word Meaning

आपदामपहर्तारम् (आपदामपहर्तारं श्लोक)

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

आपदाम्
Apadam
आपत्तियों के, संकटों, विपत्तियों एवं विपदाओं के
अपहर्तारम्
Apahartaram
हरने वाले, दूर करने वाले (और नष्ट करने वाले)
दातारम्
Dataram
दाता, प्रदान करने वाले
सर्वसम्पदाम्
Sarva-sampadam
समस्त सम्पदा, धन एवं मंगल के
लोकाभिरामम्
Lokabhiramam
समस्त लोकों के आनन्द; जो सबको प्रिय एवं मनोहर हैं
श्रीरामम्
Sri-Ramam
श्रीराम, प्रभु (मंगलमय राम)
भूयो भूयः
Bhuyo Bhuyah
बार-बार, पुनः-पुनः
नमामि अहम्
Namamy-aham
मैं प्रणाम करता हूँ, नमस्कार करता हूँ

Complete Translation

जो समस्त आपत्तियों (विपत्तियों) को हरने वाले और समस्त सम्पदाओं के दाता हैं, जो समस्त लोकों को आनन्द देने वाले हैं — उन श्रीराम को मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ।

Origin & History

Source: Traditional Vaishnava prayer verse, widely recited in daily worship and Apaduddharaka (rescue-from-distress) stotras

Author: Unknown (traditional)

Period: Ancient / traditional

यह श्लोक भक्त की दो गहनतम प्रार्थनाओं — संकट से मुक्ति एवं कल्याण के वरदान — को श्रीराम के एक ही प्रणाम में समेट देता है, जो उस आदर्श प्रभु हैं जिनका सम्पूर्ण जीवन विपत्ति पर धर्म की विजय था। चूँकि राम ने स्वयं वनवास, हानि एवं युद्ध सहे फिर भी 'समस्त लोकों के आनन्द' बने रहे, अतः भक्त अपने संकटों में उन्हें ही सबसे निश्चित शरण मानकर इस श्लोक को 'बार-बार' प्रार्थना एवं स्मरण दोनों रूप में दोहराते हैं।

Frequently Asked Questions

आपदामपहर्तारम् श्लोक क्या है?
यह श्रीराम की एक प्रसिद्ध एक-श्लोकीय प्रार्थना है, जो उन्हें समस्त आपत्तियों (आपद्) के हर्ता एवं समस्त सम्पदा (सम्पद्) के दाता, समस्त लोकों के आनन्द के रूप में स्तुति करती है और बार-बार उन्हें प्रणाम करती है। यह नित्य पूजा एवं संकट के समय व्यापक रूप से पढ़ी जाती है।
'आपदामपहर्तारम्' का क्या अर्थ है?
'आपदामपहर्तारम्' का अर्थ है 'आपत्तियों/विपदाओं को हरने वाले', और 'दातारं सर्वसम्पदाम्' का अर्थ है 'समस्त सम्पदाओं के दाता'। इस प्रकार यह श्लोक प्रभु को उस रूप में स्तुति करता है जो समस्त संकटों को दूर करते हैं और समस्त सौभाग्य प्रदान करते हैं।
यह श्लोक राम के बारे में है या कृष्ण के?
सबसे प्रसिद्ध एवं परम्परागत रूप श्रीराम को सम्बोधित है ('लोकाभिरामं श्रीरामम्')। एक समान श्लोक कभी-कभी उनका नाम बदलकर श्रीकृष्ण के लिए भी पढ़ा जाता है। दोनों रूप एक ही प्रार्थना धारण करते हैं — आपत्तियों को दूर करना एवं सम्पदा प्रदान करना।
इसे कब जपना चाहिए?
यह नित्य प्रातः एवं सायं प्रार्थना, यात्रा या महत्त्वपूर्ण कार्य आरम्भ करने से पूर्व, तथा भय, संकट या कठिनाई के किसी भी समय के लिए उत्तम है। इसकी संक्षिप्तता के कारण जब भी रक्षा एवं आश्वासन की आवश्यकता हो, इसे सरलता से स्मरण एवं दोहराया जा सकता है।

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