श्रीमद्भगवद्गीता १०.१० — तेषां सततयुक्तानां — Word-by-Word Meaning
श्रीमद्भगवद्गीता १०.१० — तेषां सततयुक्तानां
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
तेषाम्
teṣhām
उनको
सतत-युक्तानाम्
satata-yuktānām
नित्य युक्त रहने वालों को, जो निरन्तर मुझसे जुड़े हैं
भजताम्
bhajatām
जो भजते हैं, जो भक्ति में लगे हैं
प्रीति-पूर्वकम्
prīti-pūrvakam
प्रेमपूर्वक, प्रेम के साथ
ददामि
dadāmi
मैं देता हूँ, प्रदान करता हूँ
बुद्धि-योगम्
buddhi-yogam
विवेक का योग, बुद्धि का दिव्य ज्ञान
तम्
tam
वह
येन
yena
जिसके द्वारा
माम्
mām
मुझको
उपयान्ति
upayānti
आते हैं, प्राप्त होते हैं, पहुँचते हैं
ते
te
वे
Complete Translation
उन नित्य मुझसे युक्त हुए और प्रेमपूर्वक मेरा भजन करने वाले भक्तों को, मैं वह बुद्धियोग देता हूँ जिसके द्वारा वे मुझे ही प्राप्त होते हैं।।
Origin & History
Source: Bhagavad Gita Chapter 10, Verse 10
Author: Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva)
Period: Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
दसवें अध्याय, विभूति योग में, श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों और समस्त सृष्टि के स्रोत को प्रकट करते हैं। अपनी अनन्त अभिव्यक्तियों का वर्णन करने से पूर्व, वे अर्जुन को भक्ति के प्रति अपनी प्रेमपूर्ण प्रतिक्रिया का आश्वासन देते हैं: जो निरन्तर और प्रेमपूर्वक उनका भजन करते हैं, उन्हें वे स्वयं वह आन्तरिक ज्ञान (बुद्धियोग) प्रदान करते हैं जिसके द्वारा वे उन तक पहुँचते हैं — यह अध्याय के हृदय में स्थित कृपा का एक प्रकाशमान वचन है।
Frequently Asked Questions
भगवद्गीता १०.१० की मुख्य शिक्षा क्या है?▼
श्रीकृष्ण वचन देते हैं कि जो भक्त नित्य युक्त रहते हैं और प्रेमपूर्वक उनका भजन करते हैं, उन्हें वे स्वयं बुद्धियोग — दिव्य बोध का योग — प्रदान करते हैं, जिसके द्वारा वे उन तक पहुँचते हैं। यह सिखाता है कि प्रेमपूर्ण भक्ति भगवान की कृपा को खींच लाती है, जो उस ज्ञान को जगाती है जो मुक्ति की ओर ले जाता है।
इस श्लोक में 'बुद्धियोग' क्या है?▼
बुद्धियोग बुद्धि या विवेकपूर्ण ज्ञान का योग है — वह आन्तरिक स्पष्टता और आध्यात्मिक बोध जिसके द्वारा मनुष्य सत्य को देखता है और भगवान की ओर खिंचता है। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे स्वयं अपने प्रेमी, दृढ़ भक्तों को यह ज्ञान प्रदान करते हैं।
क्या यह श्लोक प्रयत्न पर बल देता है या कृपा पर?▼
दोनों पर, समरसता में। भक्त का भाग है निरन्तर, प्रेमपूर्ण उपासना (सतत-युक्त, प्रीति-पूर्वकम्); भगवान की प्रतिक्रिया है मार्गदर्शक ज्ञान का उपहार। सच्ची भक्ति कृपा को आमन्त्रित करती है, और कृपा वह बोध प्रदान करती है जो भगवान तक की यात्रा को पूर्ण करता है।
इस श्लोक में वर्णित कृपा मैं कैसे प्राप्त करूँ?▼
भगवान की स्थिर प्रेम और भक्ति के साथ, स्वार्थरहित होकर उपासना करके। जैसे-जैसे आपकी भक्ति गहरी और निरन्तर होती है, श्लोक का वचन है कि भगवान स्वयं वह आन्तरिक ज्ञान जगाएँगे जो आपको उन तक ले जाएगा। प्रेमपूर्ण स्मरण ही वह कुंजी है जो कृपा का उपहार खोलती है।
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