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श्रीमद्भगवद्गीता १.३७ — तस्मान्नार्हा वयं हन्तुम् — Word-by-Word Meaning

श्रीमद्भगवद्गीता १.३७ — तस्मान्नार्हा वयं हन्तुम्

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

तस्मात्
tasmāt
इसलिए; अतः
न अर्हाः
na arhāḥ
हमारे लिए उचित नहीं; हमें नहीं चाहिए
वयम्
vayam
हम
हन्तुम्
hantum
मारना
धार्तराष्ट्रान्
dhārtarāṣhṭrān
धृतराष्ट्र के पुत्रों को
स्वबान्धवान्
sa-bāndhavān
अपने बान्धवों और मित्रों सहित
स्वजनम्
sva-janam
अपने ही लोग; स्वजन
हि
hi
निश्चय ही
कथम्
katham
कैसे
हत्वा
hatvā
मारकर
सुखिनः स्याम
sukhinaḥ syāma
हम सुखी हो सकते हैं
माधव
mādhava
हे माधव (कृष्ण)

Complete Translation

इसलिए हे माधव! अपने बान्धव धृतराष्ट्र-पुत्रों को मारना हमारे लिए उचित नहीं है; क्योंकि अपने ही स्वजनों को मारकर हम कैसे सुखी हो सकते हैं?

Origin & History

Source: Bhagavad Gita Chapter 1, Verse 37

Author: Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva)

Period: Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

प्रथम अध्याय अर्जुन विषाद योग में, अर्जुन युद्ध के विरुद्ध अपने कारण प्रस्तुत करते हैं। श्रीकृष्ण को माधव कहकर सम्बोधित करते हुए वे घोषित करते हैं कि अपने ही स्वजनों, धृतराष्ट्र-पुत्रों को मारना उचित नहीं हो सकता, और ऐसे संहार से कोई सुख नहीं मिल सकता -- ये वचन उनके शोक से प्रवाहित होते हैं और श्रीकृष्ण के उपदेश की प्रस्तावना बनते हैं।

Frequently Asked Questions

श्रीमद्भगवद्गीता १.३७ में अर्जुन क्या तर्क देते हैं?
अर्जुन तर्क देते हैं कि पाण्डवों के लिए अपने ही सम्बन्धियों, धृतराष्ट्र-पुत्रों को मारना उचित नहीं है। वे पूछते हैं कि अपने स्वजनों को मारकर वे कभी कैसे सुखी हो सकते हैं, जिससे उनकी युद्ध के प्रति नैतिक अनिच्छा प्रकट होती है।
अर्जुन श्रीकृष्ण को 'माधव' क्यों कहते हैं?
'माधव' श्रीकृष्ण का एक नाम है, जो प्रायः लक्ष्मीपति या सौभाग्य के स्वामी के रूप में समझा जाता है। अर्जुन अपने सन्देहों को व्यक्त करते हुए भी इस स्नेहपूर्ण, श्रद्धामय नाम का प्रयोग करते हैं, जो श्रीकृष्ण के प्रति उनकी निकटता और विश्वास को दर्शाता है।
क्या गीता अन्ततः अर्जुन से यहाँ सहमत है?
अर्जुन की करुणा श्रेष्ठ है, परन्तु श्रीकृष्ण दिखाते हैं कि उनका तर्क शोक और आसक्ति से धुँधला है। गीता सिखाती है कि आसक्ति के बिना अपना धर्मयुक्त कर्तव्य करना, यह जानते हुए कि आत्मा अमर है, ही सच्चा मार्ग है -- न कि शोकवश कर्तव्य का त्याग।

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