श्रीमद्भगवद्गीता १.४६ — यदि मामप्रतीकारम्
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✦ अर्थ
अपने विलाप के अन्तिम श्लोक में अर्जुन अपने विषाद की गहराई तक पहुँच जाते हैं। वे घोषित करते हैं कि शस्त्रधारी धृतराष्ट्र-पुत्रों द्वारा निःशस्त्र और सामना न करते हुए मारा जाना उनके लिए, अपने स्वजनों से लड़कर उन्हें मारने की अपेक्षा, अधिक श्रेयस्कर होगा। यह अत्यन्त कथन प्रकट करता है कि शोक और आसक्ति ने उन्हें कितनी पूर्णता से अभिभूत कर दिया है -- धनुष त्यागने से ठीक पूर्व इच्छाशक्ति के पूर्ण समर्पण का क्षण।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 1, Verse 46 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
प्रथम अध्याय अर्जुन विषाद योग में, अर्जुन अपने शोक के उद्गार को इस घोषणा से समाप्त करते हैं कि वे अपने स्वजनों से लड़ने की अपेक्षा निःशस्त्र मारा जाना अधिक पसन्द करेंगे। यह उनके विलाप का अन्तिम श्लोक है, जिसे संजय कहते हैं, ठीक इससे पूर्व कि अर्जुन अपना धनुष नीचे रख दें और श्रीकृष्ण का उपदेश आरम्भ हो।
✦ शास्त्रों में वर्णित
टीकाकार कहते हैं कि अर्जुन की इच्छाशक्ति के समर्पण की वही गहराई -- अपने लोगों को हानि पहुँचाने की अपेक्षा मृत्यु को प्राथमिकता देना -- ने उन्हें अहंकार से रिक्त कर दिया और खुले हृदय से उस परम ज्ञान को ग्रहण करने के लिए तैयार कर दिया जिसे भगवान प्रदान करने वाले थे।
मंत्र
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यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः। धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥
yadi mām apratīkāram aśhastraṁ śhastra-pāṇayaḥ dhārtarāṣhṭrā raṇe hanyus tan me kṣhemataraṁ bhavet
अर्थ:यदि शस्त्रधारी धृतराष्ट्र-पुत्र मुझ निःशस्त्र और सामना न करने वाले को रणभूमि में मार भी डालें, तो वह मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता १.४६ — यदि मामप्रतीकारम् पाठ के लाभ
श्रीकृष्ण के उपदेश से पूर्व अर्जुन के विषाद की पराकाष्ठा को अंकित करता है
अपने स्वजनों को हानि पहुँचाने के प्रति उनकी गहन विमुखता को प्रकट करता है
साधक को स्मरण कराता है कि अभिभूत करने वाला शोक विवेक को धूमिल कर सकता है
उस नाटकीय क्षण की भूमिका रचता है जब अर्जुन अपना धनुष नीचे रख देते हैं
शोक और भ्रम से अभिभूत लोगों के प्रति करुणा को प्रोत्साहित करता है
द्वितीय अध्याय में आने वाले मुक्तिदायी ज्ञान के लिए हृदय को तैयार करता है
श्रीमद्भगवद्गीता १.४६ — यदि मामप्रतीकारम् जप विधि
इस श्लोक का पाठ करें अपने विलाप के अन्त में अर्जुन की निराशा का पूर्ण भार अनुभव करने के लिए। जप करते समय पहचानें कि कैसे आसक्ति और शोक एक महान वीर को भी अपना कर्तव्य पूर्णतः त्यागने तक ले जा सकते हैं। यह विषाद की गहराई आपको उस मोड़ के लिए तैयार करे -- अर्जुन का १.४७ में धनुष त्यागना और श्रीकृष्ण का द्वितीय अध्याय में अपना उपदेश आरम्भ करना।
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