श्रीमद्भगवद्गीता १.४५ — अहो बत महत्पापम् — Word-by-Word Meaning
श्रीमद्भगवद्गीता १.४५ — अहो बत महत्पापम्
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
अहो बत
aho bata
अहो! कितने खेद की बात!
महत् पापम्
mahat pāpam
महान पाप
कर्तुम्
kartum
करने को; करने के लिए
व्यवसिताः
vyavasitāḥ
संकल्प कर लिया है; तैयार हैं
वयम्
vayam
हम
यत्
yat
क्योंकि; इस कारण
राज्यसुखलोभेन
rājya-sukha-lobhena
राज्य-सुख के लोभ से
हन्तुम्
hantum
मारने के लिए
स्वजनम्
sva-janam
अपने ही स्वजनों को
उद्यताः
udyatāḥ
उद्यत; तत्पर
Complete Translation
अहो! कितने खेद की बात है कि हम एक महान पाप करने को तैयार हो गए हैं, जो राज्य-सुख के लोभ से अपने ही स्वजनों को मारने के लिए उद्यत हैं।
Origin & History
Source: Bhagavad Gita Chapter 1, Verse 45
Author: Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva)
Period: Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
प्रथम अध्याय अर्जुन विषाद योग में, अपने विलाप के अन्त के निकट, अर्जुन पश्चात्ताप से अभिभूत हो जाते हैं। वे चिल्ला उठते हैं कि वे राज्य के लोभ से अपने ही लोगों को मारकर एक महान पाप करने जा रहे हैं -- यह उनकी निराशा की अन्तिम अभिव्यक्तियों में से एक है, इससे पूर्व कि वे अपना धनुष नीचे रखें और श्रीकृष्ण का उपदेश आरम्भ हो।
Frequently Asked Questions
श्रीमद्भगवद्गीता १.४५ में अर्जुन किस बात का विलाप करते हैं?▼
अर्जुन विलाप करते हैं कि वे और उनका पक्ष राज्य के सुखों के लोभ से मात्र अपने ही सम्बन्धियों को मारकर एक महान पाप करने को तैयार हैं। यह गहन पश्चात्ताप और आत्म-निन्दा का क्षण है।
अर्जुन युद्ध को 'महान पाप' क्यों कहते हैं?▼
इस संघर्ष को धर्म के बजाय राज्य-सुख के लोभ से प्रेरित देखकर अर्जुन अनुभव करते हैं कि ऐसे कारण से अपने ही स्वजनों को मारना एक घोर पाप होगा। उनका शोक और आसक्ति उन्हें इस निष्कर्ष तक ले जाते हैं, इससे पूर्व कि श्रीकृष्ण उच्चतर दृष्टि प्रदान करें।
यह श्लोक गीता के सन्देश में कैसे बैठता है?▼
यह प्रथम अध्याय के विषाद को गहरा करता है और श्रीकृष्ण के उपदेश की भूमिका रचता है। गीता अन्ततः दर्शाती है कि लोभ या आसक्ति बिना निष्काम भाव से किया गया कर्तव्य पाप नहीं अपितु धर्म का मार्ग है -- जो अर्जुन की व्यथा को विवेक में बदल देता है।
Ready to start chanting?
See Benefits & How to Chant →